दिसंबर 29, 2015

अलविदा पोस्ट: ख़त आख़िरी

तो साहिबान हम चलते हैं। फ़िर कब मिलेंगे, पता नहीं। मुसाफ़िर हैं हम भी, मुसाफ़िर हो तुम भी  वाला निदा फ़ाजली का शेर याद आ रहा है। उसे लिख भी दूँ, तब भी नहीं मिलेंगे। क्या करूँ? मन भी तो खाली होना चाहता है। इस जगह ने सारी खाली जगहें अपने नाम से रख ली हैं। कोई और बात आए भी तो कैसे आए? इसलिए जा रहा हूँ। सोते जागते हर पल जिसकी ख़ुमारी रहे, उससे निकल जाने की तमन्ना अब और नहीं रूक सकती। रुकते-रुकते यह बीतता साल और जुड़ गया। कहा था न कभी, जाते-जाते वक़्त लगता है। वक़्त लगता है पिघलने में बिलकुल जैसे। जैसे वक़्त लगता है, किसी याद के एहसास को अंदर घुलने में। जैसे बादलों में घुलता है सूरज। जैसे पानी में घुलता है नील।

इन पाँच सालों में मुझसे कोई और काम नहीं हुआ। फुल टाइमर रहा। बस एक ही धुन सिर पर सवार। कुछ लिखना है। भाग भागकर वापस आता और कई बार अनदेखी, अनकही बातों को कहने से भर जाता। लिखने को तो इस एक पंक्ति में वह बीतते पल कभी समा नहीं सकते। पर शायद यही इसकी सबसे कमज़ोर कड़ी है। कहते हुए भी न कह पाना। कभी-कभी होता है, हम रुक जाना चाहते हैं पर रुक नहीं पाते। इन घड़ियों में अभी भी मेरा मन इतनी तेज़ी से भाग रहा है। के इस तरह अचानक लगने वाले निर्णय इतना अकस्मात नहीं है। इसे अप्रत्याशित तो बिलकुल भी नहीं कहा जाना चाहिए। पिछले साल इसी दिन से  इस साल, इसी दिन तक। वापस।

यह ठहराव दिमाग को ‘रिस्टार्ट’ करने के लिए बेहद ज़रूरी कदम है। उन्हीं स्थापनाओं, विचार प्रक्रियाओं में फँसे रहना इकहरेपन से भर जाना है। चीजों को देखने, समझने, इस दुनिया में दखल करने की भाषा के और रूप भी होंगे जो इस तरह के खाँचों में नहीं आ पा रहे होंगे। उन सबके लिए ज़रूरी है, ठहरना। यह सिर्फ़ और सिर्फ़ एक बनी बनाई संरचना से बाहर निकलने, ख़ुद को बचाए रखने की छोटी-सी कोशिश भर है। किसने कहा नहीं लिखुंगा। कागज़ पर लिखुंगा। पर यहाँ जितना वक़्त दे सकता था, उसकी किश्तों को वापस समेट लेने की प्रक्रिया को शुरू का देना है। कोई माने-न-माने इतना वक़्त लगाकर इतनी मेहनत के साथ इस जगह को बनाने की जो अनुभूति, जो एहसास मेरे रोएँ-रोएँ में भरे रह गए हैं उन्हें कभी अपने से बाहर नहीं करना चाहता। लिखना बाहर ले आना है। इस तरह अब जबकि रुक जाऊँगा, तब तरतीब से देख पाने के खालीपन से भरा रहकर यह देखने की कोशिश करूँगा, अभी भी क्या है, जो मेरे अंदर रह गया है। कोई बात, कोई पल, कोई अनछुआ एहसास, किसी दिन की ढलती शाम, ढलती शाम से आसमान में उतरता चाँद।

क्या है, जो इसकी परिधि में कभी नहीं समा सका। शर्तिया उस भाव को कहने की ठोस भाषा मेरे पास नहीं होगी। मेरी कमज़ोर-सी लड़खड़ाती बारहखड़ी में इतना दम कहाँ कि कुछ कह पाऊँ। जो सब कहा, वह उन सबको कहने की कोशिश है। कहा अभी भी नहीं है। ऐसा कहकर कुछ संभावनाओं को अपने अंदर बचा ले जा रहा हूँ। जरूरी है सपनों की तरह किसी उम्मीद का बचे रहना। वह बची रहेगी तो हम बचे रहेंगे। तब किसी तारों भरी शाम, उनके रेशों से हम अपने हिस्से का आसमान बुनने निकलेंगे। पर कहा न। अब इस ठिकाने पर इतना ही। कोई माने-न-माने पर यह ऐसी जिल्दसाज़ की दुकान हो गयी है, जिसमें जिसमें किताब चाहे कोई भी आए, उसकी सीवने उधेड़कर तानाबाना वैसा रह जाता जैसा पिछली रात सिराहने रखकर सोया था। कुछ वक़्त चाह रहा हूँ अपने आप से। इस कमरे से निकलकर बची रह गयी दुनिया को पास से देखने का हुनर सीखने। इसके लिए वक़्त चाहिए। जो सारा है, वह तो यही ले जाता है। इसलिए जा रहा हूँ। जाना हमेशा लौट आने के लिए नहीं होता। कभी सिर्फ़ लौट जाने के लिए होता है। इसलिए लौट रहा हूँ। वापस। कभी न लौटने के लिए।

(28.12.2015 सुबह करीब सवा नौ बजे।)

2.
लिखना ज़रूरी क्यों हैं? यह ऐसा सवाल रहा जो हमेशा से चारों तरफ़ से घेरे रहता। लिखता भी जाता और कहता भी जाता, यह लिखना बेकार है। क्यों हम बेकार का काम किए जा रहे हैं। इसके बाहर निकलने के लिए ज़रूरी है, अब निकल जाना। निकलकर दूर से इस दस्तावेज़ को देखना। इसके टुकड़े-टुकड़े करके समझना है कि इसकी समझ क्या है? हमें भी तो ऐसा करने के लिए दूर से देखने के मौके मिलने चाहिए। इसलिए भी अब इस पानी की परछाईं से थोड़ा बचना है। भीगने से बचना, गुम होते जाते क्षणों को दोबारा रचने का अवकाश भी लेकर आएगा, इस उम्मीद के साथ यहाँ से जाते हुए एकबार बस एक नज़र दौड़ा रहे हैं। जैसे गाँव से लौटते वक़्त हम भागकर छत पर ज़रूर जाते। देखते, जो छूट रहा है, उसे तस्वीर के साथ अपने अंदर भरकर साथ ले जा सकें तो जेब में भरकर रख लेंगे। ताकि दोबारा आयें तो झट से जान जाएँ कहाँ-कहाँ क्या बदला? कितने हिस्सों पर पैबंद है? कितने सिरे पर आसमान के रफ़ू नए हैं?

नए की तलाश कौन नहीं करता? लेकिन इसे इस तरह कहना सबसे ज़रूरी है। इस कोशिश में जो सबसे ज़रूरी बात है, वह है, कहना। इतनी आपाधापी में एक पल के लिए भी इससे हट नहीं पाया। लिखना गालिब के ‘इश्क़’ और ‘काम’ के बीच झूलता रहा। इसने उस ‘सेफ़्टी वॉल्व’ की तरह काम किया, जो मेरे अंदर की बातों को चोर दरवाज़े से बाहर निकालता रहा। यह कभी भी दिमाग से उतरने न पाया। हरदम लगता रहा लिख नहीं रहा। पर इन लमहों को लिख लेना चाहिए। यह मेरी अपनी आवाज़ को सुने जाने लायक भाषा में तब्दील कर कह देने की अनदेखी कोशिश थी। इसने मेरे मन मेरी सारी अनुभूतियों को ठोस रूप में परिवर्तित कर दिया। ठोस होना ‘स्थूल’ होना नहीं है। स्थूल होना भोथरा हो जाना है। ठोस होना, छूने लायक बनाने की जद्दोजहद में जूझते रहना बनता गया। यहाँ जितनी भी बातों को कह पाया वह सब की सब इसी तरह की रही होंगी। ठोस, स्थूल, भोथरी। जो कहते हुए भी नहीं दिख रही, वह जब मिल जाएंगे, तब कहूँगा।

लेकिन सवाल है, क्या अब वह सवाल, सवाल नहीं रहे? इनके आज भी उसी रूप में होने के बावजूद क्या है, जो बदल गया है? कुछ तो होगा जो अंदर दरक रहा है। यह खिसकाना उन स्थापनाओं से आगे बढ़ जाना है या उनमें किसी तरह का संशोधन है। जितना इस लिखने के सैद्धांतिक आधारों को इधर पीछे कुछ जादा ही सघनता से सोच रहा हूँ, वहाँ देखने लायक बात है, इस तरह चलने की बात का ख़याल कैसे आया होगा? यह शायद शुरू से ही एक गरम हवा का गुब्बारा रहा होगा जो अपनी अधिकतम ऊंचाई पर जहाँ तक पहुँच सकता था, पहुँच चुका होगा। उसे किसी मानक में रूपांतरित नहीं किया पर फ़िर भी महसूस तो हो जाता है। हम एक ख़ास जगह पहुँचकर वापस नीचे देखते हैं। तब गलियाँ रेखाओं में और नदियां सड़कों में बदल जाती हैं। पहाड़ों पर चले जाना दृष्टिभ्रम का निर्माण करता है। ऊँचाई पर रहने की आदत हम मैदान वालों की नहीं रही। हम कुछ दिन जाते हैं, ऊपर से दुनिया देख भालकर वापस लौट आते हैं।

इस तरह लौट आने पर हम जान पाते हैं, वह क्या था(?) जो ऊँचाई से दिख रहा था, पर मैदान पर आते ही उसी दिख रही जगह में गुम हो गया। ‘गुम हो जाना’ हमारा शब्द है। उसे शहर, मैदान, जमीन किस तरह से कहेंगे, मुझे नहीं पता। जैसे ही मैं खो जाता हूँ, लगने लगता है बात जो शुरू की थी, वह भी पीछे छूटती जा रही है। इसलिए सही वक़्त यही है, रुक जाऊँ। रुकना फ़िर से अंदर देखने का मौका लाएगा। इसी उम्मीद से ख़ुद को समझने की कोशिश पर वापस लौटते हुए, लौट रहा हूँ। अलविदा। फ़िर पता नहीं कब मिलेंगे। मिलेंगे भी या नहीं मिलेंगे। पता नहीं। अभी बस जाना है। जा रहा हूँ।

(दोपहर: बारह पचास, तारीख़ वही। आज अट्ठाईस दिसंबर)

3.
मेरे पास जो वक़्त था, जो वक़्त नहीं था, उसे इकट्ठा करके इसे एक मुकम्मल जगह बनाने की हर कोशिश यहाँ दिख जाएगी। जो नहीं दिख रही, उसे मेरी और सिर्फ मेरी कमजोरी माना जाये। जितना देख देखकर पूछ पूछकर जानता-समझता गया, उसे अपने यहाँ शामिल करता गया। उन्हें इस जगह लाने की जद्दोजहद में डूबता, उतरता जितनी भी हैसियत रही, उतना कर पाने की इच्छाओं से ख़ुद को भर लिया। अभी भी भरा हूँ पर अब उस तरह की आग नहीं है। उत्प्रेरक जो रहे होंगे, वह अब काव्य हेतु, काव्य प्रयोजन जैसी जटिल संरचना वाले जटिल सवालों में तब्दील होते गए होंगे। सवालों का होना हरबार जवाबों की तरफ़ ले जाये, ऐसा होता नहीं है।

फ़िर यहाँ एक बात जो हमेशा अंदर चुभती रही, वह यह के यहाँ कभी हमारे परिवार की झलक नहीं दिखी तो यह मेरी सीमा है। ख़ुद को इतना अकेला कर लेने की हद तक चला गया कि हर बार जब कोई नया साथी मिलता, उसे लगता इस शहर में उसी कि तरह अकेला रहता हूँ। पर हुज़ूर, यहाँ लिखी हर एक बात के लिए जितने वक़्त की किश्त मुझे घर की चारदीवारी के बीच मिलती रही, वह मोहलत सिर्फ़ उनकी कीमत पर है। उसे कभी किसी तरह किसी भी रूप में तब्दील करके आँका नहीं जा सकता। घर न होता, तब चिंता होती। चिंता होती तो लिखना न होता। मेरे जिम्मे सिर्फ़ सुबह का दूध और शाम के वक़्त पानी भरने की ज़िम्मेदारी रही। बीच के दिन में घर कैसे बनता, बिगड़ता, बुनता, उधड़ता रहा इसकी ख़बर पास जाने पर मिलती। कभी बाज़ार या बाहर जाने की बात हो आती, तब अनमना होकर छटपटाता रहता। किसी तरह भाग भूग कर उसे निपटाते हुए ख़ुद को कोसता रहता। सोचता कि काश इससे बच जाता।

माता-पिता, भाई-बहन और डेढ़ साल से तुम। यह सब मेरे लिखे होने में इस कदर छिप जाएँगे, इसे लिखना भी पता नहीं कितनी अजीब बात है। इसे इस तरह कहने और स्वीकार करने में इतना वक़्त लग जाएगा कि आख़िरी पोस्ट पर आ जाऊँगा, कभी सोचा न था। जिसे अपना कमरा कहता रहा, उसके अंदर के एकांत को बनाए रखने में मुझसे इन सबकी हिस्सेदारी है। यह सिर्फ़ एक घर की बात नहीं है, उन सबकी बात है जो गाहे बगाहे यहाँ होते हुए भी सीधे उतरते हुए नहीं दिख पाये। यह शहर की संरचना या उसकी गतिकी को समझने का शास्त्र भले बना रहे हों पर उनकी स्थापनाओं को बिन पढ़े, मैं ख़ारिज कर रहा हूँ। क्योंकि जिस तरह हम इतनी पास से सब चीजों को देखते हुए उन्हें दर्ज़ करते रहे, उसकी तह में पहुँच कर थाह लेना उस किसी एक विषय के अनुशासन के बस की बात नहीं। वह सब किताबें हैं और हम किताबों से बाहर हैं। कौन देख रहा हैं हमें? कोई नहीं। इस तरह हम कभी किसी की नज़र में नहीं आने वाले।

यह लैपटॉप, जिसपर अभी कागज से देख देखकर टाइप करूँगा। अगर यह न आया होता, तब इस जगह का इस तरह से बन पाना कतई ऐसा न होता। न जाने कितने फ़ोल्डरों में वर्ड फ़ाइलें मनसदों की तरह पड़ी हुई हैं। आधी अधूरी बातों से अटी पड़ी उनकी कहानियाँ कभी नहीं कह पाया। इधर तो जैसे कहने के लिए सब अपने अंदर बाहर इस कदर परेशान रहे कि कितनी कहानियाँ कितने किस्से तो वहीं किसी ‘रफ़ ड्राफ़्ट’ की तरह कहीं पड़े होंगे। ऐसे कितने अनकहे हिस्से कई कई बार बिन देखे सीधे सीधे डिलीट हो गए होंगे। इनकी ऐतिहासिकता का ज़रा भी अंदाज़ा किसी को कभी भी नहीं लग पाएगा। और वह सारी बिखरी पड़ी तस्वीरें जिन्हें ढूँढ़ते-ढूँढ़ते लोग पता नहीं क्या कर जाते, मैंने उन्हें सहेजने, यहाँ लगाने से पहले लिखने से भी जादा वक़्त लगाकर कुछ भी गलत नहीं किया। वैसे ‘गलत’ यहाँ गलत शब्द है। पर इतने भावतिरेक में समझ नहीं पा रहा कि चीज़ें जैसे अंदर चल रही हैं, वह किस तरह कैसे भी करके हूबहू कागज़ पर उतरती चली जाएँ। लेकिन कितनी हद तक वह वैसे आ पा रही हैं, कह नहीं सकता। यह बिलकुल तय बात है कितनी ही बातें अधूरी रहकर छूट गयी होंगी। कितनी बातें कहकर भी कुछ नहीं कह पायी होंगी। कितनी बार न चाहते हुए भी लिखने को मज़बूर करते हुए जो सोचा, अब उसे कहने जा रहा हूँ।

इस अधूरेपन में जो बचे रहने की ख़्वाहिश है, उसे कोई नहीं देख रहा। मैंने देख लिया है इसलिए इस लिखने वाले अपने पहले इश्क़ को अधूरा छोड़कर जा रहा हूँ। इस जगह को छोड़ना कितना मुश्किल है, यह मेरे सिवा कोई और नहीं जान सकता। अभी तो कितनी ही दोस्तियाँ बनती, कितनी हज़ार बातें होती। हम ख़ुद किसी बात का किस्सा होकर कहीं रह जाते। पर सब संभावनाओं को टटोले बिना जा रहा हूँ। ऐसा कहते हुए भी दिल में अंदर से कुछ चिटककर टूट जाने जैसा कुछ है। टूटना सिर्फ़ इस संरचना का नहीं उसके जरिये मेरे अंदर घर कर गयी प्रक्रियाओं, ढाँचों, संघटनों, विघटनों से विलगाव भी है। अब सबको छोड़ कर चले जाना है। मन भाग रहा था, जब उन्होंने बाहर बुला लिया। बात कहीं अधूरी ही रह गयी। चलो कोई नहीं। अब चलते हैं। अलविदा। शब्बा ख़ैर।

वैसे यहाँ तक आते-आते मन उदास हो गया हो, तब आपके लिए नुसरत फतेह अली ख़ान की क़व्वालियाँ कुछ कर सकती हैं। पिछले कुछ दिनों से लगातार उन्हें दिन-रात, सुबह-शाम सुन रहा हूँ। सुकून ढूँढ़ने से मिलता है। लिंक है, साउण्ड क्लाउड का। लाहौर से। मेरा फ़ेवरेट ट्रैक, है कहाँ का इरादा तुम्हारा सनम

(साल वही, 2015। दिन वही, अट्ठाईस दिसंबर। वक़्त दोपहर के सवा एक बजे के लगभग।)

आवाज़ें..

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