दिसंबर 07, 2010

लो यह रहा तुम्हारा चेहरा यह जुलूस के पीछे गिर पड़ा था

मीडिया की बेचारगी :पार्ट वन 
  
मधुर भंडारकर  कीपेज थ्री  कुछ यहाँ थी जब माधवी शर्मा बाल उत्पीड़न की ऐसी स्टोरी एक्सपोस करती है जिसमे उसके अखबार को प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक तरलता प्रदान करने वाले रसूखदार प्राणी के लिप्त होने की बात सामने आती है पर अब यह खबर कल जाये न जाये इस पर आकर अटक जाती है.

बात उस अखबार के मालिक के कान में संज्ञान में लायी जाती है. अब इस स्थिति में जो करना चाहिए था वही किया जाता है. मालिक जी इस संवेदलशील मौद्रिक मुद्दे पर अपने एडिटर को उस लड़की के नौकरी से निकाले जाने के की आज्ञा देता है और उस मजबूर से बेचारगी टपकाते चेहरे के साथ अगले दिन उसे निकलना ही पड़ता है ताकि उसकी कुर्सी सलामत रहे उसके मालिक के के ऊपर भी जो दबाव है वह कुछ तो काम हो.इस तरह खबर आई गयी हो जाती है और एक जुझारू किस्म की लड़की जो पेज थ्री कवर न कर क्राइम रिपोर्टिंग करना चाहती  है उसकी भ्रूणहत्या कर दी जाती है.

बेचारगी के कुछ पाठ 

अब इस प्रकरण से हम कुछ बातें तो निकाल ही सकते हैं कि जबसे सम्पादकीय, प्रबंध विभाग के अंतर्गत आया है तबसे बिना रीढ़ वाले केंचुआ छाप  संपादक बहुतायत में पाए जाने लगे हैं, मुनाफाखोरी पर टिके समाज में पत्रकारिता कोरी समाज सेवा तो कतई नहीं हो सकती,अब पूंजी  सबसे बड़ा मूल्य हो चुकी है और मीडिया से इसके सम्बन्ध अब इतने गड्ड-मड्ड हो चुके हैं जहाँ उनकी एक मात्र प्रतिबद्ता उस पूंजीपति के लिए रह गयी है जो उनको विज्ञापन दे रहा है और एवज़ में उसकी सोफ्ट स्टोरीज़ on air करना; मतलब जो काम कभी पीआर कंपनी करती थी अब ये संस्था करती हैं.कि अब मीडिया वाले कोई रिस्क फैक्टर ले कर नहीं चलते चूँकि उसके पास अब लिंक्स हैं तो उसकी पूरी कीमत वसूलना भी तो उसकी ज़िम्मेदारी हुई न..
  
पार्ट टू उर्फ़ बेचारगी के आधार
 
कि अब खबर भी एक उपभोग्य उत्पाद  बन चूका है.सूचना के 'पण्य' बन जाने कि प्रक्रिया में सूचना और सत्य का वही रिश्ता गड़बड़ा जाता है, जिसे खोजने के हम सब आदि हैं. सूचना जब 'पण्य' बनेगी तो वह कब किस सत्य का विज्ञापन करेगी कब किस असत्य को सत्य बनाएगी ,यह सूचना निर्माता के लाभ से तय होगा.यह बात कनवेंशनल और न्यू मीडिया दोनों सन्दर्भों में उतनी ही सही है जितना कि इस मीडिया का राडिया टेप  मामले में ब्लैक आउट.

अभी ये सवाल नहीं कि मीडिया को तथाकथित चौथा खम्बा कहा जाये या नहीं.उसमे दीमक लग गयी है या चूना पोता जा रहा है..अभी बात ये कि क्या कभी इसने उन सारी चुनौतियों का सामना करने की सोची भी थी कभी इस लायक यह बना भी था???

कान ज़रा दूसरे तरीके से पकड़ेंगे

पहले तो राडिया टेप मामले को न अख़बारों में न कॉलम मिले न ही टीवी पर कोई स्टोरी या स्लाट. पर जब  इन्हें प्रमुखता से आउटलुक ,ओपन  आदि ने अपने यहाँ छापा तो कई इन्हें नोटिस न लेते हुए मात्र किसी कॉर्पोरेट वार का महज टूल कह दरकिनार करने की फ़िराक में थे. बरखा  कहती जा रही हैं कि रॉ टेप को बिना किसी पुष्टि के छाप देना, प्रसारित कर देना नैतिकता के किस दायरे में आता है? उन्होंने आउटलुट और ओपन मैगजीन दोनों की नीयत पर सवाल उठाते हुए पूछा कि अगर किसी के खिलाफ कोई स्टोरी करनी है, तो क्या यह फर्ज नहीं बनता कि उससे उसका पक्ष जानने की कोशिश हो? लेकिन ओपन और आउटलुक दोनों ने बिना पक्ष जाने हर तरह के आरोप मढ़ दिये। ये किस किस्म की पत्रकारिता है?

ऊपर से अबराजदीप  का तर्क यह कि जिस समय इस बात का जश्न मनाया जाना चाहिए कि मीडिया के अभियान की वजह से ए राजा को पद छोड़ना पड़ा, उस समय हम मीडिया के लोग अपनी ही पिटाई कर रहे हैं . हमारे गले नहीं उतरता.

ये वही तर्क हैं जिनकी आड़ में थोड़े दूसरे लहजे में राष्ट्रीय सहारा के संपादक उपेन्द्र राय  अंधेरगर्दी कहते हुए 21 नवम्बर रविवार को पहले पन्ने पर ही प्रकट हो जाते हैं और इस तरह की ख़बरों को पूरी तरह भ्रामक बता ख़ारिज ही नहीं करते बल्कि यह भी कहते हैं और कहीं न कहीं मीडिया इसके तह तक न पहुच जाये इसलिए मीडिया कर्मियों  को ही सोची समझी चाल के तहत बहुत खूबसूरती से इसमें लपेट दिया गया है. इसके पीछे किसका हाथ है यह भी उन्हें पता है आगे और सूंघते सूंघते वे घिसते हैं की इस तरह के खुलासों के जरिये यह कोशिश हो रही है की 2G स्पेक्ट्रम घोटाले में जो असली मुद्दा है उस पर पर्दा पड़ जाये.

संतन को सीकरी सो काम 

तीस नवम्बर रात दस बजे बरखा दत्त  कठघरे में थीं और सामने सवालों की फेहरिस्त थी. क्या बरखा ने नीरा राडिया के इशारे पर 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले के केंद्र में मौजूद डीएमके नेता और पूर्व टेलीकॉम मंत्री ए राजा के लिए लॉबिंग की है? अगर बातचीत लॉबिंग का हिस्सा नहीं थी तो फिर ऐसी कौन सी मजबूरी थी, जिसके तहत एनडीटीवी की ग्रुप एडिटर बरखा दत्त ने एक पीआर एजेंट को मंत्रिमंडल गठन की सूचनाएं दीं और उसके कहने पर कांग्रेस के नेताओं से बातचीत की? ऐसे ढेरों सवाल थे, जिनका जवाब सभी जानना चाहते थे।ऐसे में आप उसे एक एरर ऑफ जजमेंट (फैसला लेने में हुई चूक) कह सकते हैं। बरखा ने कहा कि वो इस गलती को मानने को तैयार हैं। लेकिन किसी को यह हक नहीं कि उसे भ्रष्टाचार से जोड़ दे.उनके पास सबका एक ही जवाब 'एरर ऑफ जजमेंट ' ही था. बरखा गलती को मानने को तैयार हैं पर इसे भ्रष्टाचार से जोड़ने का हक वे किसी को नहीं देती हैं. 

वीर संघवी  अपने हिंदुस्तान टाइम्स  में छपने वाले कॉलम काउंटरपॉइंट  में इसे संकट का समय बता अपने ऊपर लगे आरोपों को उपरोक्त मीडियापर्सन की तरह मिथ्या बताते हुए अपने को रिन से धुला लिखते हैं और कुछ समय तक इसे स्थगित कर आराम करने को चले जाते हैं.अगली सुबह सोमवार सुबह इसे लेख का हिंदी में अनुवाद हिंदुस्तान हिंदी हमारी आँखों के सामने पढने के लिए परोसा हुआ मिलता है.

दोनों अपने अपने बयानों में लौबिस्ट शब्द पर ऐतराज़ जाहिर करते हुए यही दावा किया है की राडिया के साथ उनकी बातचीत पत्रकार के रोज़मर्रा के कामकाज का हिस्सा भर है. 

हैं और भी दुनिया में सुखनवर  

टेप किये गए कॉल्स में प्रभु चावला, एमके वेणु , जी गणपति सुब्रह्मण्यम  भी राडिया से टेलीकोम लाईसेंस से लेकर गैस मूल्य परअम्बानी बंधुओं  के बीच जारी विवाद और तमाम मसलों पर सलाह और कारोबारी सूचनाएं साझा करते हुए सुनाई देते हैं. इन टेपों से देश में सक्रीय एक व्यवस्थित साजिशी तानेबाने का पता तो चलता ही है वहीँ यूपीए सरकार के पास अरसे से उपलब्ध इन टेपों पर चुप्पी हैरान करती है.

देश का नमक और कई सारे पुर्ज़े 

यहाँ ये बात ध्यान रहे ये वही पीआर एजेंट नीरा राडिया  हैं, जो देश की दो सबसे बड़ी कंपनियों (टाटा ग्रुप और रिलायंस ) का काम देखती हैं.जिनके क्लाइंटों में आईटीसी, महिंद्रा, लवासा, एल्ड हेल्थकेयर, स्टार टीवी,यूनिटेक, इमामी  तक के नाम हैं और जिनके बारे में कहा जाता है की इनकी सेवा तेलगुदेशम पार्टी के चन्द्रबाबू नायडू  से लेकर नरेन्द्र मोदी  तक लेते आयें हैं और इन्ही राडिया की भूमिका के चलते नैनो प्रोजेक्ट बंगाल से गुजरात आ पाया.

और जब टाटा समूह अपने ही टाटा फायनांस के दिलीप पेंडसे  खिलाफ अपराधिक कार्यवाही करना कहते थे तो दिल्ली की क्राइम ब्रांच ने इन्ही राडिया के कहने पर उन्हें ग्रिफ्तार किया था.एजंसियों के पास जो बातचीत है उसके कुछ हिस्से राडिया का सम्बन्ध लन्दन स्थित वेदान्त  समूह से भी जोड़ता है.वेदान्त समूह ने राडिया को भारत में अपनी नकारात्मक छवि बदलने की जिम्मेदारी सौपी थी और जिसके नतीजन अख़बारों पत्रिकाओं में उसे अच्छा बताए हुए कई महंगे विज्ञापन देखने को मिले.इतना सब कुछ जानने बूझने वाली तहलका  अपने हिंदी संस्करणों में इसे अभी तक क्यों नहीं ला पाई है.यही वह चुप्पी है जो खटक रही है.क्या हिंदी वालों को इसे जानने की कोई जरुरत नहीं..

वहीँ अब तो देश का नमक  बनाए वाले, इस देश के मध्यमवर्ग को नैनो  कार देने वाले रतन टाटा इन टेपों के सार्वजानिक हो जाने को अपने निजता के अधिकार का हनन पाते है और अब तक न्यायालय भी जा चुके हैं. आउटलुक  कहता है कि उन वार्तालापों में रतन टाटा इच्छा जाहिर करते हैं कि किसी भी हालत में दयानिधि मरण को संचार मंत्री बनने से रोकें.उन्हें राडिया की ताकत का पता भी था क्योकि मधु कोड़ा  के मुख्यमंत्री रहते हुए टाटा के खनन पत्ते की अवधि का विस्तार राज्यपाल से करने वाली महिला भी यही राडिया तो थीं.उनका यह कदम बताता है की कितना कुछ और उन बातचीतों में छिपा पड़ा है जिसको कोई नहीं चाहता की सामने आयें.

दो नजरियें और आपका चुनाव

इनमे एक तरफ पी साईंनाथ  हैं जो,स्टेनोग्राफी और अपने स्वतंत्र निष्पक्ष व्यक्तित्व  में से आपको चुनने को कहते हैं और दोनों में विभाजन रेखा तो हमें ही खींचनी होगी न. वे पत्रकारिता के चारित्रिक परिवर्तनों को तो रेखांकित करते ही हैं और उसके खुद कॉर्पोरेट बनने की तरफ इशारा करते हैं साथ ही सरकार की बदलती प्राथमिकताओं की तरफ भी इशारा  करते हुए कहते हैं की यही सरकार द्वारा मरते जान देते किसनों पर कोई संसद सत्र नहीं होता वहीँ अम्बानी बंधुओं के नाम पर पूरा दिन व्यतीत कर दिया जाता है.जबकि कृषि पिछले दस वर्षों में सबसे प्रभीवित होने वाला क्षेत्र है.वहां कई सारी बातें और हैं जिनपे अभी नहीं.

दूसरी तरफ IIPM के अरिंदम चौधरी  'द सन्डे इंडियन ' के 12 दिसम्बर के अंक में खड़े हैं लोब्बिंग की पूरी पश्चिमी सुदृढ़ परंपरा का इतिहास लेकर. अमेरिका के ओबामा से लेकर वहां के - पश्चिम के - पत्रकारिता मूल्यों को खंगालते हैं सिर्फ उस लॉबिंग को स्वीकार्य बनाने के लिए उसे एक स्वतंत्र पेशे के रूप में देखने और उसके पुरे अर्थशास्त्रीय आंकड़ों का नजरिया लिए हुए वे आयें हैं नीरा राडिया पर फिर बरखा और वीर पर.उनकी नज़र में आप लोबिस्ट होकर तो अपने मूल्यों को उसी अनुरूप निर्धारित करेंगे और पत्रकारिता के अपने ढंग से.मतलब अगर ये दोनों लोबिस्ट होते तो भी इन्हें कोई गुरेज़ नहीं.

चूँकि न इन दोनों का ट्रैक रिकॉर्ड ऐसा है और न ही टेपों में ऐसा कुछ मिला है इसलिए उनके अतीत की साख जो इन दोनों ने वे थे पोपले और काउंटरपॉइंट  लिख कर अर्जित की है उसके अनुसार वे अरिंदम चौधरी की अदलत में बाइज्ज़त बरी किये जाते हैं पर उन्हें ये नहीं पता इस पुरे खेल में उन्होंने अपनी कलम से नीरा राडिया के पेशे को न केवल एक व्यवसायिक कुशलता के रूप में स्थापित किया है बल्कि एक सोफ्ट कॉर्नर रख अपने पाठकों को भी ठगा है.
  
उत्तरपीठिका  :
 
कईयों को इस पूरे प्रकरण में प्रभाष जोशी  भी याद हो आये हो तो कोई नई बात नहीं. उनको तो आज भी
सावधान,आगे पुलिया संकरी है  टाइप इतवारी कागद कारे  चाहिए. पर इतना सब लिखने के बाद मैं वहीँ खड़ा हूँ जहाँ से शुरू हुआ था:

"इस तरह सवाल और जवाब की मंजिलें -
तय करके
थका-हरा सच -
एक दिन अपने खोये हुए चेहरे में
वापस आता है ,
और अचानक ,एक नदारद -सा आदमी
समूचे शहर की ज़ुबान बन जाता है  "


मुझे इसका जवाब रण  के अमिताभ बच्चन टाइप नहीं चाहिए न ही बागबान  की कोई लम्बी चौड़ी पोलपट्टी से इस बार मै मानने वाला हूँ. मुझे तो उस दिन का इंतजार रहेगा जब रवीश  अपने कस्बे पर इस सन्दर्भ पर कुछ लिखेंगे,विनोद दुआ  अपने लाइव में कोई स्टैंड लेंगे..और भी कई हैं जिनकी जुबान को लकवा मार चुका है. इस बार ये षण्यंत्रकारी चुप्पी टूटनी चाहिए नहीं तो हमें भी पता है हमाम में सब नंगे खड़े रोज़ यही बतियाते हैं कि..कुछ नहीं होने का इस बार भी..!!

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