मार्च 24, 2011

'यहूदी की लड़की' उर्फ़ प्यार का पोस्टमार्टम

किताबें बतातीं हैं आग़ा हश्र कश्मीरी  किसके समकालीन थे पर आज हम यहाँ उनका तुलनात्मक अध्ययन-विश्लेषण जैसा अकादमिक कर्मकांड नहीं करने जा रहे हैं. न यह स्थापना ही देने कि कौन किसकी कान आँख से कहाँ की उठक बैठक करते किस मंज़िल पर पाए जाते थे. आज फोकस में सिर्फ यहूदी की लड़की  पर.

बात प्रासंगिकता जैसे किसी प्रमाद की न भी करेंगे जैसा उस दिन राकेश कर रहे थे तो भी आज इस दो हज़ार ग्यारह में बैठा एक पाठक अगर इस नाटक को पढ़ता है तो उसके भेजे में सत्तर-अस्सी पन्ने बाद सिर्फ एक अदद सीधी साधी लव स्टोरी जैसा कुछ समझ में आएगा. उससे ज़यादा की उम्मीद रक्खी भी नहीं जाएगी. कुछ गणितज्ञ टाइप का हुआ तो प्रेम त्रिकोण दिख पड़ेगा. और इसमें कुछ गलत भी नहीं है, उलटे शाबाशी देनी चाहिए कि उसने इस प्रायोजित रूचि निर्माण काल में पढ़ा तो..कभी कभी मैं खुद को इस कटघरे में पाता हूँ. हमें इस समय ने इस लायक छोड़ा ही कहाँ गया है कि हम खुद अपने रुचियों को चुन सकें. वे पीवीआर के पोपकोर्न की तरह कीमत अदा करने पर हमारे सुपुर्द कर दी गयीं हैं. देखो खाओ कूड़ा बनो - बनाए जाओ. देख रहा हूँ फोकस बदल रहा है पर क्या करूँ, यह एक प्रकार का दृष्टि दोष है जिससे मैं खुद को ग्रस्त पाता हूँ ..आदतन मजबूर..चलो इस रूचि अभिजिति वाले पाठ को फिर कभी उठाएंगे, अभी वापस चलते हैं..

जब से मैंने इसे ख़तम किया तभी से बहुत कुछ घूमे जा रहें हैं..कहीं पढ़ रखा था कि प्रेम हमें मुक्त करता है उसी से बार-बार टकरा रहा था..मारकस रोमन शहजादा है और राहिल यहूदी सौदागर अज़रा की लड़की. अब दोनों के बीच प्रेम कैसे अंकुरित हो.. इसके लिए मारकस राहिल से एक यहूदी के वेश में मिलता है. मतलब यह कि आग़ा मारकस को मनशिया बनाकर धर्म की भूमिका को रेखांकित करते हैं. मतलब यह कि यहूदी की लड़की मारकस से नहीं उसके यहूदी वेश के चलते ही उसकी तरफ अपना झुकाव महसूस करती है जो बाद में प्रेम का रूप ले लेता है. मतलब यह भी कि अगर मारकस मारकस ही बनकर राहिल से मिलता तो वह कभी उस राहिल के इतना पास आ पाता और अपना इजहारे मोहब्बत कर पाता. मोहब्बत बरस्ते मज़हब आती है.

अगर इसके समाजशास्त्रीय अर्थ की तरफ जाया जाये तो मिलेगा कि यह वह समाज है जहाँ किन्ही दो गैर मज़हबी लोगों का और ऊपर से वे यदि औरत और मर्द हैं तो युद्धक परिस्थितियों के आलावा उनका आमना सामना संभव ही नहीं है. यह भी याद रहे यहाँ एक शोषक है तो दूसरा शोषित. रोमनों का अधिपत्य यहूदियों पर है. यह आज की भी कहानी है आगे की भी रहेगी. व्यापारी इस सन्दर्भ में शुरू से ही अपवाद की श्रेणी में आते हैं. और यहाँ भी राहिल के अब्बा कीमती पत्थरों के सौदागर हैं और उनका लेनदेन यहूदियों से लेकर रोमनों के बीच स्वीकार्य स्थिति में हैं. सनद रहे डैसिया के लिए गले का हार भी यही जनाब बना रहे थे, पर दंड विधान से यह भी मुक्त नहीं है.

खैर, वापस. दोनों का प्यार परवान चढ़ता भी है पर आगे ट्विस्ट हैं. कहते हैं इस बीमारी के संक्रमितों में कोई छुपाव दुराव नहीं होता नहीं होना चाहिए दोनों के बीच संदेह दबे पाँव आना चाहता है भी है. पर मारकस एक रात सबकुछ राहिल को बता देता है. बता देता है उसका मज़हब उसका दीन सब अलग है. वह कहता है उसने कोई धोखा नहीं किया, धोखा तो तब होता जब वह उसे छोड़ किसी दूसरे को प्यार करता..उसने तो सब कुछ साफ़ साफ़ बता दिया. पर नहीं, राहिल को यह सब नागवार गुज़रता है उसके लिए तो इस चेहरे को देखने के लिए वही आँख चाहिए जिसे बुतपरस्ती और कुफ्र की चमक दमक से नफरत हो. जिसमें यहूदी मज़हब और यहूदी यकीन का नूर हो. उन दोनों के बीच तकरीर हो ही रही थी और यहाँ से भाग जाने की योजना बन ही रही थी. जिस्म-ओ-रूह का साथ बनता कि अब्बा अपनी लाडली की खोज खबर लेते लेते वहां पहुँच गए. नाटक है इस लिए इस नाटकीयता पर कोई सवाल नहीं लिए जायेंगे.

यहाँ आग़ा हश्र उस तरफ हमारा ध्यान दिलाते हैं जहाँ मोहब्बत मज़हब से सवालात करती है. दोनों के बीच द्वंद्वात्मक विमर्श के प्रारंभिक बीज हम यहाँ देख सकते हैं.उनके दरमियान आज भी छत्तीस का ही आंकड़ा है. ऐसे किसी भी प्रसंग का हमें उल्लेख इसी कृति में शायद पहली बार इतने स्पेस के साथ और इतने सार्थक प्रश्नों के साथ दर्ज़ हैं. यहाँ यह भी देखने लायक है कि यदि राहिल मारकस/मनशिया के साथ भागने में सफल हो जाती तब दोनों के बीच धरम की क्या भूमिका होती..क्या इसे परे रख कर वे अपने जीवन के कार्यव्यापार को चला पाते..उनकी संतान किस धरम में दीक्षित होती..ऐसा क्या था कि इन सवालों को वहां नहीं उठाया जा सका..शायद उस समय काल में यह संभव ही न हो या इनका जनम ही न हुआ होगा..और सबसे बड़ी बात ये सब आगा हश्र के नहीं मेरे सवाल हैं..अगर ऐसा हुआ होता तो शायद इस नाटक का नाम यहूदी की लड़की  नहीं होता..       

अब मोर्चा एक खालिस यहूदी अज़रा के हाथ में था जिसके सामने एक धोखेबाज रोमन मारकस और उसके साथ भागने को आतुर बेटी भी गुनहगार थी जो रहम की गुहार लगा रही थी . हम आजतक यही सोचते आ रहे थे - हैं कि हर पिता तंग नजरी में यही सोचता है, उसकी बेटी को फुसलाया जा रहा है. यह उस समय का ही नहीं आज का भी सच है. पर यहाँ अज़रा अपनी बेटी को नाफरमान नाहंजार/बदचलन किरदार वाला कहते हैं..शायद गुस्से में हैं तभी आगे की तकरीर-तहरीर में अज़रा शांतचित होकर सारे कुफ़्र को भूलने को तैयार हो जाते है. उस विधर्मी को हम मज़हब बनाने के लिए अपने दीन का कलमा पढ़कर अपने मज़हब में लेने और अपनी शरियत के मुताबिक अपनी बेटी के साथ निकाह पढ़वाने के लिए तैयार हो जाते हैं. पर प्रेम पाने के लिए स्वांग धरने वाला यहूदी मुहब्बत करने का जुर्माना मज़हब से अदा करना नहीं स्वीकारता. वह हूर और ईमान में - आप इसे कदापि मेरी ज़ुबान न माने यह मारकस कह रहा है जो असमंजस की स्थिति में है - मज़हब को चुनता है.

मज़हब तो उसने चुन लिया अपना ईमान भी सलामत रखा पर मेरा खुराफाती भेजा दौड़ने लगता है उसे जस्टिफाई करने के लोंजिक - विशुद्ध हिंदी में कारण कार्य संबंध जैसा कुछ - ढूंढने लगता है और बड़ी दौड़ धूप के बाद यह ज़ेहन में आता है कि मारकस सिर्फ नाम के लिए मारकस नहीं है, यह रोम का होने वाला शहजादा भी नहीं है क्या..यहाँ फिर वही सवाल घेरने लगते हैं..कि राहिल के साथ भागने वाले को तब अपनी होने वाली सल्तनत की याद नहीं हो आई होगी..जब उस समय वह इसे छोड़ने को तैयार था तब मेरी यह खुराफात बेवजह है. वह राहिल को छोड़ सकता है पर मजहब छोड़ना मुहाल है..

पर दूसरी तरफ सवाल ये भी था क्या मारकस ने यहूदी का वेष धरते वक़्त यह सब नहीं सोचा होगा..जवाब देने के लिए न आग़ा हैं न ही मारकस. पर जब अपने से पूछता हूँ तो यही पता हूँ मैं भी वेष धरता आगे पीछे जैसे किसी सवाल तो ख्याल में आते ही नहीं. तब शायद मैं यही सोचता प्यार मोहब्बत जैसी चीज़ तो इस मज़हब धरम के खाचें में अटेगा ही नहीं, क्या इसके लिए भी इन सब की ज़रूरत पड़ती होगी..अगर मारकस हो कर इतना उलझा होता तब शायद राहिल से कभी मिल ही नहीं पता..प्रेम हमें सहज बनता है, इतनी जटिलताओं से उसका क्या लेना देना..यह उन दोनों के बीच का नितांत व्यक्तिगत मामला है जिसमे किसी का भी हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं. और यह सब मैं आज बिना मारकस हुए भी सोच रहा हूँ और ऐसा ही मानता भी हूँ.. 

इन सब सवालों जवाबों स्थितियों परिस्थितियों के बावजूद यह नाटक सिर्फ प्रेम के ही इर्दगिर्द नहीं घूमता यहाँ रोमन साम्राज्य एक ऐसे शोषक और सांस्कृतिक अभिजिति कर्ता के रूप में उपस्थित है जिसके लिए उनके अलावा हर कोई शोषित है उसके अस्तित्व में सिर्फ दमन चक्र हैं. वहां धर्मान्धतावाद, सत्ता के अहंकार का चरम है. ब्रूटस को ही नाना फड़नवीस के रूप में विजय तेंदुलकर अपने नाटक घासीराम कोतवाल में लाते हैं. आज जबकि साम्प्रदायिकता अपनी परा चरम सीमा पर पहुच गयी है और सत्ता का दमन चक्र तीव्र से तीव्रतर होता जा रहा है; इस नाटक की उपस्थिति अनिवार्य हो चुकी है.

फिर वहीँ. अब जबकि इतने सवाल मेरे सामने उकडू बैठें हैं और प्रश्नचिन्ह बौखला से गए है मेरी तरफ से ये आख़िरी सवाल यही है कि अगर अज़रा बचपन में ब्रूटस की बेटी को नहीं उठा लाया होता और असल में ही वह उसकी बेटी होती तब क्या होता..क्या ब्रूटस का ह्रदय द्रवित उठता..वह जलता हुआ कड़ाह जिसमे तेल खौल रहा था उसमें न अज़रा को फेंका जाता है न उस राहिल को जो कि अब ब्रूटस की बेटी हो चुकी है. अगर एक पल के लिए मान लिया जाये की अज़रा को उस जालिम ब्रूटस का यह अतीत पता था और उसने यहाँ झूठ बोल दोनों की जान ही नहीं बचायी अपितु रोम के गद्दीनशीं होने वाले शहजादे के साथ अपनी बेटी के निकाह को भी अवश्यम्भावी बना दिया..

मुझे कहीं न कहीं लगता है इन सबसे आग़ा हश्र कश्मीरी भी अपनी तरह से जूझ रहे थे और उस समय प्रेम जैसी दुर्लभ हो चुकी मानवीय भावना को दुबारा अमानवीय हो चुके समाज के सामने लाते हैं. बताते हैं एक यह भी कुछ होता है जिससे हम सब बहुत दूर जा चुके हैं. यही एक तत्व है जो हमें फिर से जोड़ सकता है.उस साम्प्रदायिक होते जरे परिदृश्य में ऐसे किसी नाटक को लिखना और उस लोकप्रिय संरचना में इसे ढालने की काबिलियत किसी किसी में ही होती है और आग़ा हश्र कश्मीरी उनमे से एक थे..

वे देख चुके थे हम सब धर्म के बाड़ों में कैद किये जा रहे हैं जिसके फलस्वरुप कम से कम एक स्वस्थ्य समाज का निर्माण नहीं हो सकता..उस समय कितने इन मायनों को देख पाए समझ पाए कह नहीं सकते पर आज इस दो हज़ार ग्यारह के मार्च चौबीस को बैठे मेरी गुज़ारिश है अगर इस नाटक को पढ़ नहीं सकते तो एक बार साल पचपन में बनी बिमल रॉय की फिल्म यहूदी तो देख ही सकते हैं..

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