फ़रवरी 12, 2011

प्रतिरोध का सिनेमा:ज़फर पनाही और सत्ताचरित

"तुम सिर्फ मुझे सजा नहीं दे रहे हो, बल्कि ईरानी समाज, मानवता और कलात्मक सिनेमा को सजा दे रहे हो जो आख़िरकार मानवता का पक्ष लेता है ."
इस फोटो जो व्यक्ति बैठे दिख रहे हैं इस समय ईरान की किसी जेल में बंद हैं. नाम है ज़फर पनाही . पेशा फ़िल्में बनाना.

बीते साल बीस दिसम्बर अदालत ने इन्हें छह साल के लिए सलाखों के पीछे भेज दिया और रिहा होने के बीस साल तक उनके फिल्म बनाने, पटकथा लिखने, ईरानी या विदेशी मीडिया को किसी भी रूप में साक्षात्कार देने और देश से बहार जाने पर पाबन्दी लगा दी.

 ज़ाहिर सी बात है उन्होंने कुछ ऐसा किया होगा जो यथास्थितिवादी पक्ष - और बेशक वे सत्ता में बैठ हैं - को नागवार गुज़ारा.. यह जानने के लिए थोडा पीछे जाना होगा बस यहीं सन 2006 तक..

इसी साल उनकी फिल्म आती है ऑफ़साइड. इस फिल्म का ताना बना 2006 के फीफा विश्व कप के दौरान ईरान और बहरीन के बीच क्वालीफाइंग मैच के इर्दगिर्द बुना गया है. कहानी उस प्रसंशक की है जो चाह कर भी स्टेडियम के अन्दर नहीं जा सकता क्योकि उसने एक स्त्री के रूप में जन्म लिया है. और इसको तर्क से संरक्षित किया गया है, कि उनके अन्दर जाने पर उनके विरुद्ध हिंसा और अभद्र व्यवहार की संभावना बनी रहती है इसलिए ईरान में स्टेडियम के अन्दर उनका प्रवेश निषेध है.

पर कथा नायिका बस में पुरुष प्रशंषकों के साथ भेष बदल कर बस में सफ़र ही नहीं करती, मैच का टिकट ब्लैक में खरीदती है, सुरक्षा जाँच को पार भी कर लेती है पर अंततः पकड़ी जाती है. और वह ऐसा करने वाली अकेली नही है, उसे वहां ले जाया जाता है जहाँ उसकी ही तरह की कोशिश करने वाली महिलाओं को रखा गया है. ये जगह स्टेडियम की छत पर ऐसा पैन / बाड़ा है - अपने यहाँ इसके लिए कांजीहौज  कहा जाता है - वहां से वे सिर्फ कोशिश कर सकती हैं पर दिखाई कुछ नहीं देगा..

इनकी पहरेदारी में कुछ ऊबते ऊँघते से सिपाही तैनात हैं. जिन्हें कुछ लेना देना नहीं कि क्यों इन महिलाओं को मैच देखने की इजाजत नहीं दी जाती. उनका सिर्फ और सिर्फ एक ही काम है हुक्म की तामिल. और इस काम को देखने उनका बड़ा अफसर कभी भी आ सकता है, इसी डर के मारे थोड़ी मुस्तैदी से काम कर रहे हैं. बड़े मान मुनव्वल के बाद एक सिपाही मैच का आँखों देखा हाल सुनाने के लिए तैयार होता है.

यह बात और है की तेहरान के उस स्टेडियम का नाम आज़ादी स्टेडियम है और फिल्म तो आगे बहुत कुछ कहती है पर ईरानी सरकार को कुछ सुनाई नहीं दिया तो दिखाई कैसे देता..बहरहाल बात फिल्म से आगे बढ़ाते हैं..

ईरानी सरकार के कड़े आलोचक रहे पनाही ने साल भर पहले विवादस्पद राष्ट्रपति चुनाव के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया था. एक फिल्मकार की राजनितिक सक्रियता सरकार को पसंद नहीं आई. दिसम्बर में अदालत ने पनाही पर इस्लामिक गणतंत्र के खिलाफ दुष्प्रचार और देश की राष्ट्रीय सुरक्षा को क्षति पहुचने का षड्यंत्र जैसे गंभीर आरोप लगते हुए उनके साथ एक और फिल्मकार मोहम्मद रासुलोफ़  को भी छः साल के लिए कैदखाने में डाल दिया. ईरानी सरकार की नीतियों के शिकार सिर्फ पनाही ही नहीं, बल्कि आमिर नादेरी, बहमान फरमानारा, समीर मख्मबफ़, सुसान तस्लीमी, परविज़ सय्यद फिल्मकार भी रहे हैं, जिन्हें अपनी जन्मभूमि से वंचित होना पड़ा है.

पनाही को प्रताड़ित किये जाने के मसले पर हॉलीवुड के साथ अनेक मानवाधिकार समूहों ने भी कड़ा विरोध दर्ज किया है. अमेरिका के एकडमी पुरस्कार विजेता और कलाकारों की संस्था 'आर्टिस्ट फॉर पीस एंड जस्टिस' के संस्थापक पाल हेगिस  ने दुनिया भर के कलाकारों , निर्देशकों , निर्माताओं और लेखकों को पनाही के समर्थन में एकजुट होने का आवाहन करते हुए कहा, 'मैं ईरानी सरकार से अनुनय करता हूँ की पनाही के खिलाफ जारी किये गए अमानवीय और अन्नायाय पूर्ण फैसले वापस ले लिए जाएँ. मैं पुरे विश्व के लोगों से यह अपील करता हूँ की जफ़र पनाही और मोहम्मद रासुलोफ़ की सजा को हटाने के लिए सीन पेन और हेर्वे वेंस्टीन के साथ अमेनिस्टी इंटरनेशनल यूएसए में जो हस्ताक्षर अभियान चलाया है उसमे सभी शामिल हों.' 

अभी वे जेल में हैं पता नहीं कब तक रहेंगे, पर लगता है यही हमारे समय का सच है जिसमें जो सत्ता के साथ नहीं है उसकी सही जगह उसे पहुँचाया जा चुका है..

लेकिन यही वह कदम है जहाँ से अभिव्यक्ति की लड़ाई शुरू होती है..

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आवाज़ें..

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...