मार्च 07, 2011

हमारा घर हमारी माँ और आठ मार्च

यह छोटा सा टुकड़ा उस बड़ी सी खटर पटर से हू-ब-हू उतार लिया गया है जो तीन सितम्बर की रात लिखा गया था. क्यों साझा कर रहा हूँ शायद कल आठ मार्च है और न जाने क्यों मुझे उन सभी चितकबरा सी हो गई पंक्तियोंसे बड़ी कोफ़्त सी होती हैं जहाँ मेरी ऑंखें अपनी माँ को नहीं खोज नहीं पातीं, वो नज़र भी नहीं आती..पर लोग कहते हैं विमर्श है इसका ही फैशन है ..इससे पहले कुछ और कहूँ आप ज़रा ध्यान से उस रात चल रही उधेड़बुन को देख लें कि कहाँ से कोई डोर चिटकी , कौन सा धागा फिर गांठ बन गया और उस उलझन में कहाँ कोई उलझ कर रह गया..

{इस 'खैर ' से पहले की कहानी पर ध्यान न देकर यहीं से कंसनट्रेट कर अर्थात चित्त एकाग्रचित्त कर पढ़ने की कोशिश करें }
 
खैर आगे बढ़ते हैं और चलते हैं हमारे घर. खुद की प्रस्थिति में यह किसी आश्चर्य से कम नहीं. कब रसोई चलकर बैठक में प्याज़ के साथ आ जाये कोई कह नहीं सकता. क्योकि कोई कहता नहीं हमें सब पता है. गुसलखाने में बैठी माँ कब बैठक के पंखे को बंद करने को कहती है समझना मुश्किल है. इसकी संरचना की उत्तराधुनिक परिभाषा यही कहती है, 'कब', 'कौन', 'किसका' अतिक्रमण कर 'क्या' हो जायगा यह समझना इतना आसन काम नहीं.

हम सब इस घर से भाग लेना चाहते हैं और भागते भी हैं. रोज़. सिवाय माँ के. वह सिर्फ घुटती है और काम करती है. और पता नहीं किन किन बातों को याद कर हमेशा परेशान सी दिखती है. उसका मन भी कहता होगा भाग जाऊं पर कहाँ या शायद शायद सोचती भी होगी तो घुटनों के दर्द के मारे..पता नहीं क्या..भाग जाने का एक अदद विकल्प या जवाब कहीं और मकान हो सकता था जो अभी तक कहीं नहीं है. कम से कम इस शहर में तो नहीं ही है. बस वहीँ दबड़े मैं अपनी गृहस्थी को संभाले.

हर दिन शुरू ही अडजस्टमेंट से होता है. सुबह उठते ही सोने का कमरा रसोई में..फिर सब अपने समय के साथ आते जाते रहते हैं. माँ तो बस इस चारदीवारी को कोसते-कोसते रुक सी गयी दुपहरियों की उंघती नींदों में किसी एंटीलिया  जैसे महल की सैर ही करती होगी; जहाँ कम से कम सबकी एक निश्चित भूमिका हो. यूँ नट का खेल कब तक चलता रहेगा. मतलब यह कि एक ऐसी मुकम्मल ईमारत जहाँ रसोई सिर्फ रसोई हो बैठक का कमरा या कूलर इस लिए न बंद करना पड़ जाये कि चूल्हा बुझ जायगा.

मतलब जब थकी हरी दुपहरी तिपहरी को जब घुटने और कमर के दर्द से कुछ देर भागना हो तो कोई एक अदद ऐसी जगह तो ज़रूर हो जहाँ वो कुछ पल सिर्फ अपने में रह सके..

इन ऊपर बैठी पंक्तियों में मेरी माँ कितनी है इस पर अन्यत्र विमर्श हो सकता है पर इतना तो मैं कह ही सकता हूँ कि इतने सालों में न ये घर बदला न हमारी माँ..घर बुढाता गया माँ भी..घर में जगह कम होती गयी तो न घर ने चाहा मेहमान आयें न माँ ने..हम बड़े होते गए और घर की भूमिका हमारे लिए एक सराय एक हाल्ट की तरह होती बनती गयी. माँ मुझसे पहले दिल्ली आई और मैं शायद जनम के एक डेढ़ साल बाद. उसकी भूमिका सिर्फ हमें पालने पोसने तक ही सीमित हो कर रह गयी या उन्होंने खुद ही कर ली होगी क्योंकि कमाने के लिए पिता हैं ही और शायद जो धनार्जन कौशल होना चाहिए वह इस शहरी परिवेश का उनके पास नहीं था न कभी आवश्यकता समझी गयी..

इसका यह मतलब नहीं कि हमारा घर पुरुष सत्तात्मक होता गया. जब कभी माँ बीमार पड़ती पिता रसोई सँभालते और हम सबके लिए सदाबहार पथ्य बनाते जिसे खिचड़ी ताहड़ी कुछ भी कहा जा सकता है और अभी भी हम उसे यही कहते हैं..कहते रहेंगे..

हमारी आवाजाही भी और हमारी भूमिका भी चुटुर- पुटुर  के स्तर पर ही रही..हाँ हर इतवार प्याज काटने, मटर छीलने, मकर संक्रांति के दिन टमाटर का भर्ता और घी में लहसुन हम ही छीलते आ रहे हैं. इसे संख्यात्मक और गुणात्मक स्तर पर नापने जोखने की कोई ज़रूरत नहीं है..हमें पता है हम सिर्फ टमेटो सूप, डबलरोटी - मक्खन और मैगी बनाने की लिए ही करछुल जैसी किसी आकृति को हाथ में सँभालते हैं..हाँ चाकू की आवृति और बारंबारता इससे अधिक ही होगी..एक बात और की कपडे धोने की बात जहाँ तक होता है हम सब खुद ही धोते हैं.और कभी मन किया तो बर्तन पर भी हाथ साफ़ कर लिए. पर इधर तो रोज सुबह पिता जी ही बर्तन धो डालते हैं.

उस रात आखिर में यह लिखा था कि रूढ़ियाँ अपने आप बने बनाये पैटर्न सामने लाती गयी और हमने उससे बहार निकलने की कोशिश भी की  इस जद्दोजेहद में कितने सफल हुए इस पर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता..और न मुझे लगता है हर चीज सिर्फ सफल या असफल ही होती है..

इतने सालों बाद किसी फिल्म में अपने जैसा घर दिखा.धोबी घाट  में मुन्ना अपने भाई सलीम के साथ बैठा टीवी देख रहा है तो उनका छुटका इम्तिहान पास कने के लिए किताब में सिर घुसाए पालथी मारे बैठा है और फेल हो जाने के की स्थिति में बोली जाने वाली तकरीरें भी तैयार कर रहा है..वहीँ कहीं माँ की रसोई भी वहीँ विराजमान है माँ के साथ..

यह घर कुछ कुछ हमारे घर जैसा ही था एकमेक, गड्ड-मड्ड, उल्टा-पुल्टा सा कुछ-कुछ नोंक-झोंक सा, कुछ-कुछ शरारत जैसा. जिसमे हम सब कहीं खो से गए उसमें खोते चले गए और सबसे ज़यादा गुम हुई हमारी माँ.. 

{आठ मार्च हमारी माँ जैसी और बहुतों माँओं के हिस्से का दिन है, जिनकी कहानी 'दोपहर का भोजन ' के बाद से एक सिरे से गायब होती गयीं और हम कुछ नहीं कर सके..एक अदद 'चीफ़ की दावत 'भी नहीं लिखी गयी..}

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