अप्रैल 02, 2011

किरकेटवा चालू अहे..!!

क्रिकेट जैसे खेल के साथ सबकुछ नत्थी कर इस निकम्मे से देश को और निकम्मा बना दिया. सारी राष्ट्रीयता सारा गर्व गौरव सम्मान सब इसी के इर्दगिर्द गुम्फित से हैं. कल रात से सब अपना 'फ़ेक-फेस-'बुक' स्टेटस लिख लिख खुद को विशुद्ध भारतीय नागरिक घोषित करने में लगे हुए हैं.अब तुम देखना इस स्टेटस पर दो चार तलवार भांजते अवतरित होंगे जिनकी सारी बौद्धिकता सारे औज़ार इसकी सेवा में समर्पित कर खुद को चुका हुआ साबित करेगी.

{फोटो का ही शब्द रूप }


यह मेरा पच्चीस मार्च करीब सवा दस बजे का फेसबुक स्टेटस है. भारत की क्रिकेट टीम ऑस्ट्रेलिया को पिछली रात हरा चुकी थी और उसका बिस्तर बंध चुका था. उधर पाकिस्तान वाले एक दिन पहले ही वेस्ट इंडीज़ का सूपड़ा साफ़ कर चुके थे. मतलब अब ये दोनों टीमें सेमी फ़ाइनल में भिड़ने वाली थीं. और इस पृष्ठभूमि में इसे व्यक्त किया गया. इसके बाद आये कमेंट्स को उस लोकप्रिय संस्कृति  के एक पाठ्य के रूप में पढ़ सकते हैं. माने मेरी परिभाषा इस कल्चरल टेक्स्ट  भी बनती है. बस पाओलो फ्रेरे  की ये पंक्तियाँ पता नहीं इस आखिरी वक़्त में दिमाग की बत्ती जला कर चली गयीं हैं इसलिए उन्हें भीं साझा कर रहा हूँ जिनसे उनका 'उम्मीदों का शिक्षाशास्त्र  ' शुरू भी होता है. 'चारों तरफ से हमें एक व्यवहारवादी विमर्श ने घेर रखा है, वास्तविकता को बदलना नहीं उसके अनुरूप ढलना ही जिसका मूलमंत्र है.'..

क्योंकि मेरे यहाँ तटस्थता जैसा शब्द नहीं हो सकता इसलिए पहले ही अपनी स्थिति साफ़ किये दे रहा हूँ..आगे आपकी मर्ज़ी..

विपुल: यू फूल...हाहाहा...मैन दिस सक्स.

गौरव: एक आम आदमी को क्या चाहिये रोटी और धोनी की जीत, रोटी न हो तो चलेगा क्यों कि क्रिकेट से वो अपना पेट भरेगा.

शचीन्द्र: देखा दो तलवारबाज़ आया ही गए...

विपुल: भाई तलवारबाज ही चाहिए तुम जैसे पेसिमिस्ट और स्केपटिस्म की ढाल लेकर जीने वालो के लिए..

अलोक:‎ साला ये देश हद है भाई..क्रिकेट के पीछे ये देश निकम्मा है और कोई बोल दे तो सब चिढ़ जाते हैं..फिर कहने वाले की बुराई ही करने लगते हैं..

शचीन्द्र: विपुल ये सिर्फ तुम्हारा दृष्टि दोष नहीं है यह काल ही ऐसा है कोई आलोचना इसे पचती नहीं बस सब इस व्यवहारवादी विमर्श के साथ कदमताल करते चलते हैं..कुछ सोचना नहीं बस वही बना बनाया ढर्रा..और गौरव तुम्हारे इस कथन को व्यंग्य की श्रेणी में रखा जाये या बौद्धिक दिवालियेपन जैसी किसी श्रेणी में, तुम ही बताओ..

गौरव: आज के दौर की सचाई है की डेल्ही जैसी फॉर कंट्री में आया प्रवासी भारतीय, अपनी सैलरी का अंश दान घर कम और मनोरंजन को खरीदने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाता है .व्यंग्य तो आपका का हथियार है जो इंडियन क्रिकेट टीम पर चल रहा है.

विपुल: सैची द फैक्ट इज़ यू नीड टू रिलैक्स यॉर सेल्फ एन लुक इनसाइड यू ... ऑल पेसीमिस्म एन अन नेसेसरी अर्ग टू ब्रिंग आउट यॉर टैलेंट ऑफ़ राइटिंग..डू इट नैचरली नॉट फोर्सबली बॉय.

शचीन्द्र: सबसे पहले विपुल तुम्हे बता दूँ कि मैंने कभी भी ख़ुद को आदर्श बनने लायक नहीं पाया है न ही ऐसा कोई इरादा ही है. आदर्श वादर्श सब खोखली बातें हैं कम से कम इस समय..और जहाँ तक इस देश की बात है उस सन्दर्भ में शायद मेरी अपेक्षाएं कुछ ज़यादा ही हैं इसलिए शायद जब भी मुझे लगता है कुछ गड़बड़ चल रहा है उस पर कुछ अपने स्टेटस पर लिख मरता हूँ..कोफ़्त होती है इस देश के संसाधनों की बर्बादी पर..तुम जो भी समझो एक बार फिर कहूँगा यह व्यस्था चाहती है कि सवाल न उठायें जाएँ..'मै चुप रहूंगी' टाइप मौन से भी मुझे परेशानी है..

मनीष: हम अपना काम भी करेंगे व शाम को आकर क्रिकेट मैच भी देखेंगे। जीतने पर खुशी मनाएँगे और हारने पर शायद बिना खाकर अफ़सोस मनाते हुए अगले दिन फिर काम पर चले जाएँगे। आप जिस हिस्टीरिया की बात कर रहे हैं उसका विरोध तो समझ आता है। पर यह सामान्यीकरण कि एक आम क्रिकेट प्रेमी निकम्मा है और इस देश को निकम्मा बना रहा है आपके वैचारिक खोखलेपन की ओर ही इंगित करता है।

विपुल: वेल सैड मनीष...आई थिंक यंगिस्तान इज़ टेकिंग सच एंटरटेंमेंट ऐज़ रिक्रेएशन नॉट स्पोइलिंग स्पॉइलिंग हैबिट..यू नीड अ डीपर इनसाईट सैची ब्रो..नोबडी इज कउईट, बट राइट प्लेस इज इम्पोर्टेंट फॉर राइट वर्ड्स..

शचीन्द्र: यहाँ जिस निकम्मेपन की बात है उसमे मानसिक भी शामिल है और आप जिस सामान्यीकरण की कह रहें हैं तो उसमें आप जैसे दिमागदार अपवाद स्वरुप ही घुसपैठ कर सकें हैं. अपने से हट कर बाकि परिदृश्य पर भी नज़र दौड़ाईए फिर शायद नज़र आये क्रिकेट ही इतना सर्वसुलभता से अखबार से लेकर टीवी पर पाया जाने वाला खेल कैसे बन गया. अगर बात सिर्फ खेल ही की होती तो कल के अर्जेंटीना- कोस्टारिका, पराग्वे-अमेरिका के फुटबाल मैच की कोई खोज खबर कहीं क्यों नहीं है, आप जिस क्रिकेट प्रेमी की पैरवी कर रहें हैं उसके सन्दर्भ में ध्यान देने वाली बात यह है कि उसने क्रिकेट को खुद चुना है या उसके पास कोई और विकल्प छोड़ा ही नहीं गया था.

और विपुल तुम्हारा यंगिस्तान भी तुम्हारा गढ़ा हुआ नहीं है यह उस बहुराष्ट्रीय कंपनी का है जिसके आर्थिक स्वार्थ इस खेल के साथ जुड़े हुए हैं..अब भी अगर ये मेरा वैचारिक खोखलेपन ही इंगित करता है तो भी मुझे यह स्वीकार है..

माया: मित्र इंडिया इज़ द कंट्री औफ़ 545+250+11(क्रिकेट प्लेयर )..दोज़ नैशनैलटी लाइस इन क्रिकेट ?  

विपुल: ओह मैन..रिलैक्स, इट्स जस्ट क्रिकेट...एक तरफ सैची बोलता है सीरियसली मत लो इसे एन ऊपर से इतना सीरियस कमेन्ट लिख दिया एफबी पे... भैया क्रिकेट पे जितना सोच रहे हो कुछ और सोच लो शायद कुछ काम आ जाये..
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इन कॉमेंट्स का काल खंड है शुक्रवार पच्चीस मार्च दो हज़ार ग्यारह, सवा दस बजे से लेकर बुधवार तीस मार्च बारह बजे तक. कुछ को यह सब यहाँ पोस्ट करना अतिरंजना जैसा संस्कृतनिष्ठ कुछ भी लग सकता है पर हमारे समय का एक सत्य यह भी है जो इन सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर चलता रहता है इसे नज़रंदाज़ कर आज कोई नहीं चल सकता. हाँ मैं ये मान सकता हूँ यहाँ इजिप्ट ईरान जैसा कुछ नहीं होने वाला है पर फिर भी इससे इस पोस्ट का अवमूल्यन तो नहीं हो सकता न..!! जिसे ऐसा नहीं लगता वह ये मान सकता है की ये सब उसके लिए था है ही नहीं..कुछ सवालों के ज़वाब मैंने भी नहीं दिए हैं शायद तुम्हे आसपास मिल ही जायेंगे बस आँख कान खोल फिर से जीना शुरू करो..और ऐसा भी नहीं है की आज का फ़ाइनल नहीं देखने जा रहा हूँ. टॉस हो चुका है और श्रीलंका पहले बैटिंग करने जा रहा है..

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