मार्च 23, 2011

जो बहरे थे - जो बहरे हैं उनके लिए

        ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी
                                                                          सूचना 

बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊँची आवाज़ की आवश्यकता होती है ", प्रसिद्ध फ्रांसीसी अराजकतावादी शहीद वैलियां के यह अमर शब्द हमारे काम के औचित्य के साक्षी हैं.

पिछले दस वर्षों में ब्रिटिश सरकार ने शासन-सुधार के नाम पर इस देश का जो अपमान किया है उसकी कहानी दोहराने की आवश्यकता नहीं है और न ही हिन्दुस्तानी पार्लियामेण्ट पुकारी जाने वाली इस सभा ने भारतीय राष्ट्र के सिर पर पत्थर फेंककर उसका जो अपमान किया है, उसके उदाहरणों को याद दिलाने की आवश्यकता है. यह सब सर्वविदित और स्पष्ट है. आज फिर जब लोग “साइमन कमीशन” से कुछ सुधारों के टुकड़ों की आशा में आँखें फैलाए हैं और कुछ इन टुकड़ों के लोभ में आपस में झगड़ रहे हैं, विदेशी सरकार “सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक” (पब्लिक सेफ़्टी बिल) और “औद्योगिक विवाद विधेयक”(ट्रेड्स डिस्प्यूट्स बिल) के रूप में अपने दमन को और भी कड़ा कर लेने का यत्न कर रही हैं. इसके साथ ही आने वाले अधिवेशन में “अखबारों द्वारा राजद्रोह रोकने का क़ानून” (प्रेस सैडिशन एक्ट) लागू करने की धमकी दी जा रही है। सार्वजनिक काम करने वाले मज़दूर नेताओं की अंधाधुंध गिरफ़्तारियाँ  यह स्पष्ट कर देती हैं कि सरकार किस रवैए पर चल रही है.

राष्ट्रीय दमन और अपमान की इस उत्तेजनापूर्ण परिस्थिति में अपने उत्तरदायित्व की गंभीरता  को महसूस कर “हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन” ने अपनी सेना को यह कदम उठाने की आज्ञा दी है. इस कार्य का प्रयोजन है कि क़ानून का  यह अपमानजनक प्रहसन  समाप्त कर दिया जाए. विदेशी शोषक नौकरशाही  जो चाहे करें परन्तु उसकी वैधानिकता का नकाब  फाड़ देना आवश्यक है.

जनता के प्रतिनिधियों से हमारा आग्रह है कि वे इस पार्लियामेण्ट के पाखंड को छोड़कर अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों को लौट जायें और जनता को विदेशी दमन  औरशोषण  के विरुद्ध क्रांति के लिए तैयार  करें. हम विदेशी सरकार को यह बता देना चाहते हैं कि हम “सार्वजनिक सुरक्षा” और “औद्योगिक विवाद” के दमनकारी कानूनों और लाला लाजपतराय की हत्या के विरोध में देश की जनता की ओर से यह कदम  उठा रहे हैं.

हम हर मनुष्य के जीवन को पवित्र मानते हैं. हम ऐसे उज्जवल भविष्य में विश्वास रखते हैं जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण शांति और स्वतंत्रता का अवसर  मिल सके. हम इन्सान का ख़ून बहाने की अपनी विवशता पर दुखी हैं। परन्तु क्रांति द्वारा सबको समान स्वतंत्रता देने और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को समाप्त कर देने के लिए क्रांति में कुछ-न-कुछ रक्तपात अनिवार्य है .

इन्क़लाब जिन्दाबाद !

हस्ताक्षर–
बलराज
कमाण्डर-इन-चीफ


 एक छोटी सी टिप्पणी टेढ़मरे ब्रैकेट के अन्दर

{तस्वीर में केन्द्रीय असेम्बली और दर्शक दीर्घा . 8अप्रैल, 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने यहीं निर्जन स्थान पर बम फेंका था और उसी दरम्यान बाँटे गए अंग्रेज़ी पर्चे का यह हिन्दी अनुवाद ;यहाँ कुछ पदबंधों कुछ शब्दों को जानबूझ कर बोल्ड और इटैलिक में रखा गया है..जिनका फौरी में कई मायनों के बीच में एक मायना यह लगाया जा सकता है कि सत्ता का चरित्र कभी नहीं बदलता. गोरे हुक्काम गए तो ये काले मुक्कादमों की फ़ौज का देश पर कब्ज़ा हो गया. आप भी अपने अर्थ खोजने के लिए स्वतंत्र हैं..नक्सलवाद से लेकर बिनायक सेन तक. राहुल गाँधी से लेकर हसन अली मलकान गिरी से लेकर विदर्भ. काले धन से लेकर संसाधनों पर कब्जे तक की रेंज में सोचने को लेकर. कम से कम हम एक औपचारिक सैधांतिक लोकतान्त्रिक देश के ज़िम्मेदार नागरिक होने का फ़र्ज़ नहीं निभा सकते क्या. इतनी स्वतंत्रता तो शायद हमें है ही..और ध्यान रहे ये टेढ़मरे ब्रैकेट के अन्दर लिखा जा रहा है }

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