जनवरी 04, 2011

सिनेमा का शैक्षिक सन्दर्भ

१९२६ में महात्मा गाँधी ने 'यंग इंडिया' में सिनेमा की आलोचना करते हुए लिखा था- " इसका बुरा प्रभाव प्रतिदिन मेरे ऊपर पड़ता है. " १९३५ में प्रेमचंद 'हंस'में लिखते हैं -" सिनेमा अगर हमारे जीवन को स्वस्थ आनंद नहीं दे पाता है, हममें निर्ल्ज्जत्ता और धूर्तता और कुरुचि को बढ़ाता है, और पशुता की और ले जाता है ,तो जितनी जल्दी उसका निशान मिट जाये, उतना अच्छा." वृन्दावन लाल वर्मा ने भी कभी लिखा था ,सिनेमा को काली मैया उठा ले जाएँ. वास्तव में यदि कोसने से ही बुराइयों का अंत होना होता तो अब तक हम लोग रामराज्य में रह रहे होते.किसी भी बुरे की उपेक्षा कर उसे समाप्त नहीं किया जा सकता समाप्त करने के लिए कोशिश करनी पड़ती है. १९६५ में वृन्दावन लाल वर्मा ने भी इसे महसूस करते हुए लिखा था,'फिल्म का प्रभाव दर्शक - श्रोता पर बहुत शीघ्र और गहरा पड़ता है. गन्दी फिल्मों की बहुतायत है, जो समाज को पतन की और ले जा रही है. अपनी संस्तुति की रक्षा और देश के ऊँचे आदर्शों को बचाने, ऊपर लाने की बड़ी आवश्कता है. लेकिन चिंता की बात है की क्या इतने प्रभाव को सकारातम बनाए के लिए कोई सक्रिय प्रयास किये गए ???  सिनेमा संस्तुति के लिए यह किसी विडम्बना से कम नहीं कि लगभग ४० वर्षों बाद भी वर्मा जी के सवाल प्रासंगिक हैं.

१८९६ में यूरोप में लुमियर बंधुओं द्वारा किये गए सिनेमा के प्रथम प्रदर्शन के कुछेक महीनों बाद ही सिनेमा भारत में भी देखा जा सका था. १८९७ में यहाँ प्रायोगिक स्टार पर फिल्म बनाए कि शुरुवात भी हो गयी थी.१९१३ में दादा साहेब फाल्के ने यहाँ अपनी फीचर फिल्म 'राजा हरीशचन्द्र' पूरी की और आज लगगभ ८०० फ़िल्में प्रति वर्ष निर्मित कर हम दुनियाभर में शीर्ष पर हैं.तमाम नाराजगियों उपेक्षाओं अवहेलनाओं के बावजूद भारत में सिनेमा का इस स्थिति में पहुँच पाना निश्चित ही इस माध्यम की ताकत का एहसास करने के लिए काफी है.

सिनेमा की ताकत का सबसे बड़ा कारन सरफ यही नहीं है की हम चीजों को घटनाओं को वैसे ही देखते हैं,जैसा वह है या हुआ है. बल्कि मानसिक रूप से हम भी घटनाओं के अन्दर होते हैं.वास्तव में किसी भी दृश्य के केंद्र में दर्शकों के आँख और कान के साथ दिमाग की भी सहभागिता ज़रूरी होती है.सिमेना की यह विशेषता है की यह जितनी सामने  दिखती है उतनी ही हमारे दिमाग में भी बनती है.किसी कलाकार को पहाड़ पर चढ़ाई पार करते हुए देखते हैं.पहाड़ पर चढ़ते आँखों से देखते हैं, कानों से उसके पैरों की आवाज़,कीलें गाड़ने की आवाज़,आसपास के वातावरण जंगल झरने वगैरह की धवनी भी सुनते हैं. सारा कुछ वास्तविक, लेकिन वास्तविक समय का सिर्फ हमें अहसास कराया जाता है. सात दिन के वास्तविक समय में पूरी होने वाली चढ़ाई को सिर्फ सात शौटों में सात मिनट से भी कम समय में दिखा दिया जाता है. बाकि की कमी हमारा दिमाग पूरी करता है. वास्तव में कलाकार को पहाड़ी चढ़ते सिर्फ हम देखते ही नहीं ,उसके साथ होते हैं ,मानसिक तौर पर. अस्च्रय नहीं की लुए बुनेवेल ने माना था सिनेमा हमारे दिमाग पर अफीम - सा असर करता है.

जे. पी. दत्ता  की ' एलओसी-कारगिल ' वैचारिक स्तर पर बहुत परिपक्व नहीं रहते हुए भी तकनिकी कुशलता के लिए देखी जानी चाहिए. फिल्म में हमेशा ही दर्शक सबसे उचित जघह पर होता है , जहाँ से पुरे दृश्य में उसकी भागीदारी हो सके, अधिक से अधिक वह देख सके अधिक से अधिक वह सुन सके. एक और कारगिल की विकत परिस्थितियों को दिखने के लिए एरियल शोट का  इस्तेमाल किया जाताहै तो दूसरी और सैनिकों के पीछे कैमरा हाथ में लेकर दौड़ा भी जाता है ताकि अनगढ़ पहाड़ियों का 'जर्क' दर्शक भी महसूस कर सकें. कैमरे की कुशलता इसी से आंकी जाती है कि किस हद ताक वह दर्शक की आंख बन सका है.

मानसिक रूप से अपने आप को दृश्यों के अन्दर महसूस करवा लेने की क्षमता ही है जो सिनेमा को इस कदर संप्रेष्य बनाती है की करोड़ों लोग बिना किसी फिलिमी भाषा और तकनीक की समझ के टिकट खरीदते हैं, फिल्म देखते हैं और अपनी ज़रुरत के अनुसार उसे समझते - स्वीकार करते है. साहित्य या कला को यह सुविधा उपलब्ध नहीं है, साहित्य या कला का रसास्वादन हम तब तक नहीं कर सकते जब तक कि उसके व्याकरण की मोती समझ भी न हो. सिनेमा ने अपने लिए ऐसी स्वाभाविक भाषा का चुनाव किया है जो सामान्य मनुष्य की मात्र आभासी क्षमता के सिद्धांत पर आधारित होती है.

वास्तव में भारतीय संस्कृति ने जब सिनेमा को नाजुक मन बच्चों और किशोरों के लिए त्याज्य माना था तो उसकी वजह सिर्फ यह नहीं की उस समय तथाकथित 'गन्दी फिल्मों' की बहुतायत थी ,उसकी सही वजह तत्कालीन भारतीय समाज की यह प्रोढ़ और वाजिब समझ थी कि सिनेमा कहीं न कहीं हमारे सोचने समझने और कल्पना करने की क्षमता को क्षीण करती है. उन्हें आभास था कि 'कृष' की उड़ान बचों के मस्तिष्क को इस कदर कुंद बना सकता है की वे अन्धानुकरण में चाट से छलांग लगा सकते हैं जबकि उनका 'स्वतंत्र' मस्तिष्क 'कृष' से भी ऊँची उड़ान भर सकता है .वास्तव में हमारे मन में कोई कल्पना आकर लेती तो हम उस कलोअना को साकार करने की कोशिश करने की कोशिश के पूर्व उसे तर्क पर कसते हैं, जबकि सामने साकार दिखते 'सत्य' को देख हमें तर्क करने की ज़रोरत ही महसूस नहीं होती.

हममें से कितने लोग होंगे, जिन्होंने सिनेमा देखने के लिए कभी न कभी डांट न सुनी हो, तमाम विरोधों के के बावजूद यह स्वीकार करने में कटाई ऐतराज़ नहीं हो सकता कि सिनेमा आम जन के मनोरंजन का सबसे सशक्त और प्रभावशाली माध्यम है.भारत में ही नहीं, दुनियाभर में - पकिस्तान, ईरान, श्रीलंका से लेकर इंग्लैंड, अमरीका, जापान तक. मोरक्वेज़  को अपनी क्रांतिकारी विचार धरा के के प्रसार के लिए भी सिनेमा विधा आकर्षित करती है, तो डेविड धवन को अपनी मूर्खताओं से दर्शकों को खुश कर पैसे ऐंठने के लिए भी सिनेमा ही चाहिए.स्थिति आज यहाँ तक पहुँच चुकी है की सिनेमा हमारे घर के अन्दर प्रवेश कर चुका है. हम इसे देखें या नहीं, यह भी अब हमारी इच्छा पर निर्भर नहीं करता है. न्यूज़ चैनल पर भी सिनेमा के लिए अलग स्लोट है, मनोरंजन चैनल पर भी और खास तौर से सिनेमा के लिए भी तो दर्ज़नों चैनल हैं ही.क्या बालो में सर गाढ़कर तूफ़ान को रोका जा सकता है ??

आज टेलिविज़न के विस्तार ने पुरे भारत को आच्छादित कर रखा है. मुंबई के बंदर से लेकर बस्तर की बस्तियों तक दुनिया को उँगलियों के इशारे पर नचाने वाली डिश एंटीना की छतरी देखी जा सकती है.तेलिवाज़ों के साथ भी सिनेमा की संस्कृति हम तक पहुँच रही है.सिनेमा की संस्कृति अब सिर्फ कपडे के फैशों और बालों के सत्यल को प्रभावित नहीं कर रही है बल्कि अब इसने सामाजिक मूलियों को भी प्रभावित करने की ताकत हासिल कर ली है. सामाजिक समस्याओं को सिनेमा ने अपने लगातार प्रभाव से इतना तरल बना दिया है की हिंसा, अपराध, व्यभिचार, बलात्कार अब सब कुछ भी हमें बेचैन नहीं कर पाता.

सिनेमा के इस प्रभाव को समझते हुए पश्चिमी देशों में ५० के दशक से ही फिल्म अध्ययन पर गंभीरता से विचार करना शुरू कर दिया था. शिक्षाशास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों के लिए वहाँ पर चिंता का विषय था कि बच्चे जितना समय स्कूल में व्यतीत करते हैं उससे कहीं अधिक टेलीविज़न के सामने. अपने अध्ययन में उन्होंने पाया कि दो वर्ष की उम्र से ही जब बच्चे मातृभाषा सिखने की शुरुआत करते हैं उसी समय टेलिविज़न और फिल्म जैसे दृश्य श्रव्य मद्यमों से भी सन्देश ग्रहण करना शुरू कर देते हैं.दो तीन साल के बच्चे का कार्टून नेटवर्क के आगे शांत पड़े रहना कोई संयोग नहीं, बल्कि हमें यह स्वीकार करना चाहिए की बाकायदा उसे देख रहा होता है, महसूस कर रहा होता है.

सिनेमा आज हमारी जीवन शैली में शामिल हो चुका है.खाना खाना, ऑफिस जाना, स्कूल जाने की तरह सिनेमा को भी हमने अपनी अनिवार्यता में शामिल कर लिया है.हमें याद है कॉलेज जाने के बाद भी फिल्म पत्रिकाएं हमने अभिभावकों से छिपकर पढ़ीं थीं. फिल्म देखने की बाकायदा अभिभावकों से इज़ाज़त ली जाती थी, वह भी दो - चार महीने में एक बार. यह इजाजत भी ' जय हनुमान ' या ' हिन्दुस्तान की कसम ' देखने के लिए ही मिलती थी. आज आश्चर्य है की फिल्म देखना कोई विषय ही नहीं रहा भारतीय समाज के लिए. यहाँ तक कि व्यस्क प्रमाण पात्र वाली भी फ़िल्में देखने के लिए बच्चों को ले जाते हुए हमें छोटी सी हिचक भी नहीं होती. फिल्म देखते हुए बच्चे ' कमीने ' का मतलब पुंचते हैं और हम मुस्कराते हैं.

तथाकथित आधुनिक होते भारतीय समाज की यह विडम्बना ही है कि यह निरंतर सिमटता जा रहा है. वास्तविक परिवार और समाज से होती दूरी को ' वर्चुअल ' समाज से पाटने की उसके पास मजबूरी होती है. क्योंकि समाज तो चाहिए ही. इस चाहिए के लिए विकल्प उसे सिनेमा से मिला. इस ' वर्चुअल ' समाज की खासियत थी, यह उसकी मांग पर उपलब्ध था. जब भी अकेलापन महसूस हो, चलो सिनेमा.एक सुखद भरे - पूरे वातावरण से संतुष्ट लौटकर फिर लग गए अकेले अपने रोज के जद्दोजेहद  में. शायद इसी लिए सिनेमा देखना जो पहले साल - छः महीने का उत्सव होता था, अब हफ्ते का शगल बन गया.यह भी गौरतलब है कि गाँव, क़स्बा, शहर, नगर, महानगर में जैसे-जैसे पारिवारिक इकाईयां छोटी होती गयीं इस शगल की सघनता भी बढती गयी.यह भी उल्लेखनीय है की इस शगल ने सबसे ज़यादा बच्चों को प्रभावित किया, कियोंकि एकल परिवारों में सबसे अकेले वही थे. आश्चर्य नहीं कि एकल परिवारों के सिनेम अदेखने का निर्णय धीरे धीरे बच्चों के हाथों में सिमटता चला गया. उन्हें मतलब सिनेमा से नहीं , बस सिनेमा घर के मेले और सिनेमा के परदे पर सुलभ 'वर्चुअल' दुनिया से था. और अभिभावकों के लिए उन्हें सिनेमा ले जन वास्तव में कहीं न कहीं स्वयं अपने भरे-पूरे समाज से काटने की एक क्षतिपूर्ति थी.लेकिन 'क्षतिपूर्ति' वास्तव में किस तरह उनकी समझ को अपनी दुनिया के प्रति जड़ बना रही थी, इस पर गौर करने की ज़रूरत नहीं समझी.

आज इस स्थिति में जब सिब सिनेमा के प्रभाव को रोका नहीं जा सकता, क्या बेहतर यह नहीं की लोगों को सिनेमा देखने के से रोकने के बजे उसे सिनेमा देखना सिखाएं. सिखाने का अर्थ है बाकायदा फिल्म अध्ययन. आखिरकार अध्ययन का उद्देश्य क्या है ! कोई भी विषय साहित्य हो विज्ञानं हो कला हो य तकनीक हो हम क्यों पढ़तें हैं! वास्तव में विधिवत अध्ययन का उद्देश्य दिमाग को ऐसे साधनों से लैस किया जाना है की वे ज्ञान की गूढ़ दुनिया को समझ सकें. क्योंकि किसी भी विषय को एक व्यक्ति अपनी समझ से एक सीम तकही समझ सकता है. सिनेमा तो कला की सबसे 'काम्प्लेक्स' विधा है, इसमे साहित्य भी है, कला भी, विज्ञान भी, तकनीक भी. सिनेमा पर हरेक दृष्टिकोण से विचार करने की, अध्ययन की ज़रुरत है. एक कल अमध्यम के रूप में, सम्प्रेषण के एक सशक्त दृश्य श्रव्य माध्यम के रूप में, एक लोकप्रिय जन मनोरंजन के रूप में, सूचनाएं और सामाजिक मूल्य बोध को संचारित करने वाले साधन के रूप में, सांस्कृतिक वातावरण का निर्माण करने वाके एक अभिकरण के रूप में हरेक परिप्रेक्ष्य सिनेमा पर विस्तार से विचार करने की अपेक्षा रखता है. और यह अपेक्षा एक विधिवत नियमित अध्ययन से ही पूरी हो सकती है. फिल्म अध्ययन सिर्फ फिल्म की ही नहीं पूरे सांस्कृतिक वातावरण को समझने में शहयक हो सकता है.

१९८० में नेशनल फिल्म पॉलिसी कमिटी द्वारा फिल्म अध्ययन को राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली में और कॉलेज-विश्वविद्यालय स्तर पर औपचारिक शिक्षा में शामिल करने की अनुशंसा की गयी थी. भारत सरकार ने अनुशंसा स्वीकार करते हुए यू.जी.सी और एन .सी.ई.आर.टी. को फिल्म अध्ययन की दिशा में आवश्यक कदम उठाने के निर्देश भी उस समय जारी किये गए थे. लेकिन आज भी दूरदर्शन के कार्यक्रमों में  'अंडरस्टेंडिंग सिनेमा' की एक सेरिज प्रसारित करने और यादवपुर जैसे कुछेक विश्वविद्यालाओं में शोध और स्नातकोतर स्तर पर एक विषय के रूप में स्वीकार कर लेने के बावजूद फिल्म अध्ययान पहले की तरह अस्पृश्य बना हुआ है.

आज एक और अणि ही संस्कृति को हाशिये पर दाल रखने की ही नहीं, घृणा करने की राजनीति का दबाव, दूसरी और संस्कृति को 'यूनिफ़ॉर्म' बनाने का दबाव और तीसरी तरफ वैश्विक संस्कृति को बढ़ावा देने की कोशिश. कुल मिला कर समय सचेत होने का है. यदि अभी भी सिनेमा पर हमने अपना नियंत्रण नहीं कायम किया तो फिर आगे कितना भी विलाप करें निष्कर्ष हाथ नहीं आ सकता. इसके लिए सबसे पहले एक बार फिर से नेशनल फिल्म पॉलिसी १९८० को याद करने की ज़रुरत है ताकि सिनेमा के प्रति बचपन से ही एक सही समझ विक्सित हो सके. यह एक दिन की कोशिशों से नहीं हो सकता, लगातार विधिवत अध्ययन से ही बच्चों में सही और गलत सिनेमा की समझ को विकसित किया जा सकता है. बच्चों को महँ फिल्मकारों की क्लास्सिक फ़िल्में दिखने की गंभीर कोशिश शुरू की जानी चाहिए, ताकि वे डेविड धवन और विमल रॉय का फर्क महसूस कर सकें.

साहित्य के साथ हमने कोशिश की, आज छोटे से बच्चे को भी प्रेमचंद और प्रेम वाजपई का फर्क मालूम है. आज की सच्चाई  है की लोगों को सिनेमा देखने से रूक नहीं सकते हैं, कोशिश कर सकते हैं की वे सिनेमा को सिनेमा की तरह ग्रहण करें, एक स्वस्थ आलोचकीय समझ के साथ.

साभार : भारतीय आधुनिक शिक्षा , अप्रैल २०१०

लेखक से संपर्क : विनोद अनुपम
                         बी -५३, सचिवालय कालोनी,
                         कंकड़ बाग, पटना - २०, बिहार

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