अप्रैल 03, 2011

नोट वाले गाँधी बराबर आचार संहिता बराबर मेरे हिस्से वाला यूटोपिया

{यह एक असाइंमेंट के जवाब में लिखी गयी टिप्पणी है जिसमें शायद किसी अचार संहिता जैसी चीज़ पर सवाल था और अब इसे आपके लिए पोस्ट कर रहा हूँ }

आज इस मार्च की इन आखिरी सुबहों को दुपहरी बनते हुए देखते हुए आचार संहिता जैसे स्थापित आदर्शों की तरफ जाने का जी तो नहीं चाहता पर सवाल में पूछी गयी इस पहेली की स्थिति आज नोट पर छपे गाँधी  की तरह हो चुकी है. इसलिए बात करने का और मन नही हो रहा. माने उन मूल्यों की जगह दूसरे तीसरे मूल्य स्थान ले चुके हैं. सारे वातावरण में एक आजीब तरह का संत्रास सा घूम रहा है. बात अगर इतनी घुमाफिरा कर न भी करी जाये तो इस चितकबरे से हो चुके मीडिया तंत्र में बस खेल फर्रुखाबादी चल रहा है. कुछ भी छापो कुछ भी दिखाओ. ये सारे कान में तेल डालकर सिर्फ सुनेंगे, करेंगे कुछ नहीं. कान पर जूं नामक जीव का रेंगना अब बीते दिनों की बात हो चुकी.

तो अब सवाल के जवाब से घमासान करते हुए छपे हुए माध्यम  से दुबारा शुरू करते हैं. पर पहले इसका एक गुण. इसे सिर्फ साक्षर ही पढ़ते खरीदते हैं. समझते कितना हैं ये अन्यत्र जिज्ञासा का विषय है. अखबार माना जाता था - शायाद अभी भी कुछ मानते हों कि वह निष्पक्ष-तटस्थ रहता था - है. इसलिए उसने आज सुविधा, माने, सत्ता के पक्ष को चुन लिया है. उसकी यह गलबहियां कभी भी पकड़ी जा सकती हैं.

पहली बानगी तारीख 26 मार्च, शनिवार, नई दुनिया , पेज आठ, पेज का नाम 'विचार '. यह इस अखबार का सम्पादकीय पृष्ठ  है. सम्पादकीय इस अखबार में पता नहीं कौन लिखता / लिखते हैं. पर इस दिन दूसरी सम्पादकीय टीप पूरे विशवास से कही जा सकती है किसी कांग्रेसी कार्यकर्त्ता द्वारा लिखी या सम्पादकीय डेस्क को श्रुतलेखित करवाई गयी है. इस संदेह की पुष्टि का कारण यह कि पूरी टिपण्णी लगता है प्रतिक्रिया स्वरुप भाजपा के अरुण जेटली को अर्पित समर्पित है. उन्हें खिसयानी बिल्ली कहते हुए सन दो हज़ार चार  के बलिदान को रेखांकित कर फिर दो हज़ार नौ  की मिसाल दे यह सत्यापित किया कि गाँधी नेहरु परिवार में कोई भी प्रधान मंत्री पद के लिए लालायित नही है. साथ ही  नुक्ता ये कि वे चाहें तो कौन सी ताकत उन्हें ऐसा करने से रोक सकती है. और ये भी कि यह अवरोधक शक्ति कम से कम भाजपा नामक पार्टी में तो है ही नही. आगे ये लिखा है, यह बात अलग है की रोज़ कोई न कोई घोटाला प्रकाश में आ रहा है पर इसके लिए उस उक्त महान गाँधी नेहरु परिवार की तरफ इंगित करना ठीक न होगा. सरकार पर बट्टा लग सकता है लेकिन उस परिवार की साख पर नही.

जैसे जेटली की टिपण्णी के केंद्र में प्रधानमंत्री बरास्ते नेहरु गाँधी परिवार को लपेट लिया गया था, वैसे ही यहाँ जेटली कि टिप्पणी चुटकी को बेदम साबित कर उनके पट्ट गुरु आडवाणी से हिसाब चुकता करना रहा. पर दुर्भाग्य जैसे दैवीय शब्द का सहारा लेते हुए इन पंक्तियों के लेखक- इंपले - को कहना पड़ रहा है यह किसी कांग्रेसी मुखपत्र की नही सात सात जगह से प्रकाशित होने वाले अखबार के राष्ट्रिय राजधानी संस्करण के हवाले से कही जा रही है. यह पहली बार नही है जब इस अखबार ने ऐसा कारनामा कर दिखाया हो. आगे आप खुद समझदार हैं. बस रिकार्ड के लिए जेटली वाली टीप को आपके भेजे की मदद के लिए लिखा जा रहा है - जेटली का कहना है कि बेशक विकिलीक्स के खुलासे और वोट के बदले नोट प्रकरण पर प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह के लोकसभा में जवाबी हमले में भाजपा के शिखर पुरुष लाल कृष्ण आडवाणी पर केन्द्रित थे, मगर उनका मंतव्य किसी दूसरी तरफ था.

बानगी नंबर दो. अखबार नवभारत टाइम्स , शनिवार, उन्नीस मार्च दो हज़ार ग्यारह, पेज 12, पेज का नाम 'देश '. अब यह अखबार के चयन का मामला मन जाये या ख़बरों के अवमूल्यन का. या अपने पाठकों को दिग्भ्रमित करने कि कोई पूर्व निर्धारित कार्य पद्धति. चलिए सबसे पहले खबर को ही देखते हैं. जो कुछ यूँ है, ' शाहरुख़ ने दिखाए ऐब्स , बांटा ज्ञान '. इसके साथ नत्थी है शाहरुख़ की शर्ट. जिसमे बटन अपनी पूर्वनिर्धारित जगह पर नही हैं; न ही शर्ट. माने उनकी बलिष्ठ कसरती देह दिख सी रही है. इसे झांकना नही दिखाना कहते हैं; जिससे पाठक को उनके ऐब्स गिनने में आसानी हो.

यह इस अखबार के पाठक को को भली भांति पता है कि इन्हीं का फ़िल्मी ख़बरों, मनोरंजन के लिए सोमवार को छोड़ हर दिन हैलो दिल्ली  नाम से सप्लीमेंट आता है. यह ज्ञान जिसमें शाहरुख़ का लाजवाब सेन्स ऑफ़ ह्यूमर तो था ही साथ में सीरियस बातें भी थीं. जैसे मुंबई शब्द के राजनीतिकरण और धर्म और राजनीति के खतरनाक मेल पर उनके आप्त वचन. पर बेचारा पाठक आदि से अंत तक इस गंभीरता को सिर्फ एक लाइन में निपटा लिपटा पाता है. अब यह उस फ़िल्मी संस्करण का हिस्सा क्यों नही है इसका जवाब उसे डेटलाइन की जगह पीटीआई-आईएएनएस  लिखा हुआ दे रहे थे. फिर भी इस सेमिनार की तिथि नदारद थी. शायद कालातीत होना अन्यत्र देश नामक पृष्ठ पर आने की और एक योग्यता हो. या एक करक इस सेमिनार का प्रधानमंती मनमोहन सिंह द्वारा उदघाटन था. पर इंपले  को फिर भी खोजखबर नही लगी की ये सेमिनार था किस विषय पर !! हाँ, अगरदिमाग के घोड़े  थके न हों तो एक अंदाज़ा भर इसी के सामानांतर छपे प्रधानमन्त्री वाले बयान से लगाया जा सकता है. जहाँ वे रियल एस्टेट सेक्टर में ब्लैक मनी का प्रवाह रोकने के लिए स्टैम्प डियूटी घटाए जाने की जरुरत पर अपने उदगार दे रहे थे. पर ये सहज बुद्धि इतनी सहजता से सर्वसुलभ नहीं, इसी का रोना है.

नंबर तीन.राष्ट्रीय सहारा, शनिवार छब्बीस मार्च पेज 18, मुट्ठी में दुनिया. कुछ समय पहले पत्रिकाओं और अखबारों ने ख़बरों और विज्ञापन, और खासकर उन विज्ञापनों के लिए, जो ख़बरों की तरह आते थे उनके लिए एक शब्द-पद एडवरटोरियल  का प्रयोग करना शुरू किया था. ताकि उनका पाठक दोनों में स्पष्ट अंतर देख व रेखांकित कर सके. जब अख़बारों पर पेड़ न्यूज़ के गंभीर आरोपों की जांच चल रही हो. तब भी इनका ऐसा रवैया समझ से परे है. जिसमे वे विज्ञापन को खबर की तरह पेश करता है और उसके वर्गीकरण की जिम्मेदारी पाठकों के जिम्मे है.

सुर्खी है 'कैमरा जो चमकाए चेहरा ' दुनिया मुट्ठी में इसी पेज पर आती है इसलिए खबर लन्दन से आ रही है. तारीख नहीं है न किसी एजेंसी का ज़िक्र ही है. अब फोटो खिंचवाने के लिए मेकप की ज़रूरत नहीं क्योंकि जापानी वैज्ञानिकों ने ऐसा उच्च प्रौद्दोगिकी का कैमरा विकिसित करने का दावा किया है जिसकी मदद से आपके चेहरे को चमकाया जा सकता है. दांतों को मोतियों सा झक सफ़ेद बनाया जा सकता है. यह तो हुई उस वैज्ञानिक शोध की बात पर. अगली ही पंक्ति में इस इस दावे को पुष्ट करता इतनी तीव्र गति से विकास होता है कि इस प्रौद्दोगिकी का इस्तेमाल एक कैमरे में हो चुका है. और यह बात किसी 'डेलीमेल' के हवाले से कही जाती है. पर इस बात का स्पष्टीकरण नहीं मिलता कि वे उस वैज्ञानिक शोध टीम के सदस्य हैं या पैनासोनिक कंपनी के जनसंपर्क अधिकारी जो इस कैमरे का मौडल नंबर से लेकर इस 'सौन्दर्य सुधार मोड़' के बारे में जानकारी दे रहे हैं.

इस खबर को यहाँ चस्पा करने वालों को शायद यह भी नहीं मालूम की अपने मूल चरित्र में यह खबर कम विज्ञापन नस्लभेदी-रंगभेदी रूप  धारण कर लेता है. अभी हाल ही में ऐश्वर्या प्रकरण  को इतनी जल्दी भुला देना इनकी स्वाभाविक मानसिक प्रक्रिया है या वे इसे याद ही नहीं करना चाहते. शिल्पा शेट्टी-जेड गूडी विवाद  भी इतना पुराना नहीं हुआ. क्या नेल्सन मंडेला  का बरसों जेल में बंद जीवन भी बिसरा दिया. अमरीका जैसे देश में अश्वेतों को मताधिकार  के कितने संघर्ष करने पड़े. चलो यह सब भेजे से भी उड़ गया हो फिर भी गाँधी  तो अपने ही थे.

चलो यह सब बोझिल सा वैचारिक प्रमाद भी मान लिया जाये पर क्या इन्हें यह भी नहीं दिखता कि रंगों  के प्रति हम कितने विकृत हैं. गोरे रंग की चमड़ी को सौन्दर्य का पर्याय माना जाना सिरे से उन सारी सांवली- काली लड़कियों को सीधे अपने प्रति हीनभावना से भर देना नहीं है..यह उनका हमारे द्वारा सीधे सीधे क्रीम  पाउडर बनाने वाली कंपनियों के यहाँ रेहन पर रख देने जैसा ही तो है. लड़का होने वाली दुल्हन में वही प्रचारित प्रसारित सौन्दर्यशास्त्र  के तहत सुन्दरता के मानक खुद के लिए गढ़ता और दूसरे पक्ष को उसी कसौटी पर कसता है. यह सिर्फ आचार संहिता ही नहीं मानव को मानव रूप में स्वीकार न करने का मामला है. उसके अस्तित्व को उत्पादों के हाथों बेच देने का गंभीर चिंतनीय प्रस्थान बिंदु  है जो इससे भी कहीं आगे जाता है जहाँ हमारा समाज पता नहीं कैसा होगा..??

आखिरी उदहारण के लिए अब प्रिंट से दृश्य-श्रव्य माध्यम  की तरफ चलते हैं जिसके लिए शिक्षित साक्षर होने ही कोई ज़रूरत नहीं इसलिए यह सब माध्यमों में सबसे खतरनाक और संवेदेनशील की श्रेणी में आता है. इसका प्रभाव भी सामान रूप से नहीं पड़ता पर उसकी चर्चा आज नहीं. बात वापस आचार संहिता की. जिसकी कोई उपादेयता औचित्य इधर दिख नहीं पड़ रही. हमेशा से ऐसा ही होता आया है.

अगर बात हमारे पड़ोसी मुल्कपकिस्तान  की हो रही हो तब तो कोई सीमा कोई अवरोधक बीच में आना ही नहीं चाहिए. और ये हो भी रहा है. भारत और पाकिस्तान के बीच इस क्रिकेट विश्व कप  का सेमीफ़ाइनल होना तो तीस मार्च को है पर हमारे खबरिया टी.वी.चैनल अभी से शुरू हैं. कोई इसे महासंग्राम कह रहा है तो किसी के लिए ये महायुद्ध - दुनिया की सबसे बड़ी लडाई से कम महत्त्व इस मैच का नहीं है. ज़यादा ही होगा. किन्ही अपवादों के लिए यह अपनी सरहद पार पुरानी यादों- दोस्तों को दुबारा पाने जैसा अनुभव भी दे जाता है. पर कुल मिलाके ऐसा उन्माद बनाने की कोशिश हरबार बार-बार होती रही है. इस पाकिस्तान ग्रंथि का खूब दोहन हुआ है. इस बार भी यही परम आदर्श है.

एक-एक कर उसके साथ लड़े गए सारे सैनिक युद्धों की क्लिपिंग्स हमारे रेटीना को दिखाए जाते हैं. राष्ट्रीयता देशभक्ति -स्वाभिमान -राष्ट्रगौरव  जैसे किन्ही भावों को फिर उद्वेलित कर पाकिस्तान की तरफ मोड़ दिया जाता है. ऐसा कुछ रचा जाता है मानो उसके प्रति हमारे ऐसे व्यवहार के बिना हमारा अस्तित्व, अस्तित्व ही न हो. बिना यह सोचे समझे कि पाकिस्तान भी एक राष्ट्र के रूप में स्वयं को स्थापित करने की हमसे गंभीर जंग लड़ रहा है. अपने सारे आदर्श चुकने के बाद भी वहां की जनता अपने अस्तित्व को हमारे तरह ही जूझ कर पा लेना चाहते है. शाहरुख़ वहां के बाढ़ पीड़ितों के लिए शो में जाना चाहते हैं पर हम उसे मजहबी चश्मे से देखते लग जाते हैं. खुद यहाँ कई पार्टियों का अस्तित्व ऐसी ही किन्ही अवधारणाओं पर टिका है. हमें यह स्वीकारना होगा, हम अपना पड़ोसी न चुन सकते हैं न ही उसे बदल सकते हैं. उसके साथ सहअस्तित्व की भावना  दोनों तरफ वाले जितनी ज़ल्दी समझ जाएँ उतना ही अच्छा होगा. वहां भी हांड मांस के लोग  बसते हैं. हमारी ही तरह.

और मेरी समझ से इसकी जिम्मेदारी का कुछ प्रतिशत इन मीडिया वालों के हिस्से में भी पड़ता है. जिसमें आज तो यह बिलकुल फ़ेल हैं..शायद कल तस्वीर कुछ और हो..या आचार संहिता की तरह यह मेरे हिस्से में पड़ने वाला यूटोपिया  है..पता नहीं..

शचीन्द्र आर्य
28 मार्च 2011, 11:17

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आवाज़ें..

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...