अप्रैल 01, 2011

थोडा सा रूमानी हो जाएँ

इन अलसाई सी सुपहरी दुपहरियों के उबाऊ से खाली जेब से मुँह बाते दिन किसी कोई भी कहीं का नही छोड़ते. कुछ करने का मन नही करता. खिड़की के बहार नंगे खड़े पेड़ देख दिल कुछ बैठ सा जाता है और रात के धुंधलके में डाली पर बैठी कोई पुरानी याद दस्तक देकर नींद अपने साथ ले जाती है. फिर मेरी बोझिल सी पलकें रहतीं हैं और..और कुछ देर के लिए ही सही उसका साथ भी..फिर खिड़की के बाहर होते हैं कुछ सफ़े जिन्हें न उसने पढ़ा न मैं पढ़ पाया.. 

उन पलों में हम दोनों चुप एक दुसरे के एकांत के सीमा में तब तक नहीं जाते जब तब वहां से कोई इशारा न हो. कभी-कभी कई रातें ऐसी भी गुज़र जाती हैं जब कोई हिलता डुलता नहीं बस पता नहीं ऐसा ही साथ हम दोनों को अच्छा लगता है. यही पल तो हम दोनों की साझा है जहाँ किसी और की आवाजाही नहीं..कभी कभी सोचता हूँ कब तक ऐसा चलेगा. वो बोलने वाला क्षण कैसा होगा, सोचता हूँ, पूछूं..पर रह-रह जाता हूँ..वो भी रह-रह जाती है..इन्ही के बीच चलो आज तुम्हे भी ले चलता हूँ. चलोगे न..पर हाँ.. ध्यान रहे, जब हम दोनों एक दूसरे में खोते जा रहे हों, तुम चुप से, हमें देखते रहने, क्योंकि उसे भी, और मुझे भी, ताक-झांक पसंद नहीं..


# अव्वल अव्वल की दोस्ती है अभी :अहमद फ़राज़

अव्वल अव्वल की दोस्ती है अभी
इक ग़ज़ल है कि हो रही है अभी
मैं भी शहरे-वफ़ा में नौवारिद
वो भी रुक रुक के चल रही है अभी

मैं भी ऐसा कहाँ का ज़ूद शनास
वो भी लगता है सोचती है अभी
दिल की वारफ़तगी है अपनी जगह
फिर भी कुछ एहतियात सी है अभी


गरचे पहला सा इज्तिनाब नहीं
फिर भी कम कम सुपुर्दगी है अभी
कैसा मौसम है कुछ नहीं खुलता
बूंदा-बांदी भी धूप भी है अभी

ख़ुद-कलामी में कब ये नशा था
जिस तरह रु-ब-रू कोई है अभी
क़ुरबतें लाख खूबसूरत हों
दूरियों में भी दिलकशी है अभी

फ़सले-गुल में बहार पहला गुलाब
किस की ज़ुल्फ़ों में टांकती है अभी
सुबह नारंज के शिगूफ़ों की
किसको सौगात भेजती है अभी

रात किस माह -वश की चाहत में
शब्नमिस्तान सजा रही है अभी
मैं भी किस वादी-ए-ख़याल में था
बर्फ़ सी दिल पे गिर रही है अभी

मैं तो समझा था भर चुके सब ज़ख़्म
दाग़ शायद कोई कोई है अभी
दूर देशों से काले कोसों से
कोई आवाज़ आ रही है अभी

ज़िन्दगी कु-ए-ना-मुरादी से
किसको मुड़ मुड़ के देखती है अभी
इस क़दर खीच गयी है जान की कमान
ऐसा लगता है टूटती है अभी

ऐसा लगता है ख़ल्वत-ए-जान में
वो जो इक शख़्स था वोही है अभी
मुद्दतें हो गईं 'फ़राज़' मगर
वो जो दीवानगी थी, वही है अभी

 * * * * 
{नौवारिद - नया आने वाला, ज़ूद-शनास - जल्दी पहचानने वाला
वारफतगी - खोया-खोया पन, इज्तिनाब - अलगाव
खुदकलामी - खुद से बातचीत, शिगूफ़े - फूल, कलियां}

 * * * * 
# किताबें झाँकती हैं :गुलज़ा 

कोई सफ़ा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है
कई लफ़्ज़ों के मानी गिर पड़े है
बिना पत्तों के सूखे टूँड लगते है वो सब अल्फ़ाज़
जिन पर अब कोई मानी उगते नही है

जबाँ पर ज़ायका आता था सफ़्हे पलटने का
अब उँगली क्लिक करने से बस एक झपकी गुज़रती है
बहोत कुछ तह-ब-तह खुलता चला जाता है परदे पर
क़िताबों से जो ज़ाती राब्ता था वो कट-सा गया है

कभी सीनें पर रखकर लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे
कभी घुटनों को अपने रहल की सूरत बनाकर
नीम सज़दे में पढ़ा करते थे
छूते थे जंबीं से

वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइन्दा भी
मगर वो जो उन क़िताबों में मिला करते थे
सूखे फूल और महके हुए रूक्के
क़िताबें माँगने, गिरने, उठाने के बहाने जो रिश्ते बनते थे
अब उनका क्या होगा...!!

* * * * 
# दिल में अब यूँ तेरे भूले हुये ग़म आते हैं :फैज़ अहमद फैज़  

दिल में अब यूँ तेरे भूले हुये ग़म आते हैं
जैसे बिछड़े हुये काबे में सनम आते हैं


इक इक कर के हुये जाते हैं तारे रौशन
मेरी मन्ज़िल की तरफ़ तेरे क़दम आते हैं


रक़्स-ए-मय तेज़ करो, साज़ की लय तेज़ करो
सू-ए-मैख़ाना सफ़ीरान-ए-हरम आते हैं


कुछ हमीं को नहीं एहसान उठाने का दिमाग
वो तो जब आते हैं माइल-ब-करम आते हैं


और कुछ देर न गुज़रे शब-ए-फ़ुर्क़त से कहो
दिल भी कम दुखता है वो याद भी कम आते है

* * * * 
# अतीत में तुम्हारी रूचि देखते हुए :असद ज़ैदी

मैं चाहता हूँ कि सब खामोश हों जाएँ
तब मैं बोलना शुरू करूँ
 

मैं तुमसे एक बात कहूँगा
जब ये दिन चले जायेंगे
 

और चानक एहसास होगा 
कि क्या मालूम कब से
तुम्हे सुनना चाहता था
मैं अपना यह अनुभव

* * * * 
# छूटते चले जाने की घटना :उदय प्रकाश  

मैंने उससे कुछ कहा
उसने मुझसे कुछ कहा 

हम दोनों ने एक दुसरे को
कुछ कहते हुए सुना 

वह एक दूसरे के आर-पार 
हो आने की क्रिया थी

वह एक दूसरे से
छूटते चले जाने की क्रिया थी.

* * * *

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