दिसंबर 03, 2010

सबसे छोटी कहानी

शनिवार ,सितम्बर 18, 2010, 12:32:52 PM
इस कहानी के शुरू होने से पहले पात्रों का परिचय:

पात्र १ : सबसे बाएं बैठा सफ़ेद दाढ़ी वाला
पात्र २ :बीच में सोता व्यक्ति
पात्र ३ :बिना कपड़ों के एक रोगी सा..
पात्र ४ :बस स्टैंड का होर्डिंग


कहानी मेरे बस स्टैंड पर पहुँचने ठहरने और बस के आने पर भाग कर चढ़ने के दरमयान घटित हुई.उस एक मिनिट में सब हो गया.

उस दिन राजघाट से उनतालीस पकड़ कर कॉलेज उतरा ही था कि उस आदमी को देखा जिसे सब दख रहे थे.क्यों देख रहे थे यह पता चलने में ज्यादा देर नहीं लगी.उसके तन पर कपडा नामक कोई सामाजिक आवरण  नहीं था उसका एक हाथ भी अपनी जगह पर सलामत न था माने कि कटा हुआ था और वहां पट्टीनुमा कुछ बंधा था.उसके गले से बंधी पट्टी ने उसके जननेन्द्रिय/लिंगसे जोड़ दी गयी नली को सहारा दिया हुआ था.मेरे पास वह भाषा भी नहीं जिसमे मैं बता सकूँ. मुझे उसके चेहरे पर बेचारगी दिखी पर शायद उसकी तरफ से वह मुझ तक उछाला गया सवाल हो जिसका अभी भी मेरे पास कोई जवाब नहीं है. ये सवाल भी बेमानी ही है कि उसका इस दुनिया में कोई नहीं है क्या कोई नहीं..??

इस आरोप से अपने को बरी नहीं कर रहा हूँ बल्कि आज का अभियुक्त शायद मै ही हूँ पर आत्मग्लानि टाइप फीलिंग कोई न हो रही है न ही कभी होती ही है.बड़े ही पेशेवराना ढंग से मैंने जेब में कुलबुलाता कैमरा निकला और डैनी बोयल  की परंपरा में एक और नाम अपना भी जोड़ लिया.आप भी उस फोटो को चटका कर बड़ा कर देख सकते हैं,पर यहाँ न कोई एक्सक्लुसिव का नुक्ता इस फोटो के साथ नहीं चस्पा रहा हूँ न ही अंधेरिया मोड़ टाइप कोई चेतावनी ही देने के मूड में हूँ ;आपके विवेक पर है..

उस बस स्टैंड जिसकी कीमत लाखों में है और वह उसी दिल्ली में है जहाँ ओबामा दम्पति ताजमहल न देख पाने की भरपाई हुमायूँ का मकबरा  देख पूरा करते हैं .जहाँ १९वे राष्ट्रमंडल खेल  बड़ी अश्लीलता के साथ उन भारतीयों की कीमत पर आयोजित किया गया जिनके पेट में अनाज नहीं सदियों से भूख रहती आई है.जो देश कुलाचे मरने कि फ़िराक में रहता हो वह ऐसी छोटी मोती बातें होना तो रोज़मर्रा की आम बातें हैं जिसे अखबार में तब तक सुर्खिया नहीं मिल सकती जब तक कोई माँ सुपर बाज़ार में बच्चे को जन्म देते हुए मर न जाय.मतलब मरना उसकी पहली शर्त है..वो भी बाज़ार में मरना..

..तो उस बस स्टैंड पर इसलिए कोई नहीं बैठा था.न बैठने के लिए यही बहाना काफी था.ऊपर से नुक्ता एक आदमी सो रहा है, दूसरा अपना गला खखारता बलगम नुमा अपना भविष्य वहाँ थूक रहा है और उस नंगधड़ंग को भागने के पुरजोर कोशिश में लगा हुआ है.उस वर्गीय तालिका में चूँकि कपड़े उसकी देह पर थे इसलिए..पता नहीं कौन सी पोस्टमार्टम रिपोर्ट बघार रहा हूँ..

इधर गुज़ारिश  में संजय लीला भंसाली इलीटइच्छा मृत्यु  की बात करते हैं और जब कोई किसानों पर काम करना शुरू करता है तो वो पीपली लाइव  बन जाती है..

आगे लिखने का मन नहीं कर रहा..

बस सूरज का सातवाँ घोड़ा  का एक सीन याद आ रहा है जिसमे रघुबीर यादव  अपना पिछली रात का देखा सपना माणिक (रजत कपूर) को सुनते हैं और वे अपनी बात बड़ी चतुराई से उसे कब्जियत और दांते की डीवाइन कॉमेडी  की तरफ मोड़ उस सपने की विभत्स छवियों से दूर कर उस बनती संवेदना को ध्वस्त कर देते हैं....पता नहीं ये लिखा ही क्यों और लिखा तो लिख किन सवालों को टाल दिया..

वह होर्डिंग अभी भी मेरी आँख में खटक रहा है..

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