फ़रवरी 05, 2011

चुकते हुए मैं, का एक पन्ना

तारीख चार फरवरी 
रात करीब पौने ग्यारह बजे

पता है मेरी समस्या क्या है? एक साथ बहुत कुछ हो जाने, बहुत कुछ करने की सांसत में बार-बार पड़ जाना! समझ नहीं आता करे तो करें क्या..दूसरों से  नमालूम कैसा 'कम्पैरिज़न' करते जाना..हमेशा नहीं तो अधिकतर केसों में खुद को सही जगह पर न पाने की टीस उठती है और चुपचाप बैठती नहीं इधर उधर भागने लग जाती है. इस सन्दर्भ में कोशिश कितनी हुई उसका पृथक मूल्यांकन ज़रूरी है, पर..अपने को फन्नेखां समझने की बीमारी से खुद को कभी-कभी त्रस्त पाता हूँ. दूसरों के सामने अपने को साबित कर इस अस्तित्व के 'एक्सिस्टेंस' को संभाल पाने में ज़रा मुश्किल लगता है..

सुबह उठा ही था कि लगा अपने पास के 'मेंटल टूल' धीरे-धीरे चुकते जा रहें हैं या घिस-घिस कर जंग लगता जा रहा है..घिस भी रहे हैं जंग भी लग रहा है विरोधाभास का आभास होना स्वाभाविक है पर क्या करूँ..

एक तरफ ये भी पाता है मेरे जैसे सोचने वाले चिरकुट अल्पसंख्यक बि रा द री में आते हैं फिर भी इन औजारों में कुछ नया न जुड़ पाना सालता है. लगता है इस चिंतन प्रक्रिया में कहीं दोहराव-तिहराव है, मुल्ला की दौड़ कहाँतक एक ही सिफर के चक्कर काटे..कुछ भी देखो पढ़ो समझो लगता है हरबार दायरा अपने आप सिमटता जा रहा है.

सिमट ही गया है .थोड़ा बाज़ार को गरियाओ. अधिनायकवादी सत्ता को लतियाओ. पुरुषसत्ता को जुतियाकर साम्प्रदायिकता के पास पहुचो और कोरे थोथे राष्ट्रवाद को धोबी पछाड़ मार उल्टा पटका तो अगले राउण्ड में महिलाओं के संग बोल बतियाकर आगे बढ़ो और फिर थोड़ा वैचारिक नक्सली बन अपना फेसबुक स्टेटस लिख अपनी संवेदनशीलता के कसीदे पढ़ डालो और यही जाकर हमारी सांसे उखड़ने लगती हैं. बहुत भागादौड़ी हो ली ज़रा ठहर भी तो लें..थोडा रुककर चार छेह उटपटांग सी फ़िल्में देखो क्योकि उन्हें देखने का दिमाग भी तो इधर के माले पर है न, वैसे भी दूसरे को समझ न आये यही फैशन है..उसकी भी बघार दो.

लगता है अपनी स्थिति तो शायद सदैव बाएं वाली हो गयी है. सब तरह से असहमति के तर्क गढ़ना अपना शगल बनता जा रहा है और इसी पे चढ़ मुर्गे की बांग में एक सुर हमारा भी जोड़ लो की फ़रियाद के साथ हम भी उनमे शामिल होते बचते गए. पिलते पिलाते लिखते लिखाते बकते गए. किसी से सहमत होना अपनी वैचारिक सत्ता का भूस्खलन लगने लगता है इसलिए छिद्रान्वेषण संश्लेषण विश्लेषण उटपटांगवेषण करते दंड मारते वृक्षासन करते कभी-कभी इतनी दूर पटक दिए जाते कि 'सर्कास्टिक' जैसी अंग्रेजी शब्दावली के नकारात्मक पदों के साथ हमें नत्थी कर महापुरुष घोषित कर दिया जाता है और दूर कहीं 'निहिलिस्म' की हद पर हमारी कब्र भी खोद ली दी जाती है..खोदने वालों में हम भी उतने भागीदार हैं, ऐसा आप भी मानेंगे ऐसी आशा है..

पता नहीं ऐसा कुछ बहुत सारा माल तल्ले दुतल्ले पर भागता दौड़ता रहता है. और चेहरे पर दाढ़ी के साथ गंभीरता का लबादा उढ़ा देता है जिसके उघड़ने पर पता नहीं मेरी स्थिति कैसी होगी..खैर, अभी परसों महाश्वेता देवी का रजिस्टर्ड नंबर 1038  ख़तम किया और कसप  चल रहा है..

{यह मेरी पहली पोस्ट थी जो जनसत्ता  के स्तंभ 'समान्तर' में 17 Feb 2011 को प्रकाशित हुई थी जिसे आप इस लिंक पर उसके मूल स्वरुप में पढ़ सकते हैं.}

2 टिप्‍पणियां:

  1. आज हिंदी के एक बहुत ही खूबसूरत ब्लॉग से मुलाकात हो गई । आभार और शुभकामनाएं ..करनी चापरकरन ...वाह नाम ही आकर्षित कर जाता है

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  2. आभार साथी..!!
    और यही उमीद कि सक्रीय साथ बना रहेगा..

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