अप्रैल 16, 2011

आज सनीचर है

शनिवार
सुबह सुबह मैं रास्ते में रुककर फुटपाथ पर झुककर
ख़रीद रहा था हिन्दी के उस प्रतापी अख़बार को
किसी धातु के काले पत्तर की
तेल से चुपड़ी एक आकृति दिखाकर
एक बदतमीज़ बालक मेरे कान के पास चिल्लाया-
सनी महाराज !
दिमाग सुन्न ऐनक फिसली जेब में रखे सिक्के खनके
मैनें देना चाहा उसको एक मोटी गाली
इतनी मोटी कि सबको दिखायी दे गई
लड़का भी जानता था कि
पहली ज़्यादती उसी की थी
और यह कि ख़तरा अब टल गया
कहां के हो? मैंने दिखावटी रुखाई से पूछा
और वह कमबख़्त मेरा हमवतन निकला
ये शनि महाराज कौन हैं ?
उसने कहा- का पतौ...
इसके बाद मैंने छोड़ दी व्यापक राष्ट्रीय हित की चिंता
और हिन्दी भाषा का मोह
भेंट किए तीनों सिक्के उस बदमाश लड़के को.

: असद ज़ैदी

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