मार्च 31, 2011

कहानीनुमा शुरू - कहानीनुमा ख़तम

पहले छोटी सी भूमिका..

कहानी लिखने वाले किस्सागो कुछ अलग होते होंगे. मैं लिखने चलता कहानी हूँ और बन वो कुछ और जाती हैं. लिखते करते हर कोई यही चाहता है कम से कम अपनी कही को दूसरे तक समझा तो सकें और ऐसी ही एक कोशिश तीन साल बाद करने जा रहा हूँ. खुद की उम्र देखता हूँ तो लगता है तब का लिखा क्या होगा. आज भी कई बार मेरी कही पढ़ने वालों तक सही सलामत नही पहुँच पाती. ऐसा नहीं है कि पिछला कहीं कबाड़ में फेंक दिया पर उन अध बनी - अधबुनी कहानियों पर फिर से काम करने का मन नहीं करता..इसे थोड़ा आलस भी कह सकते हैं और अपने उस समय को सुरक्षित रखने की अवचेतन में दबी पड़ी कोई मंशा भी..

अपनी बात को कुछ ऐसे कहूँ तो बात ऐसी सी है कि पता नहीं अपने शुरुवाती दिनों में जब लिखना शुरू कर रहा था तब सब अच्छे तो लगते थे, पर लगते पुराने ही थे. उस समय परसाई, श्रीलाल शुक्ल, शरद जोशी, शंकर पुणताम्बेकर जैसा लिखना सोचना हमेशा अपने ज़यादा पास लगा बजाय प्रेमचंद के पञ्च परमेश्वर के. उन सब लेखकों का समय और मेरा यहाँ होना ही सबसे बड़ा अंतर रहा होगा. यही वजह है जो मुझे यशपाल की परदा आज भी कहानी कम और पता नहीं कौन सा वक्तव्य लगती है. पर ये भी पता है लिख पाना कितना मुश्किल होता है. प्रेमचंद मुझे बड़े भाई साहेब लिखते हुए, हामिद के साथ अच्छे लगते हैं. भीष्म साहनी के साथ अमृतसर आना आज भी दिल के किसी कोने में है. अमरकांत तभी तक पचते हैं जब वे दोपहर का भोजन लिखते हैं, काशीनाथ सिंह भले कैसे भी लेखक हों पर रेहन पर रग्घू में उनका चुक जाना साफ़ दिखता है जबकि अपना मोर्चा आज भी कृति के रूप में ताज़ा लगती है..कुछ आदतों के साथ होता ही ऐसा है जैसे ये वाली, बनाने चलें हैं दलिया पक रही है दाल..

कुछ ज़यादा ही भटक गया हूँ वापस आते है इस कलाकारी पर जो तीन - सवा तीन साल बाद की जा रही है और इस सबको इस कहानी की छोटी सी भूमिका मान लिया जाये जो आपसे कमसे कम एक बार पढ़े जाने की उम्मीद तो करती ही है. साथ ही विनम्र आग्रह है कि इसे घिसेपिटे औजारों से न तौलें बघारें. नए बाँट बटखरें हों, तब कुछ हो सकता है. इसीलिए न पुराने तराजू- जंग लगे- खियाए- सठियाये- खार खाए परचुनियों की ज़रूरत है और न तो ये सफल कहलाएगी न असफल. क्योंकि मुझे खुद नहीं पता ये कहानी है भी या नहीं. कितनी बार शुरू होती है और कितनी बार ख़तम..इसलिए थोडा धैर्य भी चाहती है..

कहानीनुमा शुरू ..

पता नहीं हम दोनों के बीच ऐसा क्या था जो अब नज़र नहीं आता. कहीं गुम हो गया. शायद. जिसे वापस पाने की कोशिश हम दोनों ने ही नहीं की. की होती तो ऐसा जैसा नहीं लगता. आज हम दोनों शायद थोड़े शिफ्ट हो गएँ हैं. हम दोनों जहाँ से शुरू होते थे वहां से शुरू हमारी जिरहें अन्दर की गिरहें खोलती चलती थी. पर अब ऐसा नहीं होता. कई दिनों से. शायद उन सबके जवाब तुमने अकेले पा लिए और मैं पीछे रह गया. छुट गया. हम दोनों का शुरू सफ़र और गाड़ी पंचर..ऐसा नहीं है अब तुम दिखती नहीं हो, पर अब तुममे जब वी मेट की करीना नहीं दिखती. उसका खिलंदड़ नहीं दिखता. न ही कोलगेट वाली चमकती दमकती दंतिकाएँ. उसकी जगह नज़र आती है तुम्हारी दिन पर दिन 'बे-फिगर' होती जा रही बेडौल देह. बत्तीसी अब न मालूम किस बिदेसी लिपिस्टिक के पहरे में बंद रहती है. ऊपर से पता नहीं तुम्हारे 'ड्रेसिंग सेन्स' को क्या होता जा रहा है. जींस पहनोगी वो जो तीन साल पहले फिट आती थी अब नहीं..सलवार समीज क्यों छोड़ दिया पता नहीं. मैंने तो कभी नहीं कहा था. खाना भी तुमने बनाना नहीं सीखा. जब हम दोनों 'मैक डी' साथ जाते थे तब हम दोनों को कम समय मिल पता था.

इसलिए उस दिन हफ्ते में दो बार 'सीसीडी' की कॉफ़ी के साथ मिलना तय हुआ. बातचीत में हम दोनों वही दो तो थे जिन्हें अपनी अ-संस्कारी होती जा रही इस पीढ़ी में अपनी ही संतति सर्वाइवल के सारे पेंच ही तो खोलते कसते थे. उस दिन पता नहीं कैसे हमारी तुम्हारी बात 'प्री-मेरीटिअल सेक्स' पर आई और तुमने सारे लड़कों पर लम्बा चौड़ा लेक्चर सुना दिया जो शायद इस समाज पर तुम्हारे पीएचडी के थीसिस थे. और अगले दिन मुझे चाभी लौटानी पड़ी थी. बिना ताला खोले..मैं आज के पतियों की तरह अपनी होने वाली पत्नी को नहीं पिटूँगा बल्कि उसको बिकसने का सामान अवसर भी दूंगा. और इस बहाने मैं तुम्हारी बात ही तो कर रहा था..तुम्हे पीटा नहीं जायगा. और तुम्हे वो दिन याद है जब मैंने तुमसे कहा था लड़कियां शकल से समझदार नहीं, सुन्दर लगती हैं. और आज के लड़के भी लड़की की शकल ही देखते हैं और तुमने उलटे मुझसे यही सवाल पूछ लिया था..उसका जवाब उस दिन तो नहीं दिया पर आज दिए देता हूँ अगर तुम्हारी शकल पर जाया जाये तो उसमे समझदारी कम, उस सौन्दर्य की पॉपुलर समझ दिखती थी. पहले भी आज भी. पर तुमने कभी माना नहीं.

आज इस खाली से कमरे में मार्च का बनता देखता हूँ तो सांसे भारी और धड़कने तेज़ दौड़ने लगती हैं. हम दोनों उस खालीपन को भरने की कोशिश ही तो कर रहे थे जिसने चारों तरफ से हमें घेर रखा था. घर की चिकचिक से दूर कुछ पल दोनों को एक दूसरे में खो जाने का मौका तो मिलता था. भले इसके लिए मुझे अपने दोस्तों की जेबें खंगालनी पड़ती थी. पर उसका अपना मज़ा था. उनके तकाजे पर तकाजे. बेचारे मेरे कारण अपनी कोचिंग की फीस भी टाइम से नहीं भर पाते थे. पर आज तुम नहीं हो. मैं हूँ. और मेरी फ़िल्मी किसम की तन्हाई है. जिसे जिसे पता नहीं क्या-क्या ख्याल होते आते रहते हैं. एक बार तो कुछ ऐसा आया कि कुछ देर उस ज़मीन पर लोटता पोटता रहता जहाँ पुरुष वर्ग तो अपनी लघु शंका का समाधान कर लेता है पर अपनी स्त्री जाति नहीं कर पाती..

पता नहीं कैसा बिम्ब चुना था अपनी इस मनोदशा के लिए इतने तक होता तो सहन कर भी लेता पर..क्या ज़रूरत थी उसी दिन उसी घड़ी वहां से गुजरने की..?? पर नहीं और ऐसा करते देख मेरी कहानी की नायिका को मुझसे वितृष्णा होती है और उसे मुझसे दूर चले जाने का बहाना भी मिल जाता है. कैसा लगा होगा न कोई व्यक्ति उस जगह अपना मानसिक नियंत्रण खो देता है जहाँ इस तंत्र को सबसे अधिक सक्रिय रहने की ज़रूरत थी..

मिटटी में लथ पथ कपडे सने हुए गंधाते नाक मुंह कोहनी सब जगह. लोग उसे देख रहे हैं, कुछ कर नहीं रहे हैं. सिवाय दया के कुछ प्रवचन और सिरफिरे से लेकर उसकी पूरी वंशावली से सम्बन्ध स्थापित करने के. इन पंचाक्षरी गालियों से क्या यह नहीं ज्ञात होता कि हमारा समाज उस मनोदशा में ही पाया जाता है जिसका ढोंग वह सारे समय सोते जागते करता है और जिसे आप हम दैहिक नैतिकता रक्त शुद्धता जैसी पदावली के नाम से जानते बूझते उलझते रहते हैं. इससे यह भी पता चलता है नायक की रूचि सिर्फ एक बार मरने में नहीं इस प्रक्रिया से बार-बार गुजरने में थी. और जो उसे करीब से जानते थे उन्हें भी पता था ये पहली बार नहीं है. यहाँ सौभाग्य जैसी दैवीय कृपा के चलते से उसके इतने पास कोई नहीं है. इसलिए हमारा परम औदात्य को प्राप्त धैर्यवान पौरुष युक्त नायक निश्चिंत है कि घर जाते ही अपनी दुर्दशा का सारा दोष दिल्ली के बिना ढक्कन वाले किसी पास के गटर पर मढ़ देना है..

हाँ ये ज़रूर है उसे उस दिन सरकारी कार्य कुशलता के चलते कोई ऐसा कोई गटर ऐसा नहीं मिला फिर थक हार तीन घंटे इंतज़ार किया कि अँधेरा तो हो जाये तभी तो किसी गटर का ढक्कन अपने बूते ही हटा दे .वो बात अलग है कि पहले तो सूरज देर में ढला फिर एक बल्ब को निशाना बनाने के बाद जैसे- तैसे उस गली में अँधेरा हुआ भी, पर जब पुरुषार्थ की बारी आई तब यहाँ एक बार फिर कार्य कुशलता भरी पड़ी. हुआ कुछ यूँ कि जैसे ही ढ़क्कन हटा कर नायक लुड़काने लगा तभी विलुप्त प्राय गिद्ध की प्रजाति का एक खाकी वर्दी धारी जो देर से ऐसी ही किसी घात में इसे ही घूर रहा था, वहां धमक पड़ा..(यहाँ ध्यान अवश्य दें कि धैर्य सिर्फ हमारे नायक में ही नही बीस पच्चीस मिनिट इंतज़ार करने वाले उस महापुरुष में भी था जो हमारे नायक का जूझना देख रहा था..)अब इस विकट स्थिति से बचने का एक ही रास्ता था जो पैसे केंद्रीय भण्डार से पांच किलो वाले 'टाइड' को खरीदने खरीदने के लिए उसे दिए गए थे उनकी बलि इस मध्यस्थ को देनी पड़ी.चूँकि समय सात से ज़यादा हो चुका था और पिता जी नामक जीव के आने से पहले घर पहुँचना ही श्रेयकर था इसलिए उसे कोई घबराहट नही हुई. और आप भी घबराईये नहीं हमारे नायक को कुछ नहीं हुआ सिर्फ चार छेह दर्ज़न पुलिसिया गलियां खानी पड़ी और कपाल पर उस ठुल्ले की लाठी पड़ते-पड़ते बची. और पिता जी के लेक्चर से भी बचा वो अलग. इतने शारीरिक - मानसिक श्रम के बाद हमारा धीरोदात्त नायक अब थोड़ा थका-थका सा ज़रूर लग रहा है पर अभी अभी उसकी माता ने उसे हल्दी वाला दूध दिया है और अब चिंता की कोई बात है ही नही, मैं हूँ ना..

और आपके सामान्य ज्ञान के लिए बताता चलूँ यदि आप के भी दिल में यदि ये ख्याल आये तो सीधे 'मुद्रिका' 'बाहरी मुद्रिका' पकड़ रिंग रोड, धौला कुआँ, आत्मा राम सनातन धर्म कॉलेज (ए.आर.एस.डी.) और साउथ कैम्पस के दरवाजे के बीच पड़ते इस स्थल तक पहुच सकते हैं. आपकी नायिका कैसे पहुचेगी इसकी सरदर्दी मेरे खाते की नहीं है..अरे कहाँ देख रहे हो वही गेट जिसके इर्द गिर्द पुरुषों का वर्चस्व और एकाधिकार है जिसके पास जाते ही एक चुरकैन - इसे पढ़ें मूत्रगंध, साभार 'क्याप ', मनोहर श्याम जोशी, पन्ना पता नहीं - आपके मस्तिष्क की शिराओं को नासिका की तरफ सक्रीय कर देती हैं. और हाथ संकेत पाकर रुमाल को जेब से निकालने की प्रक्रिया में होते हैं तब तक पैर गति पकड़ उस विचित्र विकरण प्रभावित क्षेत्र से भाग लेते हैं.

अब समझ बिलकुल नहीं आ रहा कहानी शुरू कहाँ हुए और यहाँ पहुच कैसे गयी. नायक अकेला बैठा कहीं एकालाप कर रहा था तो फिर यहाँ मटमैला दुर्गंधित वातावरण कैसे व्याप्त हो गया लोगों की पगलायीं फब्तियां कैसे आन पड़ी..तो बंधू सखा मेरे - इसमें आप भी हैं जो बगलें झांक रहीं हैं माने आप, वही, स्त्री जाति जिसे कुछ विशेषाधिकारों से वंचित रखने का सामाजिक प्रपंच रचा गया है, और जिनमे से एक उपरोक्त वर्णित है - दो हाईफनों के बाद दोबारा पढ़ें और शांत चित्त धर के तिबारा उवाचें शायद समझ आ जाये.

स्त्रियों..!! आपके पास ऐसे विलक्षण क्षेत्र क्यों नहीं हैं..?? इस विकट समस्या पर प्रकाश हमारे गुरूजी डालते हुए बताते हैं कि इस पुरुष सत्तात्मक समाज ने आपके विरुद्ध सदियों से पॉलिटिक्स ऑफ़ बॉडी का व्योम रचा है आप लोगों को देह की राजनीति में फंसाए रखा. साहित्य की बात करें तो यह बात और भी स्पष्ट हो जाती है. यहाँ भी आपके इस क्षेत्र का बहुत ही कम वर्णन प्राप्त होता है. श्री लाल शुक्ल ने अपने राग दरबारी में आपके विशेष क्षेत्र की बात ज़रूर की. पर इसे गुणात्मक प्रतिनिधित्त्व तो नहीं कहा जा सकता न. कसप में जोशीजी थोड़ा आगे बढ़ते दिखते भी हैं और राग दरबारी से कहीं आगे की बात करते भी हैं पर इसे भी आये पंद्रह साल से ज़यादा हो चुके हैं. इसलिए यहाँ इन्पले( इन पंक्तियों का लेखक: कॉपी लेफ्ट साभार: हमारे संजीव सर) यह आग्रह आपसे करता है की आप इस स्पेसिअल एरिया की मांग करने के बजाय ऐसी टास्क फ़ोर्स बनाये जो पुरुष वर्चस्व को चुनौती देते हुए पब्लिक डोमेन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराएँ.

तो मैं यह भी कह रहा था इतने धैर्य के लिए धन्यवाद और मेरी सहानभूति आपके साथ भी है. अगर इतना लिखा पीछे का मै खुद पढूं तो यकीन के साथ के सकता हूँ के मेरी गिनती या तो असफल कहानीकार के रूप में होगी या उन उत्तर आधुनिक रचनाकारों को उनके सिवाय कोई जल्दी से समझ नहीं सकता. दूसरों को बार बार हिज्जे-हर्फ़ देखने-खोलने पड़ते हैं..उनका लिखा शोएब अख्तर जैसे चुके हुए गेंदबाजों के बाउन्सरों की तरह ही होता है. बस दुःख तो इस बात का है अपन मनोहर श्याम जोशी होने से रहे. उदय प्रकाश वाली एक अदद पीली छतरी वाली भी अपने लिए नहीं खोज पाए. पहले पहल इतने कुछ लिखा भी तो कूड़ाछाप. अच्छा है प्रेमचंद जैसा कुछ नहीं हुआ. वर्ना या तो नायक मेट्रो के आगे आकर अपनी जान दे देता या नायिका यू- टियूब पर अपनी आत्महत्या वाला विडियो अपलोड कर इस निष्ठुर निस्सार प्रेम वाले संसार को अलविदा कहती..नायिका ऐसा क्यूँ करती इस पर विवाद हो सकता है पर चूँकि कहानी अपदस्थ कर दी गयी है इसलिए एक खुली सम्भावना तो कही ही जा सकती है और आप आज के नायक से दिल्ली में नदी छलांग नहीं लगवा सकते.

मतलब न प्रेमचंद रहें हैं, न उनका इस्टाईल. यह ज़माना घर से भाग कर आर्य समाज से लेकर कोर्ट में जाकर शादी करने के विकल्प तो मुहैया करता ही है साथ में इस कॉस्मो मेट्रो पॉलीटिन में 'लिव इन' के सह जीवन जैसे संस्करण भी उपलब्ध हैं. यह जीवन से पलायन का समय नहीं उसके उपभोग का है. यह अंग प्रत्यंग के पूर्ण दोहन का काल जो ठहरा. इस पंक्ति को सहजीवन पर टिपण्णी के रूप में न पढ़ें, इसके स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकारें. और ऐसे ही हर पंक्ति को जानें बूझें.. मेरे कुछ दुष्ट मित्र मुझे विचारों में तो 'जैनेन्द्र' के पास पाते हैं पर उन्हें अड़ोस पड़ोस 'अज्ञेय' वाला नज़र आता है. इस वाली पंक्ति का कोई भी मायना आप लगाने को स्वतंत्र हैं.

और आखिर में मैं दुबारा प्रकट हो कर यह चेतावनी भी दे ही दूँ कि इन सारे उदगारों को उस प्रेमी के तो कभी न माने जाएँ जिसकी संभावित सांकेतिक प्रेमिका का या तो ब्याह तय हो चुका है और न ही वह यू- टियूब पर विडियो अपलोड करने वाली है और अब उस नायक से न बातचीत में दिलचस्पी लेती है न ही फुचकारने - इसे पुचकारना पढ़ें - में ही दिल लगता है. न ही कोई इसे सच्चाई वच्चाई दिखता आइना वाइना जैसा कुछ माना जाये. और न ही हम इसके होल सोल प्रोप्रयाटर हैं. यह सीधे सीधे अपनी बात कहने का घुमावदार रस्ता है जिसमे नायक अपनी भाषा से जूझता अपनी बात दूसरों तक पहुचना चाहता है..बस इतना ही..और बात पहुंची कि नहीं. भेजे में कुछ घुसा की नहीं..
                                                                                                                                 कहानीनुमा ख़तम..!!

1 टिप्पणी:

  1. हम बहराइच में बैठे तुम्हारी ये दिल्ली में लिखी कहानी समझने की कोशिश ही कर सकते हैं. पर जैसा तुम कह रहे हो तीन साल बाद इसमें वापस आये हो तो कुछ कसर तो है. जैसे यही की ये कहानी कम किसी उपन्यास और तुम्हारे उदय प्रकश जैसे किसी लम्बी कहानी का शुरुवाती प्लाट लगता है. कोशिश ठीक है लगे रहो पर पहले कुछ कहानिया पढ़ भी लो तो अच्छा होगा. और आगे कहूँ तो व्यंग्य भी है.और बहुत ही ताजगी भरा है गटर का ढ़क्कन, बलब फोड़ना और सरकारी कार्यकुशलता, और वो जमीन पे लोटना.. इस में हाथ क्यों नहीं खोलते.
    पर कुल मिला के हमें बहुत कसरत करनी पड़ी इसे पढ़ने में. थोडा सहज होते तो और मज़ा आता. अगरचे हम यही कहेंगे लिखते रहो बढ़िया लिखोगे ये भी तो एक कला है जैसा तुम कह रहे थे..और बहराइच कब आना हो रहा है, दरगाह मेले में तो होगे न..

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