जनवरी 12, 2011

क्या आप भी ऐसे दर्शक हैं ..???

फिल्म नो वन किल्ड जेसिका एक हद तक एनडीटीवी ही नहीं पूरे मीडिया का डैमेज कंट्रोल ही है, पहला हाफ अच्छी भली कहानी कहता है तो इंटरमिशन के बाद कहानी 'रण' बन जाती है और पूरी फिल्म पब्लिक की जेब काटती जेबकतरी..'रेड अलर्ट' के बाद ये दूसरी-तीसरी फिल्म है जो कई और कहानियों को छुपा बित्ता भर दिखा कर उसे सच कहतीं हैं .
शुरुआत हुई यहाँ से,फेसबुक अकाउंट पर अपने दिमाग की ताज़ातरीन खुराफात लिखने से, सोमवार रात करीब दस बजे..वैसे मेरा स्टेटस टीपों से उसी तरह कुपोषित रहता है जैसे इस ब्लॉग को अब तक न कोई पूर्णकालिक टिप्पणीकार मिल पाया है न ही कोई सहृदय पाठक ही, खैर उस दिन पहला कमेन्ट आया राजकुमार राय की तरफ से, इसके बाद गौरव ने संदेसे भेजने शुरू कर दिए. जिनको उसी क्रम में फिर लिख रहा हूँ..मेरे मित्र वाले संदेसे इटैलिक  में हैं. मुलाहिजा फार्मइये :
         राजकुमार राय : कितनी अच्छी मूवी है बेवकूफ़. मेरी तो कई बार आँखे भर गई .
गौरव : जेसिका एक सोते हुए दर्शक को जागने वाली मूवी है .
शचीन्द्र :  सोता हुआ दर्शक इस सत्य से वाकिफ नहीं है कि एनडीटीवी और उस पूरे मीडिया की राडिया कांड में भूमिका संदिग्ध है तिस पर तुर्रा ये की राडिया कांड में सारी पत्रकार बिरादरी की छवि ध्वस्त कर दी है, उसपे पैबंद लगाती ये कुछ फिल्म नहीं कर सकती..तुम क्या इतना भी नहीं जानते, इतने अनभिज्ञ तो न बनो..
गौरव : आप फिल्म को फिल्म रहने दो दोस्त, एक अच्छा कांसेप्ट है और अच्छा डायरेकशन .
शचीन्द्र : फिल्म सिर्फ फिल्म नहीं होती जनाब..यही तो हमें आपको समझना है उस एजेंडा प्रोपगंडा पर भी नज़र रखना हमारी ही ज़िम्मेदारी है..क्यों..??
गौरव : आप की आप जानें, पर नंबर वन..इयर की अच्छी शुरुआत है .
शचीन्द्र :तुम्हारी भी तुम जानो..पर लगता है फिल्म अपना कम कर गयी, तभी तुम्हे सच नहीं दिख रहा..!!
गौरव : सच ही तो दिखा रही है फिल्म.शायद आप इस फिल्म को निगेटिव में देखते हो और मैं पसिटिव.
अब कौन प्लस है कौन मायनस इस प्रमेय में नहीं फँसना चाहता..एक की आंखे भर आई तो दूसरा बिना दिमाग खर्च किये फ़िल्म को सिर्फ फ़िल्म मानकर देखने को कह रहा था, दिल्ली विश्व विद्यालय से उसका पड़ना इसी से साबित होता है कि वह बचत के सिद्धांत पर केन्द्रित हो कर एक ही तरफ देख रहे हैं,बिना कुछ सोचे समझे..क्या आप भी इसी विश्वविद्यालय की पैदाइश है या यहीं आपको विवेकानंद की मूर्ति की छावं में पले बढ़ें हैं ..गौरव तुमसे तो आगे भी और बात करनी है कि मीडिया आप्शन लेने के बाद भी समझ क्यों नहीं बन पाई, विश्लेषण संश्लेषण  कहाँ कूंच कर गए, जब तुम पर फ़िल्म ने ये प्रभाव डाला है तो उस की क्या कहूँ जो सत्या, रोज़ा, बॉम्बे, सरफ़रोश, रेड अलर्ट, रक्त चरित्र  जैसी सभी फिल्मों को बस देखता है और सब धान ढाई पसेरी तौल वापस चल आता है कुछ छवियाँ कुछ दृश्य और बहुत सारा ऐसा माल जिसने उसके चेतन अवचेतन को ढक लिया है..क्या आप भी ऐसे दर्शक हैं ..???

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