जनवरी 10, 2011

कल करीब रात की उलझन

कल रात कुछ कलम से लिखने की कोशिश कई महीनों बाद हुई थी तो सोचा उसे साझा कर लूँ ..थोड़ा सावधानी से पढ़ने की कोशिश करनी पड़ेगी, इसलिए ज़रा खेद है..

आज बहुत दिनों बाद कागज़ पर वापस आया हूँ पता नहीं क्यूँ चाहकर भी पीछे लिखना अपनी पुरानी बिमारियों के चलते नहीं हो पाया. हाँ, एक झंडू सा ब्लॉग बना अपने को इन्टरनेट पर छपास छपासी संपन्न लेखक करार दे चुका हूँ. मतलब डिजिटल सायबर स्पेस में एक और लिक्खाड़. जिन्हें कोई प्रिंट में नहीं जनता वे उगलने निगलने जा पहुंचे.

सारी गड़बड़ अपने को साबित कर लेने की है. उस अस्तित्व को दूसरे के सामने लाने की है. कि कैसे आप भी उन करोड़ों लाखों से अलग अपने को खड़ा कर पाने की है. वजूद सिर्फ सांस लेने और फेसबुक की वॉल पर अपनी भड़ास निकालने से आगे का है. क्या हममे वे क्षमताएं- योग्यताएं- गट्स नहीं है कि हम भी एक 'कल्ट' बन सकें??

पूरी प्रक्रिया कुछ ऐसी गड्ड-मड्ड है जिसे समझना आसन नहीं!! कौन सी कसौटियों पर हम खरे नहीं उतरे हमें पता होना चाहिए..

पिछला पूरा साल बस एक सपना लिए डोलते रहे..पर वहां से निकल उस दुपहरी में कदम दरियागंज गोलचा तो पहुंचे पर कभी-कभी लगता है ऐसा नहीं बोलना चाहिए था..ऐसा बोल अपने को बहुत पीछे ले आया..दोनों जगह बोला और कुछ ऐसा बोला कि दोनों तैयार नहीं थे..वहीँ कुछ ऐसा था कि गले में पट्टा नहीं बंध पाया.

इसी विश्लेषण पर न मालूम कितनी रातें रतजगे में ही चलीं गईं. आज भी उसकी कही ये बात कान के इर्दगिर्द घूमती रहती है कि उसने मेरी सीट ले ली. नुक्ता ये भी फेंका गया कि जो डिज़र्व करेगा उसी का तो एडमिशन होगा न..कहने का मतलब तो ये भी था कि हेकड़ी निकल गयी न सारी!! सब समझ कर भी नासमझ बना रहा, क्या बोलता, अभी तक चुप हूं जवाब ढूंढ रहा हूं..

बातें तो बहुत सारी लिखना चाहता हूं पर इधर एक कहानी पे काम कर रहा हूं जिसमे कथा नायक ऐसी जगह फंसा है जहाँ दूसरी तरफ से आये एक एसएमएस से उसकी औकात जैसा कुछ बताने की कोशिश की जा रही है. मतलब नायिका ने अपना मोबाइल नंबर तो नहीं बदला पर इतने महीने बाद नायक की तरफ से गए जन्मदिन मुबारक के जवाब में उसने पूछा, 'हू इज दिस '..!!

यह तो कहानी की एक स्थिति भर है जिसकी शुरुवात वहां से होती है जहाँ इन दोनों पक्षों में बात नगण्य स्तर पर है बस नायिका उसको देखती निहारती भर है. उसकी भावभंगिमा चेष्ठएं निकट आने का उपक्रम यह सब नायक के चेतन अवचेतन पर चलता है. इन सारी संभावनाओ की पुष्टि उससे बात करके ही हो सकती है जिसकी दोनों तरफ से कोई कोशिश नहीं है.

वहीँ नायक के अंतर्मुख में एक पिछला पन्ना भी है जिसमे ग्रेजुएशन में की गयी कोर्ट मैरिज उसकी पत्नी लिखते हुए अजीब लग रहा है. पर हाँ उसकी पत्नी का होली फैमली में दो महीने के गर्भ का अबोर्शन और उसी रात घर जाते समय उसका अपहरण-बलात्कार के बाद उसकी हत्या. यह सब आज तक किसी को नहीं पता, न ही बता दोबारा उस प्रताड़ना को जीना चाहता है. इस से निकलने की कोशिश में वह किसी हांडमांस के साथी की प्रतीक्षा कर रहा है, और जिसके फलस्वरूप वह इसी नायिका की तरफ झुकाव महसूस करता है.

ये तो हुए ये दोनों. पर मुझे तो पता है कि नायिका का आकर्षण उसके नाम के पीछे छिपी छवि के तहत उसके बंगाली पृष्ठभूमि के प्रति है, चूँकि उसकी माँ भी वहीँ से हैं इसलिए उसके ह्रदय मस्तिष्क में वहां के प्रति राग स्वाभाविक ही है. और चूँकि नायक अपने में अंतर्मुखी है, एक केंद्र वहां भी काम कर रहा है. सब कुछ ढका ढका सा है उसे देखने की एक अदद कोशिश भी है..यही सब है जिसे शब्दों में बांधने की कोशिश कर रह हूं इधर..

कभी कभी यह नायक भी मेरी तरह सोचता है "काश, जो कुछ हमने जिया है वह सिर्फ ज़िन्दगी का रफ ड्राफ्ट होता और इसे फेयर करने का एक अवसर हमें और मिलता!" {'मुड़ मुड़ के देखता हूँ..'के फ़्लेप से चोरी } आज पता नहीं क्यों पुराने दिन सर पे चढ़ गए हैं. ज़िन्दगी पेपर क्लिप की तरह उसी साल में जैसे अटक गयी है जहाँ हम दोनों न जाने कितनी देर बात करने का इंतज़ार करते थे..कह क्यों नहीं पाया. आज तक उसी दिन को याद करता हूँ जब उस न्यू ब्लाक में हम दोनों सीढ़ियों पर बैठे क्लास का इंतज़ार कर रहे थे. कोई नहीं था, सिवाय हम दोनों के.. बस उस दिन के बाद मै दिल्ली और तुम पता नहीं कहाँ..पर हमें मालूम है ज़िन्दगी रफ हो या फेयर, ज़िन्दगी वही होती है, जो है..

कहानी अच्छी है न..??..मुझे पता था अच्छी ही होगी..पर लिखने के बाद मुझे लगता है क्या ये सिर्फ कहानी भर है..!! 

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