जनवरी 15, 2011

बीड़ी सुलगाता विमर्श


बात परसों की है जब हम दोनों मै मेरा भाई क़ुतुब मीनार जा रहे थे. कुछ घूमना था. कुछ बीते पुराने दोस्तों से मिलना था. बंगला साहिब से सात सौ पचीस में बैठे. बस लुटियन की दिल्ली होते हुए एम्स पहुँची..अब तक बस में सवारी नाम मात्र की थीं और कोई'विमर्श'नामक अवयव दिख नहीं पड़ रहा था कि एक सीनियर सिटिज़न टाइप व्यक्ति प्रकट हुए. बस हूँ हूँ करती चल पड़ी और उनके मुंह का इंजन भी सुलगने लगा..मतलब बंद खिड़कियों और सीएनजी गैस से चलने वाली दुनिया की सबसे बड़ी बस सेवा में एक बुज़ुर्ग जिगर से नहीं माचिस की तिल्ली से बीडी सुलगा फूंकने लगे.

अब जब इन्होने बीड़ी जला ही ली थी तो क्यों न मै भी अपने को जागरूक साबित करता इसलिए नाक में धुआं गया नहीं कि दिमाग ने चलना शुरू कर दिया और उनसे बोला.  बाबा अगर ऐसे ही पीते रहे तो वो दिन दूर नहीं जब तुम्हे भी एम्स जाना पड़ेगा. पता नहीं उन्होंने सुना नहीं या क्या था, बोले विशुद्ध भारतीय 'ऐं ..!!' . इस सांकेतिक भाषा को हम बहुत बारीकी से समझते थे इसलिए दोबारा विस्तारपूर्वक आग्रह को टाल न सके. फिर कहा 'बाबा अ ग र बी ड़ी पी ना न हीं छो ड़ा तो तु म्हे भी ए म्स की किसी ला इन में लग अ पने कैंसर पी ड़ित फे फड़ों का इलाज कर वा ना प ड़े गा ..!! '

लाबोलुआब ये कि इस हानिकारक चीज़ को जितना जल्दी हो सकें छोड़ दो नहीं तो जालिम दुनिया ही छोडनी पड़ जाएगी..इसकी ताकीद अड़ोस के एक और मुसाफिर ने भी की. इस पर उन होने कहा तिरसठ साल का मै हूँ और आज तक अस्पताल का मुंह नहीं देखा और थोड़ा मुझ पर झिड़के कि ऐसी बद्ददुआ टाइप भाषा में उनसे काहे बोल रहा हूँ.. आगे कुछ और बात होती उससे पहले ही पास बैठे व्यक्ति ने इसे - बातचीत को - हाईजैक कर लिया और यहीं से उनका प्रवचन शुरू हुआ है. जिसमे उन्होंने अपने अनुभव बाँट हमें भी अनुकंपित किया.

उनकी बतकही से पता चला कि ये भी पहले तम्बाखू सेवन करते थे पर कई बार छोड़ बारबार तंबाखू इन्हें पकड़ लेता पर अंततः इनकी अन्तःप्रेरणा आत्मशक्ति ने इन्हें उससे मुक्ति दिला ही दी और एक छोटे बालक की तरह अपने उस पिता तुल्य बुड्ढ़े को भी इससे दूर रहने क़ी सलाह दी. पर इसी दरमयान उन बुज़ुर्गवार ने कहा दारू तो छोड़ दी पर ये साली आदत नहीं छुटती - ये पारिभाषिक शब्दावली उनकी ही है कोई स्त्री विमर्श चेतस व्यक्ति राशन पानी लेकर मुझ निरीह प्राणी पर ना चढ़ बैठे.

इस पर उन तम्बाकू छोड़ चुके स्वस्थ व्यक्ति ने तुरंत अपनी आपत्ति दर्ज़ कराई और कहा पितृदेव आप ये तो बिलकुल ही गलत कह रहें हैं, इस नशीले पेय से उत्तम कोई औषधि नहीं है नहीं इससे पेट से कब्जियत दूर रहती है, नींद अच्छी आती है, नजला जुखाम भी पास फटकने नहीं पाता..इतनी गुणकारी वस्तु के प्रति ये द्वेष विद्वेष रखना उचित नहीं. सरकार कोई मुर्ख नहीं जो इतना प्रोत्साहन दे रही है और टैक्स भी तो तगड़ा मिल रहा है..आगे की कहानी में जोड़ते हुए बाबा जी उवाचे कि ये साली दारू तो अंग्रेजों की साजिश थी बाँटो और राज करो की नीति हमें आपस में लड़ाने की चाल..हम तो दूध मक्खन खाने वाले देश के लोग थे.

आगे का सूत्र जोड़ते हुए स्वस्थ व्यक्ति ने आईआईटी के किसी भूतपूर्व निदेशक की कहानी कह डाली जिसमे उनका नाम स्वामीनाथन या रंगनाथन था और उनकी एक विशेषता थी की वे घर से ही उबला हुआ पानी लाते थे बाहर किसी दूसरे के हाथों से बना खाना तक नहीं छूते थे न बीड़ी न सिगरट न शराब को हाथ लगाना..अर्थात स्पर्श नामक इन्द्री का वे कम से कम उपयोग करते थे. अधिकांशतः सदुपयोग ही देखा गया पर बदी का खेल देखो क्या लिखा था बेचारे, उनको ब्लड कैंसर हो गया पता नहीं कैसे??..हर महीने दो महीने में खून चढ़ाया जाता पर आखिर में बचे नहीं..

इस पूरे उपक्रम में कैंसर को इन सभी पदार्थों से तदर्थ दूरी पर रखा गया और उन्हें गुणित नहीं किया गया..मतलब उनकी भूमिका को पूर्णतः अपदस्थ कर दिया गया कैंसर से जो प्रतिवर्ष मर रहे हैं, दूरदर्शन पर विवेक का पूरा कैम्पेन धराशाही और इतिहास का स्थानीय संस्करण अफवाहों के कैसे रूप ले लेता है कैसे नियतिवादी होना ही आपकी नियति है इसको स्थापित कर दिया गया है.यहाँ एक बात और रेखांकित करने वाली है जिसे सांस्कृतिक अभिजिती कहा जाता है.

कैसे अपवादों के ज़रिये बात को अपनी तरफ करने का एक खेल खेला जाता है. समाजशास्त्री तो अपनी खोपड़ी के बाल तक न छोड़ें.. इतिहास बोध की तो पूछो मत उन्हें शायद सूरा से लेकर जहाँगीर के ब्रांडी के प्रति मोह का पता ही नहीं, चाणक्य अपने अर्थशास्त्र में मधु के सेवन का निषेध करते हैं और यहाँ का कोलाहल कैसे अपभ्रंश होता होता पश्चिम का अल्कोहल बन गया इसके लिए मॉर्फोलॉजी से लेकर भोलानाथ तिवारी की भाषाविज्ञान पढ़ानी पड़ेगी. इसके सिर्फ शैक्षिक सन्दर्भ ही नहीं हैं यहाँ सांस्कृतिक भाषिक ऐतिहासिक सन्दर्भों को बारीकी से टटोल कर समझने की ज़रूरत है. 'क्यों' का जवाब मैं नहीं देना चाहता..

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आवाज़ें..

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...