फ़रवरी 13, 2011

प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, शतधा प्रतिबद्ध हूँ !

foto credit:tinniegirl.blogspot.in
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मुझे भी लगा कि पिछली पोस्ट अचानक ख़तम कर दी.. पता नहीं रात सोने की जल्दी थी या की कुछ और..पर बार-बार लगता रहा कुछ छूट गया. तभी से अन्दर कुछ उमड़ घुमड़ रहा है . इस पोस्ट को उसी की श्रृंखला माने.. 

मोहनदास  की कहानी शुरू होती है रंग से ..डर के रंग से..

धूसर, सलेटी, जर्द, हल्का स्याह या फिर रख जैसा? ऐसी रख जिसके भीतर आग अभी पूरी तरह मरी न हो !..या फिर कोई ऐसा रंग, जिसके पीछे से अचानक कोई सन्नाटा झाकने लगता है और उसकी दरार में से एक फासले पर कोई सिसकी अटकी हुई दिखती है?

पता है यह डर किसका दिया हुआ है ?? उसी डरी हुई सत्ता का जिसने कभी मंडेला  को आंग सान सू की  को अपने देश में बिनायक सेन  को कैद कर रखा है. जो अपने अस्तित्व को किसी भी कीमत पर बनाये बचाए रखना चाहती है; उसका चरित्र ही अधिनायकवादी किस्म के शोषणकारी से हू-ब-हू मिलता है. उसका 'डबल' - प्रतिरूप - ही उसकी अन्तः प्रेरणा है. दमन के बिना उसका साँस लेना दूभर हो जाता है. इसका अपना मकेनिज्म - अपने तर्क होते हैं जो तर्कातीत आधारशिला पर जन्मते हैं और प्रतिपक्ष - प्रतिरोध जैसे तत्वों से कोई लेना देना नहीं होता. इनके बीच एक ही संबंध होता है जो एक तानाशाह का अपने शासितों से होता है..

कहीं पढ़ा था प्रतिबद्धता  वह सजग चेतना है जिसका सरोकार मूलतः उन उन दबावों से मुक्त हो कर स्थितियों को बृहतर मानवीय सन्दर्भों में सनाजना और उनके पक्ष में खड़ा होना है जिनका संबंध हमारे पैदा होने और जीने की पूर्वनिर्धारित स्थितियों से नहीं रहता. दूसरे शब्दों में यह चेतना सिर्फ हमारे निजी अस्तित्व के सवालों से ही जुडी नहीं होती बल्कि उसका विस्तार करती है.

और ऐसा ही कुछ पनाही करती रहे जो इन कठमुल्लों को फूटी आंख नहीं सुहाया. वे दुनिया के उन चुने गिने फिल्मकारों में से थे जिन्होंने सिनेमा को प्रतिरोध का सिनेमा बनाया. उनका हमेशा यही प्रयास रहा के सिनेमा जैसे सशक्त माध्यम से समाज में नयी बहसें खड़ी हों, फ़िल्में समाज में हस्तक्षेप का माध्यम बनें. उनके लिए यही हस्तक्षेपकारी भूमिका उनके द्वारा समाज में आमूलचूल बदलाव की अगुआ हो सकती थी.

उनकी हर फिल्म में ईरान बड़ी शिद्दत के साथ मौजूद था. उस समाज के अन्दर की छिपी दबी संवेदनाओ-दर्द-बिछोह को पहली बार परदे पर इतनी जगह मिली थी. पर जिसे वहां के सत्ताधारी कभी नहीं चाहते थे की वह इस रूप में बाहर आये. वह समाज पब्लिक डोमेन  में आये. इसकी ताकीद उन पर लगे इस्लामी गणतंत्र के खिलाफ षड्यंत्र के आरोप से हो जाती है.

जहाँ पिछले साल अश्वेत/ जमुनी सिनेमा ने अमानवीय भेदभाव, संसाधनों की कमी और कड़ी चुनौतियों के बावजूद एक शताब्दी पूरी करना एक ऐतिहासिक उपलब्धि है वहीँ पनाही का कारावास एक और प्रतिरोध की धारा का बीच में ही टूट जाने जैसा है जो बिना शोर शराबे के मानवीयता संवेदनाओं को लाने की एक संजीदा कोशिश कर रहा था.

पर हमें यह भी मालूम है सभ्यता की हर संरचना में सत्ता और प्रतिरोध का समान्तर आगे बढता हुआ पारस्परिक संबंध है और आज तक जीवित सभी समाजों का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास रहा है - जिसमे पहला पक्ष शोषणकारी का है तो दूसरा प्रतिरोधी का- और जिसमें लड़ाई क्रन्तिकारी बदलाव के साथ ही ख़त्म हुई है. भले पनाही जेल में हों पर पुनर्स्थापना के कालों में प्रतिरोध ख़तम नहीं हो जाता बल्कि विखंडित हो जाता है और अधिकांशतः अदृश्य रहता है, जैसे रंगमंच के पीछे अनंत रहर्सलों में व्यस्त हो..

अभी तो बस नागार्जुन  की कविता प्रतिबद्ध  याद आया रही है :-
प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, प्रतिबद्ध हूँ
बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त
संकुचित ‘स्व’ की आपाधापी के निषेधार्थ
अविवेकी भीड़ की ‘भेड़िया-धसान’ के खिलाफ
अंध-बधिर ‘व्यक्तियों’ को सही राह बतलाने के लिए
अपने आप को भी ‘व्यामोह’ से बारंबार उबारने की खातिर
प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, शतधा प्रतिबद्ध हूँ !

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