दिसंबर 09, 2010

केबीसी के बहाने सपनों की पिच्चीकारी करते हमलोग : कुछ रीडिंग्स

स्लमडॉग मिलीनियर का जमाल, कौन बनेगा करोड़पति में एक के बाद एक पूछे गए सवालों के जवाब  सफलतापूर्वक देता जाता है और अंततः सबसे बड़ी इनामी राशि जीत जाता है. लेकिन यही जीत उसकी मुसीबत बन जाती है, जब प्रस्तोता महोदय को उसके ज्ञान पर शंका होती है. वही ज्ञान जो सदियों से इन पढ़े लिखों की बपौती रहा, जिसके चलते कहीं अंदर टीस होती है कि विजेता उस वर्ग से क्योंकर नहीं आया.

ये अलग बहस का विषय है कि उन पूछे गए प्रश्नों का सम्बन्ध ज्ञान से है या सूचना से? आज उस विमर्श की बात नहीं. बहरहाल, इधर जमाल उनके इस वर्चस्व को चुनोती देता, पुलिस के चुंगुल में फंस जाता है.

वहाँ एक-एक कर उन सारे सवालों की गुत्थी सुलझती जाती है, जो सिर्फ सवाल नहीं, उसके जीवन का हिस्सा थे। जिसे जीने को अभिशप्त बना दिए गए सच से सिल्वर स्क्रीन ताकते दर्शकों का साबका होता है. यही उस जीवन का वह सच था, जिसे इसतरह दिखाने पर हिंदुस्तान वाले आसमान सर पर उठाये हुए थे. उन्हें यह औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त उस पश्चिम का अश्लील प्रहसन लग रहा था, जो हमारी गरीबी बेच रहे थे. पर सवाल ये भी है क्या आज भी हम उस ग्रंथि से खुद निकल पाए हैं??

इस बार का कौन बनेगा करोडपति, सीज़न फोर  सिर्फ स्टार प्लस से सोनी पर ही नही आया, उसकी पैकजिंग भी कुछ अलग किस्म की थी. 'कोई सवाल छोटा नहीं होता, वह आपकी जिंदगी बदल सकता है' . उस पांच करोड़ का मालिक बना सकता है, जिसे हर महीने बीस हज़ार कमाने वाला व्यक्ति, अपने जीवन के मात्र 125 साल लगाकर प्राप्त कर सकता है. उससे भी आसन तरीका, ये क्विज़ शो है. बस फ़ास्टेस्ट फ़िंगर फ़र्स्ट के बाद उस हॉट सीट तक पहुँचने की देर है.

करोड़पति बनाना इस देश के आम आदमी का एक ऐसा सपना है, जिसके पूरा होने की वह किसी भी जायज़ तरीके से उम्मीद नहीं कर सकता. या तो उसे नेता बन जाना होगा या दिल्ली की दीवार  में सेंधमारी करनी होगी. मतलब रास्ता अवैध ही है.. हाँ आप शेयर मार्केट में जुआ भी खेल सकते हैं, पर वहां पूंजी लगनी भी पड़ती है. पर इस कार्यक्रम में न श्रम है, न पूंजी। उलटे तीन दिन का मुफ्त में बम्बई दर्शन और सदी के महानायक से रूबरू होना का चान्स.

इसबार जमाल वाले वीडियो पहले ही शूट कर लिए गए थे। माने आप कैसा जीवन अभी तक बिता रहे हैं, आप किन समस्याओं से खुद को घिरा पाते हैं. और इस शो को कुछ इस तरह से आपका साथी बताया गया कि इसका आपके जीवन में अहम हिस्सा है। दर्शकों की संवेदनाओं को उस प्रतिभागी के कष्ट से जोड़कर एक नया उपभोक्ता वर्ग खड़ा किया जा रहा था, जिसमें लखीमपुर खीरी से लेकर उन कॉंस्टेबल दंपत्ति हैं भी हैं, जिनकी बच्ची के दिल में छेद है, और उनके परिवार वाले प्रेमविवाह के बाद से ही उनसे बात भी नहीं करते. कोई इस सपने के साथ आया है कि अपने इलाके में पढ़ने लिखने की सुविधाओं को और अच्छे तरीके से जुटा सके। इतनी इतनी राशि एक झटके से उनके खाते में पहुच जाती है जिस तक आजीवन नहीं पंहुचा जा सकता था.

सपने कौन सी ऑंखें नहीं देखतीं. एक ऐसी जगह का सपना जिसे मुकम्मल रूप में घर कहा जा सके, उस चारदीवारी से निकलने की छटपटाहट, जिसमे अपने जीवन के बेहतरीन साल तंगहाली, पेट काटकाट गुजारने के बाद टीस सी उठती है कि क्या दे रहे हैं अपनी संतानों को..यही चूना पुती सीलन, बदबू मारता पलस्तर, पेड़ की छाल की तरह दीवार से उतरता कमरा..??

सीधे-सीधे जो काम सरकारी तंत्र को स्वस्थ विकास योजनाओं के जरिये अपनी दूरदृष्टि के ज़रिये करना चाहिए था, उसे ये पूंजीपति मीडिया संसथान, अपने कंधे पर रख अपनी दुकान चला रहा है. खैर

हर नए प्रतियोगी के आने पर कैमरा डार्क एरिया से होता हुआ पहले अमिताभ पर फिर उसकी तरफ मुखातिब. एक नज़र उस टचस्क्रीन कंप्यूटर पर भी पड़ती है जिस पर एक कोने पर वीडियोकॉन की चेपी चिपकी है. हर पांचहजारी सवाल सिर्फ पूछा नहीं जाता, उसका शुभारम्भ होता है, जिसे कैडबरी  ने अपने उत्पाद से जोड़ उसके मायने बदल दिए है. एक मानी तो हम भी लगा सकते है कि संकटहरता पुरोहित के समुख आप जजमान स्वरुप बैठे कोई अनुष्ठान संपन्न करवाने जा रहे है, जिसमे शनि की साढ़ेसाती से लेकर मंगल की कुदृष्टि तक का समाधान निहित है.

फ़ोन-अ- फ्रेंड जैसी कलयुगी नारद सेवाएँ भी आपकी सहायता के लिए मौजूद हैं. बेटा आइडिया  का ब्रांड अम्बेसडर है इसलिए भरोसेमंद यही सेवा प्रदाता है, आपकी लाइन कटेगी नहीं..फिर एक लाख वाला सवाल भी तो पूछा जा रहा है, उसके प्रायोजक भी यही कम्पनी है. इसलिए बीच में विज्ञापन देखना अनिवार्य तत्व है. वहीँ घरों पर देखता दर्शक अपने तथाकथित ज्ञान की परीक्षा करता जाता कि उसे भी उस सवाल का जवाब पता है, वह भी जीतने की क्षमता रखता है और यहीं वह स्वयं को उस जाल में फंसने के लिए तैयार करता है जो उसे फ़ोन करने के लिए प्रेरित करती है.

वहां बैठा व्यक्ति सिर्फ प्रस्तोता ही नहीं बॉलीवुड का महानायक भी है. हिंदी के कवि का पुत्र भी है. इसलिए बीच-बीच में बच्चन की कविताई भी चलती रहे तो समां और बांध जाता है. आवाज़ का जादू ऑल इंडिया रेडियो वालों ने नहीं पहचाना तो अच्छा ही किया. रवि बजाज द्वारा डिज़ाइन किये वस्त्रों में शुशोभित देवदूत तारण हरता देव ही है। वही इस भाव सागर से आपको पार कराएगा..कम से कम एक सीमा तक भ्रम तो यही देता है.. बार-बार उस जीती जा चुकी रकम का महत्त्व बताते हुए कविपुत्र उसकी टीका करते चलते हैं, जो एक हद तक टीवी पर देखते उस दर्शक के लिए हीनताबोध से कुछ पल के लिए ग्रस्त तो करते हैं; पर अगले दिन ऑफिस की बतकहियों में इन सवालों के जवाब बता अपनी बेहतर स्थिति दर्शा अगले विजेता के रूप में खुद को स्थापित कतरे हैं.

इस गरीब देश को अमीर बनाने का खेल कुछ इस तरह से खेला जाता है जिसमे ज्ञान के बदले सूचना के महत्त्व को तरजीह दी जाती है। सवाल कुछ इस तरह से गढ़े जाते हैं कि उसमें सीआईडी के सालुंखे से लेकर आईपीएल, बॉलीवुड तक की घुसपैठ होती है. सामान्य ज्ञान के नाम पर सतही उछला प्रश्नोतर. एक भी पैसा न जितने वाले और लाखों गड्डियाँ ले जाने वाले का जवाब देने वाले दोनों प्रतियोगियों में बुनियादी फर्क क्या है?? मालूम नहीं..शायद कोई भी न हो..

यहाँ पूछे जाने वाले सवालों की प्रकृति सूचनापरक ही है. इस तरह के सवाल विवेक पर नहीं बल्कि उस याददाश्त पर निर्भर करते हैं. सीखने की अवैज्ञानिक प्रक्रिया है रटना, यह एक तरह से उसकी बड़े पैमाने पर परीक्षा है. मुमकिन है कि इसमें सबसे ज़यादा राशि जीतने वाले और खाली हाथ लौटने वाले में बौद्धिक स्तर पर कुछ भी अंतर न हो. इस जैसे कार्यक्रम ज्ञान को सूचनाओं से स्थानापन्न कर रहे हैं. हद तो तब हो गयी जब गौर से दखने पर ये छड़ी हाथ लगी की अमिताभ इसी वर्ष गुजरात के ब्रांड अम्बेसडर बने हैं और यहाँ भी बहुतायत में सवाल उसी वाइब्रेंट गुजरात से सम्बंधित थे.

यहाँ ये सवाल बेमानी हो जाता है की कौन इस इजारेदार पूंजीवादी व्यवस्था में करोड़पति अरबपति बन रहा है. विकासशील देशों में नव-साम्राज्यवादी मानसिकता  से ग्रसित उत्पादन संस्थाएं घुसपैठ कर, बाज़ारों में खड़े व्यक्ति को उपभोक्ता बना उसकी जेब काट रहीं हैं. यहाँ तक कि खाली समय नामक मद इस परिवार नामक संस्था से गायब हो चुकी है और नयी संकल्पनाएँ तरह तरह के रास्ते खोज रही है, तभी तो इधर टीवी पर पता नहीं चलता हम फिल्म देख रहे थे या विज्ञापनों की अवली.. आज हमारी हैसियत सिर्फ अदने से उपभोक्ता की है और कुछ नहीं..

और ऐसे उपकारी संस्करण बरसते बाज़ार हो कर ही गुजरते हैं..बिल गेट्स  से लेकर वारेन बफेट  तक के उपकार इसी श्रेणी में आते है..

यह सीज़न ज्ञान से लेकर जीवन, मूल्य, पूंजी, श्रम, टीवी, बाज़ार, दर्शक, प्रस्तोता सबको अलग मानी दे गया, उनकी घुसपैठ के नए अर्थ नए पाठ दे गया है, जिन्हें सावधानी से पढने की ज़रूरत है..

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