अप्रैल 20, 2011

इस एवज़ी से समय में कुछ ज़रूरी सी बातें

दुर्भाग्य से इस देश में एक ख़ास तरह का काईयांपन प्रबुद्धता के नाम पर प्रतिष्ठित हो गया है और मैत्रेयी उससे अछूती नहीं रह सकी है. यह काइयांपन शायद ह्रासोन्मुख हिन्दू मानस की देन है. इसके चलते गरीबी और उपभोग की संस्कृति का वह दारुण समन्वय किया गया है जिसका नाम आधुनिक भ्रष्ट भारत है. इस भारत के लिए प्रतीकात्मकता ही सब कुछ है. तकली थाम लेने से गांधीवाद हो जाता है. बंदूक पकड़ लेने से माओवाद. सेमीनार कर लेने से संस्कृति. चुनाव करा देने से लोकतंत्र. सड़क बना देने से प्रगति. संस्था खोल देने से संस्था के उदेश्यों की पूर्ति.

यह देवीदत्त उर्फ़ डी. डी. और मैत्रेयी उर्फ़ बेबी की उस बातचीत का छोटा सा टुकड़ा है जो आज भी म.श.जो. के कसप के पेज नंबर तीन सौ चौबीस पर पाया जाता है. हाँ ये ज़रूर है कि इसे मैंने ही दुकड़े में काट कर यहाँ रखा है. और आज-कल जब-जब इन पंक्तियों को पढ़ रहा हूँ तो कहीं लगता है क्या जिस सुप्रीम कोर्ट के जज ने बिनायक सेन के पक्ष या यूँ कहें लोकतंत्र के - जिसकी बात देवीदत्त यहाँ ऊपर कर रहा है - पक्ष में ये ऐतिहासिक फैसला सुनाया है उसने भी पिछली रात कसप  तो ख़तम नहीं किया..सवाल जब कहीं मुलाकात होगी तब दागा जायेगा पर अभी आपको उस फैसले में इसकी ध्वनि नहीं सुनाई दे रही..किसी के पास गाँधीवादी साहित्य मिलने से वह गाँधीवादी नहीं हो जाता है, ठीक उसी तरह किसी के पास प्रतिबंधित सामग्री मिलने को ही देशद्रोह का एक मात्र कारण नहीं माना जा सकता.

हम सब एक एवजी समय में रह रहे हैं जहाँ बात प्रतीकों से नीचे होती ही नहीं. कोई अन्ना हजारे आते हैं अनशन करते हैं और सब दूसरे तीसरे गाँधी को खोज लेने पर फूले नहीं सुहाते. किसी ने झंडा उठाया और हो गए देशभक्ति के होल-सोल विक्रेता. हमें झंडा कहाँ फेहराना है, लाल चौक पर. नवीन जिंदल राजनेता तो हईये  हैं, बड़े झंडा भक्त भी हैं. पर थोड़ी प्राब्लम है, वे एक तरफ प्राउड टू वेव फ्लैग भी कहेंगे और खाप पंचायतों को पुरस्कृत भी करेंगे..सरकार खादी से सब्सिडी भी हटाती है और उसके चैनल खादी का महिमामंडन कर उसे अपनी संस्कृति भी कहती है. बड़े-बड़े रिपोर्टर सारी जिंदगी 'रिपोर्ट' बनायेंगे क़स्बे शहरों गलियों की खाक भी छानेंगे पर अपने चैनल की कारगुजारियों को छिपाते फिरेंगे. सिर्फ दीक्षांत समारोह में चोगा न पहनने से हो गए ठेठ, बन गए भारतीय..सारी पढाई तो उसी औपनिवेशिक मानसिकता से आज तक ग्रसित है; उसी हैयरार्की को बनाये रखने के औज़ार के रूप में. सिर्फ शिक्षा का अधिकार लाने से हो गए सब शिक्षित.

बेचारा संयुक्त राष्ट्रसंघ इतने सालों से हमारे सामने है और हम समझ ही नहीं सके. एनजीओ सार्थक दिखती पहलों के नाम पर सेफ्टी वाल्व का काम करते आ रहे हैं और भ्रष्टाचार के अड्डे बन चुके हैं, पर हम देखने के काबिल ही नहीं. अमरीका से बेहतर और कौन है जो इन प्रतीकों का दुरूपयोग हमें समझा सकता है. ये ऐसा देश है जो हमेशा 9/11 से लेकर दुनिया में शांति स्थापित करलोकतान्त्रिक मूल्यों को स्थापित करने का ठेका  लिए लिए फिरता है. अभिव्यक्ति, मानवाधिकार, शांति को स्थापित करने के लिए किसी भी तानाशाह से टक्कर लेने को निःशुल्क उपस्थित. पर किसको नहीं पता उसके स्वार्थ, नवसाम्राज्यवाद से लेकर बरस्ते आर्थिक शोषण सांस्कृतिक-प्राकृतिक संसाधनों की लूट, अधिपत्य और वर्चस्व तक की रेंज तक जाते हैं. ऐसे ही किसी ज्ञात-अज्ञात भय को दिखा कर उसकी हथियार बनाने वाली कंपनियों की दूकान भी तो चलानी है.

इस समय में हम पूरी तरह से निष्क्रिय से बना दिए गए हैं, जहाँ दो जून की रोटी नहीं हो तो गुरद्वारे का विकल्प सुझाते हैं. हम सब इस काबिल छोड़े ही नहीं गए..बस हर बार कोई कुक्कट आता है और कूड़े के ढेर पे बांग मारता है और हम जाग से जाते हैं. हमें यही ध्यान रखना है कि इस ऐवजी वक़्त में कोई हमारी एवज़ में सोचने वाला नहीं आने वाला..इस काईयांपन इस प्रबुद्धता से खुद को बचाना ही अपने अस्तित्व की लडाई है. इन प्रतीकों से आगे जाकर ही अभिव्यक्ति को ढूँढना है..वो सृजनात्मक भी हो सकती है और विध्वंसक भी. पर उसके बाद कुछ नया बनेगा..शायद इलियट  कहता है, "कल्पना कुछ रचने से पहले कच्चे माल के साथ बहुत तोड़फोड़ करती है, उसे गलाती पिघलाती है, उसका मूलरूप मिट जाता है और तब जाकर कुछ सामने आता है"..अगर उन्होंने नहीं कहा है तो मैं कह रहा हूँ..


{ यह  पोस्ट 'जनसत्ता 'में , 'इस एवज़ी समय में ' शीर्षक के साथ प्रकाशित हुई | तारीख छब्बीस अप्रैल | मूल रूप की छाया पढने के लिए यहाँ चटकाएं }

1 टिप्पणी:

  1. बधाई

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