दिसंबर 19, 2010

इतवारी दरियागंज और किताब बाज़ार

पता नहीं इन मूई किताबों से हम कैसे जोंक की तरह चिपक उसे चूसने को मजबूर कर दिए गए. और नामुराद कौन सी घड़ियाँ थीं जब एक इतवार सात सौ उन्तीस पकड़ डिलाईट.. हाँ शायद तब हम दसवीं में गए गए थे.तभी से कुछ चस्का हाँ चस्का ही लगा कि स्कूल की जिल्दों से कुछ खुजली सी होने लगी और खुजाते खुजाते हम उनसे दूर अपने को इस तरफ पाने पाए जाने लगे.तब से लेकर आज तक कितनी ही किताबों को रद्दी से भी कम दाम पर वह से बटोर-बटोर कर इस घर को भरते रहे अब तो माँ भी आतंकित सी रहती है की वहां जाये तो कुछ और को न लाद लाये..काहिर अभी इस पर कोई नॉसटेल्जिक संस्मरण नहीं लिख मारने वाला आज सिर्फ इस बदलते हुए बाज़ार की चाँद तस्वीरें भर जिनमे इस समय की कई कई व्याख्याएँ हैं और जिनकी पहली टीकाएँ हम किये देते है आगे की आप खुद करें..इतनी स्वतंत्रता तो आप ले ही सकते हैं..तो हो जाये एक नज़र अपने प्यारे से रविवारी संडे मार्केट की एक सैर..जहाँ इतिहास से लकर भविष्य तक है हफ्ते बिछा मिलता है..तो शुरू करते हैं डिलाइट से..


इसी पर एम.ए. में दाखिला लेने के बाद दिल्ली में पहले पहल मूवी अकेले जाकर देखी चक दे इंडिया..सारी आशाओं-प्रत्याशाओं को धता देकर हमने ज़ाकिर हुसैन में दाखिला किया था और इस हॉल में अकेले जाना सीमित परिधि में एक पहला नकार-सा था उसकी कहानी कभी अपनी आत्मकथा में जब हम मुड़ मुड़ कर देखेंगे..


शिक्षा का अधिकार. बड़े शोर शराबे के बीच सरकार लायी और उसका हश्र उन शिक्षा संस्थानों के बाहर कुछ यूँ ही दिख पड़ता है, अन्दर तो स्थिति इससे भी गयी गुज़री है, जिनमे पब्लिक स्कूलों ने और अंधेरगर्दी मचा रखी है.


किताबों की यही गत है यहाँ. पर कुछ लोग इन्हें बचाने हर हफ्ते आते-जाते रहते हैं..बेचने वाले ने इन्हें कबाड़ के दाम से ख़रीदा और हम आप फिर रद्दी के भाव चुका उन्हें बटोर लेते हैं. इतना डिस्काउंट तो कहीं भी किसी दुकान पर नहीं मिलता..यहाँ तो पूरा का पूरा बाज़ार लगा है..!!


हिंदी की कुछ किताबे यहाँ दिखाई पड़ती हैं वो या तो एनसीइआरटी की कोर्स की होती है या हिंदी की बहुतायत में छपने वाली स्वघोषित अखबारी सूचनाओं वाली खबरिया पत्रिकाएं या ऐसी ही राजा पॉकेट बुक्स की तरह लुगदी किस्म की रद्दी की तरह. रौयल्टी समाप्त और इनकी सेवाएँ शुरू. प्रेमचंद से लेकर प्रसाद तक के जनसुलभ संस्करण सड़क पर पड़े होते हैं. अपवाद स्वरूप हिंदी की कुछ ठीक-ठाक किताबें ओरिएंटल इन्शोरेन्स बिल्डिंग के पास कभी-कभी कुछ मिल जाती हैं, पर आपकी आँखों को नज़र आनी चाहिए..लगे हाथ शिवमंदिर के मुहाने पर कचौड़ियों का आनंद भी लिया जा सकता है..


यह वही सड़क है जिसे कभी फैज़ बाज़ार कहा जाता था और ये इलाका शाहजहानाबाद में आता था, आज उसी विरासत के संरक्षण के लिए एक शाहजहानाबाद पुनर्विकास निगम भी है, जिधर से गाड़ियाँ आ रही हैं उधर दिल्ली दरवाज़ा और जिधर जा रही हैं उधर कश्मीर की तरफ खुलता कश्मीरी दरवाज़ा..और इसी सड़क पर आगे चल कर गोलचा भी पड़ता है जो इस तंगहाली में बंद होते और मल्टीप्लेक्स होते जाते सिनेमाघरों के समय के बीच अपना अस्तित्व बचाए हुए है, और वो लोहे का पुल भी जहाँ तक ये किताब बाज़ार फैला हुआ है..


शोले तीस साल बाद आज भी किसी न किसी रूप में हमसे टकरा ही जाती है.जैसे हमारा कैमरा टकरा गया इस पोस्टर से जिसमे गब्बर है ठाकुर है वीरू की गला घोटू पकड़ है..राजू श्रीवास्तव तो अपनी शोले बना ही चुके हैं और अगले साल 'यमला पगला दीवाना' में एक बार फिर कोई टंकी पे चढ़ गाँव वालों को पुकारने जा रहा है..


यहाँ सब मिलेगा सब मिलेगा दुनिया की कोई ऐसी किताब नहीं जो हमारे पास न हो.रस्ते का माल सस्ते में रस्ते का माल सस्ते में..रचनात्मकता की हद पे एक हवि इनकी भी स्वीकार हो.


राष्ट्रीय संग्रहालय जाकर टिकट कौन खरीदे जब इतिहास हमें ऐसे ही सहजता से हमारी नसों में समां जाये, शैक्षिक भ्रमणों में एक सैर इस पुरानी दिल्ली की भी हो जाये तो क्या उनका बोध खुद विकिसित नहीं हो पायेगा या जो पेंचोखम हैं उनको ऐसे जीवंत विरासतों से कुछ कम नहीं किया जा सकता.


भले 'मोज़र बेअर' राईट क्लीक को नेस्तेनाबूत कर डिजिटल कॉपीराईट का डंका पीट रहा हो और आप उनकी सीडी-डीवीडी लाकर अपने सिस्टम पर कॉपी न कर पा रहे हों और इस समस्या से प्रताड़ित हों की न केबल वाला आपके टेस्ट की मूवीज़ नही दिखा रहा और पालिका बाज़ार में सस्ती फिल्म प्रतियाँ नही मिल पा रहीं हों तो आपका स्वागत है हर रविवार. इस दिन तो लाल किला लाजपत राय मार्केट जाने का झंझट भी नहीं यही इसी बाज़ार में आप कोई भी सीडी खरीद सकते है पायरेसी गयी भाड़ में पुलिस भी कुछ नही कहेगी क्योकि उसी की नाक के नीचे तो ये सब होता है और वैसे भी भूल गए क्या आपके साथ आपके लिए सदैव...???


आप दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र है और परीक्षाओं के दिन आपको इस किंग चैम्पियन की याद नहीं आई बात कुछ समझ नहीं आयी..मतलब आपके खालिसपने में थोड़ी मिलावट है जो आप इन नन्दलाल दयाराम के स्नातक स्तर की कुंजियों से परिचित नहीं हैं..हाँ जी यही सच्चाई है इस विश्वविख्यात विश्वविद्यालय के शिक्षा तंत्र की जहाँ प्रोफ़ेसर से लेके रीडर के स्थान्नापन्न के रूप में नई सड़क इन्हें रिक्रूट करती है इन रंगरूटों से मार डांट फटकार अटेंडेन्स उपस्थिति का झंझट भी नहीं..


अरुण इसे लोहे का नहीं लकड़ी का पुल कहता है शायद मोर सराय, चांदनी चौक इलाके में यही कहते हों और वजीराबाद और शात्रीपार्क जाते पुल को लोहे वाला पुल कहते होंगे खैर कुछ भी हो हम तो यहाँ तक आते ज़रूर है..हाँ इसी पुल पर देव डी का का एक सीन जिसमे अभय देओल पुल पर चल रहा है वह शॉट यहीं शूट किया गया था.


वह जो मंदिर दिख रहा है पहले सिर्फ इंट पत्थर से घेर घर रखा था, वहां मानविकी की बहुत सी किताबें मिल जाया करती हैं और यही कहीं से इतिहास की हिंदी माध्यम क्रियान्वयन की कई सारी किताबें लाया था कभी..यहीं यह बोध भी एक साथी ने कराया की भूगोल की कोई किताब कम से कम इस समय पुराने संस्करण की नहीं लेनी चाहिए और न ही संविधान पे..बात बहुत पुरानी है.


किसी को मोल भाव बारगेनिंग की विद्या में निपुण होना है वाक् चपलता लानी है तो हर हफ्ते यहाँ की परिक्रमा करे. भले कोई किताब ले-न-ले पर इन दुकानदारों से ढेर सारी बातें ज़रूर करनी चाहिए..वह सब अपनी फ्री सेवा देने को तैयार हैं कोई आये तो सही..आप आएंगे न इस हफ्ते..


इस लोहे के पुल के नीचे की विशेषता है देसी विदेसी पत्र पत्रिकाएं..किसी भी प्रजाति किसी भी स्ट्रीम की. कुछ की बानगी National Geographic - Issues, Maps, Books - Life Magazine- Time - Look -Saturday Evening Post - Collier's - New Yorker - Newsweek - People -Atlantic/Harper's - Fortune – Sports Illustrated – Ebony – Vanity Fair – Rolling Stone – Ladies Home Journal – Holiday – Smithsonian – Mad Magazine – TV Guide – Holiday – Vogue – Harper’s Bazaar -Condé Nast Traveller -Antiques Journal -Forbes - Elle -Playboy और पता नहीं कौन-कौन सी आपके हाथ लग जाएँ..


और ये रहा लोहे का पुल और हमारी यात्रा यही समाप्त होती है..पढने से क्या होता है कभी खुद आकर भी देख जाओ.इस जीवित विरासत को संरक्षित हमें ही करना है कोई बाहर से नहीं आएगा..साथ ही इस पोस्ट मोर्डेन संस्करण को इसकी खासियत खामियों की साथ स्वीकारना होगा..कहीं और सड़क किनारे किताब बाज़ार लगते देखा है..इतनी शिष्ट्ताओं विशिष्टताओं के साथ..

आवाज़ें..

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