जनवरी 14, 2011

लापतागंज पर छोटी सी टीप

लापतागंज में कुछ गुम गुम

इससे पहले कई बार मैं एक्शन रिप्ले के उस गाने पर अटका जिसमे किसी की शादी पर जाने के बाद उसे ही शादी न करने की नसीहत देने का नृत्यात्मक आग्रह था. शादी वहां फांसी के फंदे से लेकर मुसीबतों का मजनूं टीला जान पड़ता है. पर मुझे उसमे इस विवाह संस्था के उदगम प्रस्थान के किंचित ही अवशेष दिखाई पड़ते हैं, जिनमे एक बार फिर गुंजाईश है कि कोई शोधकर्ता एंगेल्स  से आगे बढ़ कर निजी संपत्ति परिवार श्रम विभाजन की गुत्थी के देसी वर्ज़न को सामने ला पाता..आश्चर्य है अभी तक किसी की नज़र नहीं पड़ी..

खैर ये जब होगा तब होगा अभी इधर किसी इतवार हिन्दुस्तान  में अलोक पुराणिक की टिपण्णी पढ़ी जिसमे शरद जोशी  के नाम का फर्जी उपयोग करने पर सब टीवी को फटकार तो थी ही साथ ही साथ एक एक पात्र गिना कर ये डंके की चोट पर कहने की अच्छी भली कोशिश थी, जिसका की जैसा असर पड़ना चाहिए था वैसा ही पड़ा मतलब ये छोटा सा लेख छपा और लिफाफा बनने के बाद पंसारी की दुकान पर पहुँच  भी गया.

इधर जबसे यह धारावाहिक शुरू हुआ है - २६ अक्तूबर २००९ से - तब कभी कभी हाज़री लगा लेते थे पर कभी लगातार फॉलो नहीं किया..कभी जब खाना खाने में देर हुई और घड़ी के कांटें ने दस बजाये तो देख लिया नहीं तो हम रुकते नहीं है.  परसों रात कल रात भी थोड़ी देर हो गयी ज़रा एक तरफ बीसीसीआई की टीम रनों के लिए जूझ रही थी तभी हम चैनलों की उछल कूद में इस चैनल पर आते. कहानी में गुड्डू की शादी की बात चल रही थी और मुकुन्दी की इंदुमती और लापतागंज की मिसरी मौसी, बीजी के जिगरी लंगोटिया को हल्दी उपटन लगा रस्मो रिवाजों को गाने के साथ बजा गा रहीं थीं. पुरुष अपने स्वभावोचित, स्त्रियों को ऐसा करते देख, और फब्तियां टाइप कुछ ढिला, कुछ कस रहे थे.

ऐन इसी वक़्त पीले होते गुड्डू के ससुर आ पहुचते हैं. वे पहले कुछ लाल पीले होते हैं फिर बेटी के ब्याह के बाद बिदाई न करने की बात कहते हैं और गुड्डू के सामने घरजमाई बनने का प्रस्ताव रहते हैं. पहले तो एक स्वर  में यह प्रस्ताव अल्पमत के चलते गिर जाता है पर एक-एक कर जब इस घरजमाई के बनने की स्थिति और उपरांत लाभों पर गौर किया जाता है तब सभी राजी हो जाते हैं.  एक पुरुष चरित्र की अपने मयके लापतागंज से बिदाई और ससुराल जाकर रहना किन्ही नए नए बने बरसाती मेंढकों की बिरादरी के नारीवादी चिंतकों को यहाँ मूक क्रांति होती नज़र आ रही होगी. पर यहाँ नुक्ता है..नुक्ता नंबर एक इसका चितकबरा फैमिनिज्म छौंक बघार..

मतलब ये कि गुड्डू के स्वसुराल में सिर्फ उसके स्वसुर हैं और उनकी ब्याहता पत्नी, माने सिर्फ दो परानी.कोई साली कोई साला कोई सरहज कोई साढू, गुड्डू के नहीं हो सकते माने इस एकलौती बालिका संतान के कोई और संतति नहीं. माने पुत्रेष्णा से ग्रसित भारतीय मनोवृति का एक और प्रतिनिधि जिसको पने जाने के बाद स्वयं अर्जित संपत्ति का वारिस चाहिए, कोई उत्तराधिकारी तो हो..यह उसी मानसिकता प्रतिरुपण है कोई अलग नारीवादी व्याख्या नहीं, बस लेबलिंग बदल दी गयी है..

और इसकी भी कम ही सम्भावना है की गुड्डू का भी विशुद्ध भारतीय बहुओं की तरह दैहिक मानसिक शोषण आर्थिक होगा..क्यूंकि लापतागंज वालों को इसी स्थिति में गुड्डे के नकारेपन और बिजी पाण्डेय के फुलटाइमर एसिस्टेंट की इन्टर्न से मुक्ति भी मिल जायगे और जब बिना पढ़े स्वसुर दुकान कराए दे रहे हैं तब आगे की कैसी चिंता..तो गुरु को छोड़ ये महाशय अपने ससुराल जाने की तय्यारी करें और अपने मयके समय समय पर आते जाते रहें..

इसी चैनल पर मिसिज़ तेंदुलकर  नाम से जनवरी के आखिर में एक और धारावाहिक शुरू होने जा रहा है जिसमें स्त्रैण माने जाने वाले सारे काम पत्नी के पतिदेव करते दिखाई देते हैं..शाहरुख़ के दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे  के बाद से जो ट्रेंड बदला है उसकी अलग व्याख्याएँ हैं जिस पर किसी अलग पोस्ट में. अभी तो इसके प्रोमो देख कर तो इसका इंतज़ार रहेगा जिसमे कौन से तर्क होंगे जिसके तहत एक स्त्री पुरुष को घर बैठने के लिए तैयार करेगी, हालाँकि स्थिति मज़ाकिया ही होगी पर ध्यान देने वाली बात ये है कि इधर एक ट्रेंड बन रहा है जिसमें पुरुष नामक प्रतिमा के कुछ दरकने कुछ और टूटने की संकेत तो है ही आवाजें भी सुनाई दे रहीं हैं.. भले स्वर कुछ मद्धम है पर इसे नाकारा नहीं जा सकता..

फिल्म ब्रेक के बाद  का वह सीन याद है जिसमें में पुरुष मित्र का अपनी स्त्री मित्र के अन्तः वस्त्रों को उठा कर रखता है..इन कपड़ों का स्त्रैण यौनिकता  को लेकर अपना पृथक इतिहास है, जिसने स्त्री पुरुष दोनों को समान रूप से प्रभावित किया, इस पर भी आज नहीं..थोड़ा और पढ़ना समझना होगा..

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