दिसंबर 01, 2010

पहली दिसम्बर निखिल के नाम

'सिनेमा  इस समय का सशक्त माध्यम है और इसे सिर्फ मनोरंजन मानना न पर्याप्त है और न ही उचित.निश्चय ही यह जनता के काफी बड़े हिस्से के लिए मनोरंजन का सबसे बड़ा जरिया है लेकिन फिल्म देखते हुए वे अपना मन ही नहीं बहलाते ,वे  अपने साथ अपने समय और समाज के बारे में नए अनुभव और समझ भी लेकर जाते हैं. ये अनुभव और यह समझ जीवन और समाज सम्बन्धी उनकी पहले  की समझ को किसी न किसी रूप में प्रभावित ज़रूर करते हैं.या तो जाने अनजाने उनका नजरिया बदलता है या पहले से बनी समझ और मजबूत होती है. {सिनेमा का शैक्षिक सन्दर्भ : विनोद अनुपम, भारतीय आधुनिक शिक्षा, अप्रैल २०१०}

पर जब मैं इसे आज की तारीख से जोड़ता हूँ तो निराशा ही हाथ लगती है. जिस समाज में एचआईवी संक्रमित रोगियों की संख्या लगातार बढती जा रही हो वहां विलोमनुपात में उतनी ही कम बातचीत हैरत में डालती है.यह चुप्पी एक दिन की अर्जित नहीं इसकी सांस्कृतिक सामाजिक व्याखाएं हैं. जिस समाज में ऐसे विषयों पर बात नहीं होगी उसकी अभिव्यक्ति भी उनके कला रूपों में कम ही होगी. उनका कम होना उस मानसिकता को ही दर्शाता है जो समाज को जकड़े हुए है. पर अभी बात जहाँ से शुरू करी थी मतलब सिनेमा की..

खोज खाज कर नज़र पड़ी 2005 में प्रदर्शित ओनिर की 'माय ब्रदर..निखिल' पर.

आज भले ही सरकारी तंत्र नाको (NACO) के तीसरे चरण में महिला यौनकर्मियों, नशे के आदि, समलैंगिकों, यौनान्तरण-लिंगी (transgender) समूहों को अपना कोर ग्रुप  बताये और अगले पाँच सालों में इन समुहों के साथ काम करने की योजना बना रहे हों, पर ओनिर को इस फिल्म के प्रारंभ मे यह चिट लगानी पड़ जाती है कि "इस फिल्म के पात्र, घटनाएँ और कथा काल्पनिक हैं, तथा किसी भी जात ,जीवित या मृत व्यक्ति से सम्बंधित नहीं हैं और यदि हैं तो वो काल्पनिक हैं ". जात 'communities' का अनुवाद है. यह घोषणा इस फिल्म के परदे पर पहुँचने की सरकार द्वारा लगायी गयी शर्त थी. भले आज विशाल अपनी फिल्म कमीने  में भवरा आया रे ..सरीखे गाने डाल सकते हैं पर तब ये संभव न था. यहाँ भी नुक्ता है जिसका नीचे ज़िक्र करेंगे..

ये फिल्म है निखिल कपूर (संजय सूरी ) की, जो राज्य स्तरीय तैराकी चैम्पियन है. इसलिए नहीं कि वह चाहता था, वह इसलिए तैराकी प्रवीण है क्योंकी जैसा कि भारतीय पिताओं के सपनों के साथ होता है वे उनकी उम्र में तो पूरे नहीं हो पाते हैं इसलिए बच्चों के पलने के साथ सपने भी पलते रहते हैं और ये उम्मीद की जाती है के एक दिन आएगा..उसके पिता को जो जीता वही सिकंदर का कुलभूषण खरबंदा भी कहा जा सकता है और तारे ज़मीं पर का क्रूर पिता भी..पर ये क्रूरता सपने के साकार हो जाने के बाद सामने आती है जिसका उनके सपने से कोई लेना देना नहीं है.

जैसे कि फिल्म है और उसके पास सीमित समय है, उसकी उसके एचआईवी संक्रमित होने की रिपोर्ट आती है, और ज़िन्दगी पर सवालिया निशान लग जाता है. उसे टीम और घर दोनों जगहों से निकल दिया जाता है. यह ऐतिहासिक तथ्य है कि एचआईवी/एड्स की पहले पहल पहचान अमेरिका में अस्सी के प्रारंभिक दशक में हुई और भारत में सन छियासी चेन्नई में डॉ. सुनीति सोलमन द्वारा महिला यौनकर्मियों में पहले एचआईवी संक्रमण की पहचान की जाती है. साथ ही यह फिल्म जिस कालखंड (1987) की यह बात यह करती है उस समय तक केवल 135 और केस प्रकाश में आ पाए थे. ज़ाहिर सी बात है की इस विषय में सबका ज्ञान सीमित ही रहा होगा. और इस रोग पर बात करना तो दूर की कौड़ी है..

फिर ऐसा क्या था की पहले टीम और फिर निखिल का परिवार उसे घर से ही निकल देता है??

इसका कथानक गोवा से सम्बंधित है जिसके बारे में आमफ़हम भारतीयों की राय उन्मुक्त स्वछंद संस्कृति की छवि ही है पर निखिल का सन सत्तासी का परिवार ऐसा नहीं है न ही इस इक्कीसवीं सदी के परिवार. चूँकि एड्स संक्रमण असुरक्षित यौनसंबंधों से 'भी' जुड़ा है और पूरा भारतीय मानस कुछ इस तरह संस्कृत होता जिसमें वह एक साथ नगरवधुएं भी रखेगा और अपनी यौनिकताओं को नियंत्रित करने के लिए ब्रह्मचर्य से लेकर सति जैसी व्यवस्थायें लाएगा, राम जैसे मर्यादापुरुष भी गढ़ेगा और सीता की अग्निपरीक्षा का आयोजन भी करेगा. कुफ्र से लेकर पाप तक की रेंज में सोचने वाला ये समाज इतनी आसानी से अपने को क्यों बिखरने देगा. यह तो वह डरपोक प्राणी है जो दूसरे को अपने जैसा बनाये बिना नहीं छोड़ता.उसका अपना वज़ूद खतरे में पड़ जाता है..!!

हर साल की तरह इस साल भी रेड रिब्बन एक्सप्रेस सफदरजंग रेलवे स्टेशन पर आई होगी और आये होंगे सरकारी बुलावे पर सरकारी स्कूलों के खालिस धमाचौकड़ी मचाते बच्चे. ये उन्ही माता-पिताओं के बच्चे हैं जो उनको किसी भी तरह यौनशिक्षा  देने के पक्ष में नहीं हैं. इसीलिए यही वो सेंसर बोर्ड है जो उनके दूरदर्शन पर जासूस विजय  तक देखने पर भी पाबन्दी लगता है. मतलब सरकार घोटालों में से बचा कर जो पैसा इन जागरूकता कार्यक्रमों पर लगाती है उस पर परिवार नामक संस्था पतीला लगाने में कोई कोर कसर नहीं छोडती क्योकि वे तो 'वैश्यावृति के वैध संस्करणों' में ही सांस लेते आयें हैं.

उनकी प्राणप्रिय पुस्तिका है आसाराम बापू के आश्रम से छपने वाली 'यौवन सुरक्षा'. कबीर संतोस धन की बात करते है और ये इस धन की. यह लिखी सिर्फ बालकों के लिए है क्योकि शायद इस विश्वास के पीछे यह धारणा काम कर रही हो की यदि विद्यालयी जीवन में सभी शिक्षार्थी इसका लाभ उठाते है तो उनकी बुद्धि सन्मार्ग पर आकर स्वयं वीर्यवान होगी और बालिकाओं पर स्वतः ही इसका सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलेगा..पर वास्तविकता क्या है हम सब जानते हैं..खैर..

इस 'पर' पे ही आकर वे सब अटक गए थे अब निखिल सिर्फ नवीन (विक्टर बेनर्जी )और अनीता (लिल्लेट दुबे )की संतान तो है ही नहीं अब वह ऐसा प्राणी हो गया था जिसने इन सबके जीने के आधार में ही सेंध लगा दी थी. जिसके साथ उनका रिश्ता जोंक से कम का न हो वहां वे समाज के पहरुए कैसे बर्दाश्त कर लें कि समलैंगिक संबंधों के बाद भी वह उसे उनके बीच में रहने देंगे..वैसे भी एक मछली ही तो अभी तक तालाब को गन्दा करती आई थी..

चूँकि कानून व्यवस्था भी इन्ही बहुसंख्यकों के देखरेख में काम करती आई थी तो यहाँ भी कैसे चुप रह सकती थी. एक दिन उसे पुलिस 'गोवा पब्लिक हेल्थ एक्ट' के तहत गरिफ्तार कर लेती है. जिसके अंतर्गत किसी भी एचआईवी संक्रमित व्यक्ति को पकड़ कर कालकोठरी में अकले बंद रखने का प्रावधान था.और यहीं कहीं से सरकार द्वारा ये शर्त भी उभरती है कि आप अपनी इस फिल्म को काल्पनिक कहो, कथ्य से लेकर पात्र-स्थान तक, सब..जो कि यह कतई नहीं थी, पर प्रदर्शित करने-सेंसर बोर्ड से अनुमति लेने के लिए ऐसा करना पड़ा, जो उसके अमानवीय असंवेदनशील चेहरे को उजागर करती थी...शायद एचआईवी/एड्स जागरूकता के नाम पर मिलने वाले करोड़ों अरबों रूपियों का सवाल जो था..

बहरहाल, वापस आते हैं..

समाज में इसका संक्रमण न फैले इस तर्क पर उसे बंदीगृह ले जाया गया. इसके साथ ही निखिल के सभी मित्रों ने भी उससे सारे संपर्क तोड़ दिए, सिवाय उसकी बड़ी बहन अनामिका (जूही चावला ) जो कि शिक्षिका थी और उसका समलैंगिक पुरुषमित्र नायजिल(पूरब कोहली) के. वे एक पल-पल मरते जीवन के साथ खड़े थे और उनका ये फैसला अंत तक बना रहता है. कोई तीसरा उनके साथ था तो वह वकील (श्वेता कवात्रा ) जिसकी जिरहों से समाज द्वारा बहिष्कृत संवदेना को दोबारा वापस लाने की कोशिश की जा रही थी. समाज इन्ही ऐसे ही खोखले तर्कों से जीवन को अपदस्थ कने की साजिशे करता रहता है..पर हमें हार नहीं माननी है.

तब उनकी संख्या भले ही कम थी पर आज ये आपको भी अपने में मिलाना चाहते हैं..आप मिलायेंगे हाथ..'हाथ से हाथ मिला' याद है कभी दूरदर्शन पर आता था ??..

एकएक सीन एक एक एंगेल निखिल पास उसके आसपास मंडराती मौत को कहीं जाने नहीं देते पर ये निखिल ही था जो शिद्दत से जीता रहा जीता रहा. उसने हार नहीं मानी थी.आखिर केस का फैसला उनके पक्ष में होता है और उसे रिहा कर दिया जाता है. उसके जीवन को भी वैधता मिलती है. उसे भी मानव के रूप में स्वीकार किया जाता है .ये एक स्वस्थ प्रगतिशील समाज का ही लक्षण है कि वह मनुष्य को बीमारी के संवाहक नहीं उसके अस्तित्व को स्वीकार करता है. उसे भी औरों की तरह खुले असमान के नीचे उड़ती पंछियों को देखने नटखट गिलहरी के संग बतियाने कटी घास को सूंघने का उतना ही अधिकार है जितना हम सबका.और ये उतना ही सच है जितना की ये कि यह रोग हमें भी हो सकता है. सिर्फ जानकारी ही बचाव नहीं है उसका पालन भी उसी स्तर पर होना चाहिए.

आगे की कहानी में निखिल का मुख्यधारा में मिलना, उसका संगीत अध्यापक बनाना उसका जीवन को धुनों  की तरह सुरमय बनाये रहने की कोशिश ही तो है.यह उन सभी को जीवन को बोझ न समझ उसे जीने में बिताना ही है. इधर अनामिका और नायजिल एचआईवी/एड्स के प्रति जागरूकता और संक्रमित व्यक्तियों को सहायता देने के उदेश्य से पॉजिटिव पीपल नाम से एक संस्था की शुरुवात करते हैं ताकि कोई और निखिल की तरह अवमानना वंचना से त्रस्त अमानवीय जीवन जीने को अभिशप्त न हो. अपनी संतान को मरता देख माता -पिता भी अपने बेटे के निकट आ जाते हैं और उसकी मृत्यु के बाद नायजिल को अपना ही बेटा मान लेते हैं.

यहाँ सवाल ये उठता है की क्या हम तभी ऐसा कोई कदम उठाएंगे जब हमारा कोई सगा सम्बन्धी इस तरह जीने को मरने को अभिशप्त होगा??क्या पहले हममे इतनी संवेदना मानवता का संचार होने की संभावना नगण्य है ??? ये सवाल हमे अपने से अभी पूछना होगा..और ये भी आश्चर्य से कम नहीं कि यहाँ स्वतः ही बाज़ार के अनुरूप बहाने और तर्क गढ़े लिए जाते हैं और कॉलेजों में कंडोम वेंडिंग मशीन  लगा दे जाती है पर हैरत की बात ये है कि इस चमड़े की ज़बान से कंडोम बोला तक नहीं जाता.इस चुप्पी की संस्कृति से हमे ही आगे निकलना है..

बस उम्मीद यही है की इस विषय को लेकर और सार्थक प्रयास होते रहेंगे और ऐसे ही फ़िल्मकार आते रहेंगे चाहे कोई भी बाधा हो, जैसे अभी इसी साल ओनीर की 'I Am' ,फेसबुक पर विश्व के विभिन्न कोनों से चार सौ लोगों द्वारा दिए गए आर्थिक योगदान के बाद हम सबके सामने है..इसकी कहानी फिर कभी और आज आपसे इसी वादे के साथ समाप्ति कि आप न स्वं एचआईवी संक्रमित होंगे न ही अपने आसपास किसी को निखिल बनने देंगे ..उस सबके पास भी एक अदद दिल है धड़कता हुआ..आँखों में सपने हैं..हाथों में छुअन है..

और अगर आप नाको द्वारा कम्पोज़ कंडोम कंडोम रिंगटोन प्राप्त करना कहते हैं तो नीचे लिखा का लिंक चटकाएं या विशुद्ध क्लिक करें..
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