अप्रैल 01, 2011

होता है शबो-रोज़ तमाशा मेरे आगे : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़


 {यह आत्मकथात्मक अंश नया पथ के फ़ैज़ जन्मशती विशेषांक से साभार लिया जा रहा है .ऐसे रचनाकार को जानने समझने के लिए इससे बढ़िया माध्यम और क्या हो सकता है. इसलिए यह एक अवसर है जब हम उन्हें उनकी आँखों से और बारीकी से देख-जान सकते हैं..} 

हमारे शायरों को हमेशा यह शिकायत रही है कि ज़माने ने उनकी क़द्र नहीं की।…हमें इससे उलट शिकायत यह है कि हम पे लुत्फ़ो- इनायात की इस क़दर बारिश रही है; अपने दोस्तों की तरफ़ से, अपने मिलनेवालों की तरफ़ से और उनकी जानिब से भी ज़िनको हम जानते भी नहीं कि अक्सर दिल में हिचक़ महसूस होती है कि इतनी तारीफ़ और वाहवाही पाने का हक़दार होने के लिए जो थोडा बहुत काम हमने किया है, उससे बहुत ज़ियादा हमें करना चाहिए था। 

यह कोई आज़ की बात नहीं है। बचपन ही से इस किस्म का असर औरों पर रहा है। जब हम बहुत छोटे थे, स्कूल में पढ़ते थे, तो स्कूल के लड़कों के साथ भी कुछ इसी किस्म के तअल्लुक़ात क़ायम हो गये थे। खाहमखाह उन्होंने हमें अपना लीडर मान लिया था, हालांकि लीडरी के गुन हमें नहीं थे।या तो आदमी बहुत लधबाज़ हो कि दूसरे उनका रौब मानें, या वह सबसे बड़ा विद्वान हो। हम पढ़ने लिखने में ठीक़ थे, खेल भी लेते थे, लेकिन पढ़ाई में हमने कोई ऐसा कमाल पैदा नहीं किया था कि लोग हमारी तरफ़ ज़रूर धयान दें। 

बचपन का मैं सोचता हूं तो एक यह बात खास तौर से याद आती है कि हमारे घर में औरतों का एक हुजूम था। हम जो तीन भाई थे उनमें हमारे छोटे भाई (इनायत) और बड़े भाई (तुफ़ैल) घर की औरतों से बागी होकर खेल कूद में जुट रहते थे। हम अकेले उन खावातीन के हाथ आ गये। इसका कुछ नुक़सान भी हुआ और कुछ फ़ायदा भी। फ़ायदा तो यह हुआ कि उन महिलाओं ने हमको इंतिहाई शरीफ़ाना ज़िन्दगी बसर करने पर मजबूर किया; ज़िसकी वजह से कोई असभ्य या उजड्‌ड़ किस्म की बात उस ज़माने में हमारे मुंह से नहीं निकलती थी। अब भी नहीं निकलती। नुक़सान यह हुआ, ज़िसका मुझे अक्सर अफ़सोस होता है, कि बचपन के खिलंदड़ेपन या एकतरह की मौजी ज़िन्दगी गुज़ारने से हम कटे रहे।मसलन यह कि गली में कोई पतंग उडा रहा है, कोई गोलियां खेल रहा है, कोई लट्‌टू चला रहा है; हम सब खेलकूद देखते रहे थे, अकेले बैठकर। 'होता है शबो रोज़ तमाशा मेरे आगे' वाला मामला। हम उन तमाशों के सिफ़र् तमाशाई बने रहते, और उनमें शरीक़ होने की हिम्मत इसलिए नहीं होती थी कि उसे शरीफ़ाना शगूल या शरीफ़ाना काम नहीं समझते थे। 

उस्ताद भी हम पर मेहरबान रहे। आजकल की मैं नहीं जानता, हमारे ज़माने में तो स्कूल में सख्त पिटाई होती थी। हमारे वक़तों के उस्ताद तो निहायत ही जल्लाद किस्म के लोग थे। सिफ़र् यही नहीं कि उनमें से किसी ने हमको हाथ नहीं लगाया बल्कि हर क़लास में मॉनिटर बनाते थे : बल्कि (साथी लड़कों को) सज़ा देने का मंसब भी हमारे हवाले करते थे, यानी फ़लां को चांटा लगाओ, फ़लां को थप्पड़ मारो।इस काम से हमें बहुत कोफ्त होती थी, और हम कोशिश करते थे कि जिस क़दर भी मुमकिन हो यों सज़ा दें कि हमारे शिकार को वह सज़ा महसूस न हो। तमाचे की बजाय गाल थपथपा दिया, या कान आहिस्ता से खींचा, वगैरह। कभी हम पकड़े जाते तो उस्ताद कहते 'यह कया कर रहे हो! ज़ोर से चांटा मारो!' 

इसके दो प्रभाव बहुत गहरे पड़े। एक तो यह कि बच्चों की जो दिलचस्पियां होती हैं उनसे वंचित रहे। दूसरे यह कि अपने दोस्तों, कलासवालों और उस्तादों से हमें बेहद स्नेह आशीष, खुलापन और अपनाव मिला; जो बाद के ज़माने के दोस्तों और समकालीनों से मिला, और आज़ भी मिल रहा है। 

सुबह हम अपने अब्बा के साथ फ़ज्र की नमाज़ पढ़ने मस्जिद जाया करते थे। मामूल (नियम) यह था कि अज़ान के साथ हम उठ बैठे, अब्बा के साथ मस्जिद गये, नमाज़ अदा की; और घंटाडेढ़ घंटा मौलवी इब्राहीम मीर सियालकोटी से, जो अपने वक्त के बड़े फ़ाज़िल (विद्वान) थे, क़ुरानशरीफ़ का पाठ पढ़ा समझा; अब्बा के साथ डेढ दो घंटों की सैर के लिये गये; फिर स्कूल। रात को अब्बा बुला लिया करते, खत लिखने के लिए। उस ज़माने में उन्हें खत लिखने में कुछ दिक्कत होती थी। हम उनके सेक्रेटरी का काम अंजाम देते थे। उन्हें अखबार भी पढ़ कर सुनाते थे। इन कई कामों में लगे रहने की वजह से हमें बचपन में बहुत फ़ायदा हुआ। उर्दू अंग्रेज़ी अखाबारात पढ़ने और खत लिखने की वजह से हमारी जानकारी काफ़ी बड़ी। 

एक और याद ताज़ा हुई। हमारे घर से मिली हुई एक दुकान थी, जहां किताबें किराये पर मिलती थीं। एक किताब का किराया दो पैसे होता। वहां एक साहब हुआ करते थे ज़िन्हें सब ‘भाई साहब* कहते थे। भाई साहब की दुकान में उर्दू साहित्य का बहुत बड़ा भंडार था। हमारी छठी सातवीं जमात के विद्यार्थी युग में ज़िन किताबों का रिवाज़ था, वह आजकल क़रीब क़रीब नापैद हो चुकी हैं, जैसे तिलिस्मेहोशरुबा, फ़सानएआज़ाद, अद्बुल हलीम शरर के नॉवेल, वगैरह। ये सब किताबें पढ़ डालीं इसके बाद शायरों का कलाम पढ़ना शुरू किया। दाग  का कलाम पढ़ा। मीर का कलाम पढ़ा। गालिब तो उस वक्त बहुत ज़ियादा हमारी समझ में नहीं आया। दूसरों का कलाम भी आधा समझ में आता था, और आधा नहीं आता था। लेकिन उनका दिल पर असर कुछ अजब किस्म का होता था। यों, शेर से लगाव पैदा हुआ, और साहित्य में दिलचस्पी होने लगी। 

हमारे अब्बा के मुंशी घर के एकतरह के मैनेजर भी थे। हमारा उनसे किसी बात पर मतभेद हो गया तो उन्होंने कहा ‘अच्छा, आज़ हम तुम्हारी शिकायत करेंगे कि तुम नॉवेल पढ़ते हो; स्कूल की किताबें पढ़ने की बजाय छुपकर अंटशंट किताबें पढ़ते हो।* हमें इस बात से बहुत डर लगा, और हमने उनकी बहुत मिन्नत की कि शिकायत न करें; मगर वह न माने और अब्बा से शिकायत कर ही दी।अब्बा ने हमें बुलाया और कहा ‘मैंने सुना है, तुम नॉवेल पढ़ते हो।* मैंने कहा ‘जी हां। 'कहने लगे ‘नॉवेल ही पढ़ना है तो अंग्रेज़ी नॉवेल पढ़ो, उर्दू के नॉवेल अच्छे नहीं होते। शहर के किले में जो लायब्रेरी है, वहां से नॉवेल लाकर पढ़ा करो।' 

हमने अंग्रेज़ी नॉवेल पढ़ना शुरू किये। डिकेंस, हार्डी, और न जाने कया कया पढ़ डाला। वह भी आधा समझ में आता था और आधा पल्ले न पढ़ता था। मगर इस पढ़ने की वजह से हमारी अंग्रेज़ी बेहतर हो गयी। दसवीं जमात में पहुंचने तक़ महसूस हुआ कि बाज़ उस्ताद पढ़ाने में गलतियां कर जाते हैं। हम उनकी अंग्रेज़ी दुरुस्त करने लगे। इस पर हमारी पिटाई तो न हुई; अलबत्ता वो उस्ताद कभी खफ़ा हो जाते और कहते ‘अगर तुम्हें हमसे अच्छी अंग्रेज़ी आती है तो फिर तुम ही पढ़ाया करो, हमसे क्यों पढ़ते हो!'

उस ज़माने में कभी कभी मुझ पर एक खास किस्म का भाव छा जाता था। जैसे, यकायक़ आस्मान का रंग बदल गया है बाज़ चीज़ें  कहीं दूर चली गयी हैं…धूप का रंग अचानक़ मेंहदी कासा हो गया है…पहले जो देखने में आता था, उसकी सूरत बिल्कुल बदल गयी है। दुनिया एक तरह की पर्दए तस्वीर के किस्म की चीज़ महसूस होने लगती थी। इस कैफ़ीयत (भावना) का बाद में भी कभी कभी एहसास हुआ है, मगर अब नहीं होता। 

मुशायरे भी हुआ करते थे। हमारे घर से मिली हुई एक हवेली थी जहां सर्दियों के ज़माने में मुशायरे किये जाते थे। सियालकोट में पंडित राजनारायन ‘अरमान* हुआ करते थे, जो इन मुशायरों के इंतिज़ामात किया करते थे। एक बजुर्ग मुंशी सिराजदीन मरहूम थे अल्लामा इक़बाल के दोस्त, श्रीनगर में महाराजा कश्मीर के मीर मुंशी, वह सदारत किया करते थे। जब दसवीं जमात में पहुंचे तो हमने भी तुकबंदी शुरू कर दी, और एक दो मुशायरों में शेर पढ़ दिये। मुंशी सिराजदीन ने हम से कहा ‘मियां, ठीक़ है, तुम बहुत तलाश से (परिश्रम से) शेर कहते हो, मगर यह काम छोड़ दो। अभी तो तुम पढ़ो लिखो, और जब तुम्हारे दिलोदिमाग में पुख्तगी आ जाये तब यह काम करना। इस वक्त यह महज़ वक्त की बर्बादी है।' हमने शेर कहना बंद कर दिया। 

अब हम मरे कालेज़ सियालकोट में दाखिल हुए, और वहां प्रोफ़ेसर यूसुफ़ सलीम चिश्ती उर्दू पढ़ाने आये, जो इक़बाल के मुफ़स्सिर (भाष्यकार) भी हैं। तो उन्होंने मुशायरे की तरह डाली। और कहा ‘तरह पर(दिये हुए सांचे पर) शेर कहो! हमने कुछ शेर कहे, और हमें बहुत दाद मिली। चिश्ती साहब ने मुंशी सिराजदीन से बिल्कुल उलटा मशविरा दिया और कहा फ़ौरन इस तरफ़ तवज्जुह करो, शायद तुम किसी दिन शायर हो जाओ! 

गवर्नमेंट कॉलेज़ लाहौर चले गये। जहां बहुत ही फ़ाज़िल और मुश्फिक़ (विद्वान और स्नेही) उस्तादों से नियाज़मंदी हुई। पतरस बुखारी थे; इस्लामिया कालेज़ में डाक्टर तासीर थे; बाद में सूफ़ी तबस्सुम साहब आ गये। इनके अलावा शहर के जो बड़े साहित्यकार थे इम्तियाज़ अली ताज़ थे; चिराग हसन हसरत,हफ़ीज़ जालंधरी साहब थे; अख्तर शीरानी थे उन सबसे निजी राहरस्म हो गयी। उन दिनों पढ़ाने वालों और लिखनेवालों का रिश्ता अदब (साहित्य) के साथ साथ कुछ दोस्ती कासा भी होता था। कॉलेज़ की कलासों में तो शायद हमने कुछ ज़ियादा नहीं पढ़ा; लेकिन उन बज़ुर्गों की सुह्‌बत और मुहब्बत से बहुत कुछ सीखा। उनकी महफिलों में हम पर शफ़क़त  होती थी, और हम वहां से बहुत कुछ हासिल करके उठते थे। 

हमने अपने दोस्तों से भी बहुत सीखा। जब शेर कहते तो सबसे पहले खास दोस्तों ही को सुनाते थे। उनसे दाद मिलती तो मुशायरों में पढ़ते। अगर कोई शेर खुद पसंद न आया, या दोस्तों ने कहा, निकाल दो, तो उसे काट देते। एम.ए. में पहुंचने तक़ बाक़ायदा लिखना शुरू कर दिया था। 

हमारे एक दोस्त हैं ख्वाजा खुर्शीद अनवर। उनकी वजह से हमें संगीत में दिलचस्पी पैदा हुई। खुर्शीद अनवर पहले तो दहशतपसंद (क्रांतिकारी) थे, भगतसिंह ग्रुप  में शामिल। उन्हें सज़ा भी हुई, जो बाद में माफ़ कर दी गयी। दहशतपसंदी तर्क करके वह संगीत की तरफ़ आ गये। हम दिन में कॉलेज़ जाते और शाम को खुर्शीद अनवर के वालिद ख्वाजा फ़ीरोजुद्दीन मरहूम की बैठक़ में बड़े बड़े उस्तादों का गाना सुनते। यहां उस ज़माने के सब ही उस्ताद आया करते थे; उस्ताद तवक़कुल हुसैन खां, उस्ताद अद्बुलवहीद खां, उस्ताद आशिक़ अली खां, और छोटे गुलाम अली खां, वगैरह। इन उस्तादों के साथ के और हमारे दोस्त रफ़ीक़ गज़नवी मरहूम से भी सुह्‌बत होती थी। रफ़ीक़ ला कॉलेज़ में पढ़ते थे। पढ़ते तो खाक थे, बस रस्मी तौर पर कॉलेज़ में दाखिला ले रख्खा था। कभी खुर्शीद अनवर के कमरे में और कभी रफ़ीक़ के कमरे में बैठक़ हो जाती थी। गरज़ इस तरह हमें इस ललित कला से आनंद का काफ़ी मौक़ा मिला। 

जब हमारे वालिद गुज़र गये तो पता चला किघर में खाने तक़को कुछ नहीं है। कई साल तक दरबदर फिरे और फ़ाक़ामस्ती की। इसमें भी लुत्फ  आया, इसलिए कि इसकी वजह से ‘तमाशाएअहलेकरम(पैसे वालों की ह्मपा का नाटक, गालिब का शेर है : बनाकर फ़क़ीरों का हम भेस गालिब/तमाशाएअहलेकरम देखते हैं) देखने का बहुत मौक़ा मिला, खास तौर से अपने दोस्तों से। कॉलेज़ में एक छोटा सा हल्का (मंडली) बन गया था। कोयटा के हमारे दोस्त थे, एहतिशामुद्दीन और शेखा अहमद हुसैन, डॉ. हमीदुद्दीन भी इस हल्के में शामिल थे। इनके साथ शाम को महफिल रहा करती। जवानी के दिनों में जो दूसरे वाकिआत होते हैं वह भी हुए, और हर किसी के साथ होते हैं। 

गर्मियों में कॉलेज़ बंद होते, तो हम कभी खुर्शीद अनवर और भाई तुफ़ैल के साथ श्रीनगर चले जाया करते, और कभी अपनी बहन के पास लायलपुर पहुंच जाते। लायलपुर में बारी अलीग और उनके गिरोह के दूसरे लोगों से मुलाक़ात रहती। कभी अपनी सबसे बड़ी बहन के यहां धरमशाला चले जाते, जहां पहाड़ की सीनरी देखने का मौक़ा मिलता, और दिल पर एक खास किस्म का नक्श (गहरा प्रभाव) होता। हमें इनसानों से जितना लगाव रहा, उतना कुदरत के मनाज़िर (सीन सीनरी) और नेचर के हुस्न को देखने परखने का नहीं रहा। फिर भी उन दिनों मैंने महसूस किया कि शहर के जो गली मुहल्ले हैं, उनमें भी अपना एक हुस्न है जो दरिया और सहरा, कोहसार या सर्वओसमन से कम नहीं। अलबत्ता उसको देखने के लिए बिल्कुल दूसरी तरह की नज़र चाहिए

मुझे याद है, हम मस्ती दरवाज़े के अंदर रहते थे। हमारा घर ऊंची सतह पर था। नीचे नाला बहता था। छोटा सा एक चमन भी था। चारों तरफ़ बागात थे। एक रात चांद निकला हुआ था। चांदनी नाले और इर्द गिर्द के कूड़े करकट के ढेर पर पड़ रही थी। चांदनी और साये, ये सब मिलकर कुछ अजब भेदभरा सा मंज़र बन गये थे। चांद की इनायत से उस सीन पर भद्‌दा पहलू छुप गया था और कुछ अजीब ही किस्म का हुस्न पैदा हो गया था; ज़िसे मैंने लिखने की कोशिश भी की है। एकाध नज़म में यह मंज़र खेंचा है जब शहर की गलियों, मुहल्लों और कटरों में कभी दोपहर के वक्त कुछ इसी किस्म का रूप आ जाता है जैसे मालूम हो कोई परिस्तान है। 'नीमशब ','चांद', 'खुदफ़रामोशी', ‘बाम्‌ओदर खामुशी के बोझ से चूर', वगैरह उसी ज़माने से संबंध रखती हैं। 

एम.ए. में पहुंचे तो कभी कलास में जाने की ज़रूरत महसूस हुई, कभी बिल्कुल जी न चाहा। दूसरी किताबें जो कोर्स में नहीं थीं, पढ़ते रहे। इसलिए इम्तिहान में कोई खास पोज़ीशन हासिल नहीं की। लेकिन मुझे मालूम था कि जो लोग अव्वल दोअम आते हैं, हम उनसे ज़ियादा जानते हैं, चाहे हमारे नंबर उनसे कम ही क्यों न हों। यह बात हमारे उस्ताद लोग भी जानते थे। जब किसी उस्ताद का, जैसे प्रोफ़ेसरडिकिन्सन या प्रोफ्रेसर कटपालिया थे, लेकचर देने को जी न चाहता तो हमसे कहते हमारी बजाय तुम लेकचर दो; एक ही बात है! अलबत्ता प्रोफ़ेसर बुखारी बड़े क़ायदे के प्रोफ़ेसर थे। वह ऐसा नहीं करते थे। प्रोफ़ेसर डिकिन्सन के ज़िम्मे उन्नीसवीं सदी का नस्‌री अदब था; मगर उन्हें उससे दरअस्ल कोई दिलचस्पी नहीं थी। इस लिए हमसे कहा दो तीन लेकचर तैयार कर लो! दूसरे जो दो तीन लायक़ लड़के हमारे साथ थे, उनसे भी कहा दो दो तीन तीन लेकचर तुम लोग भी तैयार कर दो! किताबों वगैरह के बारे में कुछ पूछना हो तो आ के हमसे पूछ लेना। चुनांचे, नीमउस्ताद हम उसी ज़माने में हो गये थे। 

शुरू शुरू में शायरी के दौरान में, या कॉलेज़ के ज़माने में हमें कोई खायाल ही न गुज़रा कि हम शायर बनेंगे। सियासत वगैरह तो उस वक्त ज़ेहन में बिल्कुल ही न थी। अगरचे उस वक्त की तहरीकों (आंदोलनों) मसल्‌न कांग्रेस तहरीक, खिलाफ़त तहरीक, या भगत सिंह की दहशतपसंद तहरीक़ के असर तो ज़ेहन में थे, मगर हम खुद इन में से किसी किस्से में शरीक़ नहीं थे। 

शुरू में ख्याल हुआ कि हम कोई बड़े क्रिकेटर बन जायें, क्योंकि लड़कपन से क्रिकेट का शौक़ था और बहुत खेल चुके थे। फिर जी चाहा, उस्ताद बनना चाहिए; रिसर्च करने का शौक़ था। इनमें से कोई बात भी न बनी। हम क्रिकेटर बने न आलोचक; और न रिसर्च किया, अलबत्ता उस्ताद (प्राधयापक) होकर अमृतसर चले गये। 

हमारी जिंदगी का शायद सबसे खुशगवार ज़माना अमृतसर ही का था; और कई एतिबार से। एक तो कई इस वजह से, कि जब हमें पहली दफ़ा पढ़ाने का मौक़ा मिला तो बहुत लुत्फ आया। अपने विद्यार्थियों से दोस्ती का लुत्फ ; उनसे मिलने और रोज़मर्रा की रस्मोराह का लुत्फ ; उनसे कुछ सीखने, और उन्हें पढ़ाने का लुत्फ । उन लोगों से दोस्ती अब तक क़ायम है। दूसरे यह कि, उस ज़माने में कुछ संजीदगी से शेर लिखना शुरू किया। तीसरे यह कि, अमृतसर ही में पहली बार सियासत में थोड़ी बहुत सूझबूझ अपने कुछ साथियों की वजह से पैदा हुई; ज़िनमें महमूदुजज़फ़र थे, डाकटर रशीद जहां थीं, बादमें डाकटर तासीर आ गये थे। यह एक नयी दुनिया साबित हुई। मज़दूरों में काम शुरू किया। सिविल लिबर्टीज़ की एक अंजुमन (संस्था) बनी, तो उसमें काम किया, तरक्कीपसंद तहरीक़ शुरू हुई तो उसके संगठन में काम किया। इन सबसे जेहनी तस्कीन (मानसिक बौद्घिक़ संतोष) का एक बिल्कुल नया मैदान हाथ आया। 

तरक्कीपसंद अदब के बारे में बहसें शुरू हुई, और उनमें हिस्सा लिया। ‘अदबेलतीफ़* के संपादन की पेशकश हुई तो दो तीन बरस उसका काम किया। उस ज़माने में लिखने वालों के दो बड़े गिरोह थे;एक अदब बराय अदब ('साहित्य साहित्य के लिए') वाले, दूसरे तरक्कीपसंद थे। कई बरस तक़ इन दोनों के दरमियान बहसें चलती रहीं; ज़िसकी वजह से काफ़ी मसरूफियत रही जो, अपनी जगह खुद एक बहुत ही दिलचस्प और तस्कीनदेह तजुर्बा था। पहली बार उपमहाद्वीप में रेडियो शुरू हुआ। रेडियो में हमारे दोस्त थे। एक सैयद रशीद अहमद थे, जो रेडियो पाकिस्तान के डायरेकटर जनरल (महाधीक्षक) हुए। दूसरे, सोमनाथ चिब थे, जो आजकल हिंदुस्तान में पर्यटन विभाग के अधयक्ष हैं। दोनों बारीबारी से लाहौर के स्टेशन डायरेकटर मुक़र्रर हुए। हम और हमारे साथ शहर के दो चार और अदीब (साहित्यकार) डाकटर तासीर, हसरत, सूफ़ी साहब और हरिचंद 'अख्तर' वगैरह रेडियो आने जाने लगे। उस ज़माने में रेडियो का प्रोग्राम डायरेकटर ऑफ़ प्रोग्राम्ज  नहीं बनाता था, हम लोग मिलकर बनाया करते थे। नयी नयी बातें सोचते थे और उनसे प्रोग्राम का खाका तैयार करते थे। उन दिनों हमने ड्रामे लिखे, फ़ीचर लिखे, दो चार कहानियां लिखीं। यह सब एक बंधा हुआ काम था। रशीद जब दिल्ली चले गये, तो हम देहली जाने लगे। वहां नये नये लोगों से मुलाक़ात हुईं। देहली और लखनऊ के लिखने वाले गिरोहों से जान पहचान हुई। मजाज़, सरदार जाफ़री, जॉनिसार अख्तर, जज्बी और मखदूम मरहूम से रेडियो के वास्ते से राबिता (संपर्क) पैदा हुआ; ज़िससे दोस्ती के अलावा समझ और सूझबूझ में तरह तरह के इज़ाफ़े हुए। वह सारा ज़माना मसरूफियत का भी था, और एकतरह से बेफिक्री का भी।

उर्दू से अनुवाद : शमशेर बहादुर सिंह
(पुनः साभार नया पथ; अक्तूबर- दिसंबर :2010)

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