मार्च 17, 2011

बरस्ते आगा हश्र : कुछ असहज सवाल

आज बात यहूदी की लड़की से पहले कुछ सवालों की. ये आग़ा हश्र कश्मीरी  से शुरू होकर बहुत आगे तक जाते हैं, तो शुरू करें..

इस नाटक की भूमिका लिखते हुए अब्दुल बिस्मिल्लाह  कहते हैं:

'..लेकिन यह तो सभी मानते हैं कि आग़ा हस्र उर्दू हिंदी के एक महत्वपूर्ण नाटककार हैं  और इससे पहले वे इन्हें शेक्सपियर के समकक्ष खड़ा कर ताकीद कर चुके हैं कि इन दोनों ने ही व्यावसायिक नाटक कंपनियों के लिए नाटक लिखे.और दोनों ही नाटक करों का उच्चस्तरीय साहित्यिक मूल्यांकन हुआ '. 

 पर ये बात अपन को हजम सी नहीं हुई. ऐसा अपच क्यों हुआ इस पर एक लम्बी चौड़ी तकरीर है..

सबसे पहले तो यही कि अगर ऐसा था तो हम इनसे कभी रु-ब-रु क्यों नहीं हुए, हमारे मास्टरों ने इनसे तार्रुफ़ क्यों नहीं करवाया. जब जयशंकर प्रसाद और आग़ा हश्र एक ही समय काल में सक्रीय थे तो हमें प्रसाद ही पढने को क्यों मिलते हैं. एक सामानांतर धारा का प्रवाह भी तो दिखाई देना चाहिए था पर नहीं. 

हिंदी साहित्य के बोझिल इतिहासों नें भी प्रसाद पर तो पन्ने रंगे पर किसी ने यह लिखने की जेहमत है उठाई कि प्रसाद पारसी थियटर से त्रस्त थे और उसी प्रतिक्रिया जैसी किसी अवस्था में अपने बोझिल से उबाऊ से ऐतिहासिक नाटकों की श्रृंखला लिखने को अभिशप्त हुए. वहां पाठक को संस्कारित करने का जिम्मा उनकी कलमतोड़ू लेखनी पर था. उनका नजरिया वही ढाक के तीन पात पुनुरुथानवादी किस्म का रहा जिसमे वे संस्कृति का शुद्धतम रूप खोजते बीनते रहे.

और यहीं कहीं प्रसाद फिर से संदेह के घेरे में आ जाते हैं जिसकी तरफ शायद ही कभी हमने ध्यान दिया हो और वह ये कि इनके चलते उस पाठक के मानस में उन तत्कालीन परिस्थितयों में जब हम स्वाधीनता के लिए विदेशी सत्ता से लड़ रहे थे किस प्रकार के देश की छवि आकार ले रही थी.  क्या आपको यह आकृति सन सैंतालिस के आस पास वाली नहीं लगती..

कुछ इसे विषयांतर कह ख़ारिज करना चाहेंगे पर हमें पता होना चाहिए ये वही मानसिकता है जिसने पहले हिंदी को मानक रूप में ढाल कर उन सारी हिंदियों की भ्रूणहत्या कर दी, जिनका स्वाभाविक विकास हो सकता था.. क्या ज़रूरत थी ठेकेदारी लेकर सबको ठिकाने लगाने की. यह वही अभिजात्य है जिसमे हीराडोम जैसे कहीं नहीं, उनके लिए कोई जगह नहीं.

एक ऐसी व्यवस्था बनायीं गयी जिसमे लिखने वाले पहले से ही कम थे और समझने वालों की तो बिसात ही क्या..?? उस लोकतान्त्रिक जगह को सील बंद कर उसकी कालाबाज़ारी शुरू कर दी गयी. और इसी दरमियानी में हिन्दुस्तानी को अपदस्थ करने की पूर्वपीठिका पर काम किया जा चुका था. हमने देशज-विदेसज-तत्सम-तद्भव-संकर जैसे पद गढ उसका रास्ता हमेशा के लिए बंद कर दिया था. 

मामला जितना भाषाई दिखता है उतना है नहीं वर्ना ऐसा क्यों हुआ कि प्रेमचंद तो अनुवाद के बाद भी अपनी हिन्दुस्तानी के बलबूते पर हिंदी साहित्य में घुसपैठ कर सकने में कामयाब हो जाते हैं पर ऐसा विशेषाधिकार किसी और को क्यों नहीं मिल सका..मिर्ज़ा हैदी रुसवा, मौलवी नजीर अहमद, पं. रतनलाल शरशार से लेकर आग़ा हश्र, इकबाल, मौलाना शिबली नोमानी, अकबर इलाहाबादी  तक उसी मध्याम से हमारे सामने आये पर उन्हें प्रेमचंद जैसी स्वीकृति न मिलना उस छिपी हुई मानसिकता को उदघाटित करने के लिए काफी है जहाँ स्वकथित हिंदी भाषी अपने को हिंदी हैं हम, वतन से नहीं मज़हब से  मानने लगे थे..

और ये सारी घेरेबंदी कहीं आगे की पटकथा कहती है जहाँ सबसे पहले भाषा पर अपना अधिपत्य जमा कर ये दर्शाना भी था कि इस पर हमारा एकाधिकार है और हमी इसके होलसोल प्रोपराईटर हैं. फिर बारी संस्कृति और उसकी परिधि निर्धारण का था जिसके बाद नंबर आया देश का; जहाँ से आगे की कहानी हम सब जानते बूझते हैं. सिर्फ धरम ही नहीं उसमे जाति से लेकर पूंजी, वर्ग, समाज के अधिपत्य की एक-एक कर क्रमबद्ध कोशिशें दिखती हैं. पर साहित्य के नाम पर इस तरफ कभी देखा ही नहीं गया. समझ नहीं आता जिसमे अपने को छोड़ सब हाशिये पर कर दिया गया था वह कैसा 'सा-हित्य' था - है..??  

यह सारे विचार उस यात्रा का प्रस्थान बिंदु हो सकते हैं जहाँ से कोई धीर-शील पुरुष अपने इतिहास को दुबारा से देख पढ़ जान सकता है और उसमें हमारी हिंदी की इन बहुआयामी पुनर्पाठों की छवियों को नए आलोक में विचरण कर सकेगा. यहाँ ऐसे अकादमिक रंगमंचों से आगे बढ़ कर उन सारे सींकचों को तोड़ने की कोशिशें होनी चाहिए जिनके पीछे सब बहुत शुभ-शुभ सा है, कुछ-कुछ वन्दनीय श्रेणी का..

इस संदर्भ को देख कर जब मैं इन पंक्तियों पर आता हूँ जिसमे फिर वे आग़ा हश्र को उर्दू-हिंदी का एक महत्वपूर्ण नाटककार मानते हैं तब मेरा ध्यान उन सबके नामों की तरफ जाता है..फिर ये खुराफात भी आती है कि अगर कोई बिस्मिल्लाह हमें पढ़ाते तब भी क्या ऐसा ही होता..

और एक बार फिर समझ आता है नाम सिर्फ नाम नहीं होते..!!

1 टिप्पणी:

  1. भारतीय ब्लॉग लेखक मंच
    की तरफ से आप, आपके परिवार तथा इष्टमित्रो को होली की हार्दिक शुभकामना. यह मंच आपका स्वागत करता है, आप अवश्य पधारें, यदि हमारा प्रयास आपको पसंद आये तो "फालोवर" बनकर हमारा उत्साहवर्धन अवश्य करें. साथ ही अपने अमूल्य सुझावों से हमें अवगत भी कराएँ, ताकि इस मंच को हम नयी दिशा दे सकें. धन्यवाद . आपकी प्रतीक्षा में ....
    भारतीय ब्लॉग लेखक मंच

    उत्तर देंहटाएं

आवाज़ें..

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...