अप्रैल 24, 2011

आने वालों से कहो हम तो गुज़र जायेंगे : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

यहाँ की शुरुवात भी वहीँ उन्हीं आभारों -साभारों से होती हुई मानें और अगर आप पीछे जाना चाहते हैं तो इन लिंकों को चटकाया जा सकता है..पहली पोस्ट :' होता है शबो-रोज़ तमाशा मेरे आगे ', दूसरी : 'मुझसे पहली-सी मुहब्बत मेरी महबूब न माँग ' इसके नीचे ही है ..चलिए इस श्रंखला की अंतिम किस्त की तरफ रुख करते हैं जो पकिस्तान टाइम्स ने  १४ जनवरी १९९० के संस्करण में प्रकाशित की थी..

 

१९५० में मेरी मुलाक़ात अपने एक पुराने मित्र से हुई। यह जनरल अकबर खान थे जो उस वक्त फ़ौज में चीफ  आफ जनरल स्टाफ नियुक्त हुए थे। जनरल अकबर ने बर्मा और कश्मीर के मोर्चे पर होने वाले युद्घों में बड़ा नाम कमाया था। मैं इस साल मरी में छुटि्‌टयां बिताने गया हुआ था। वहीं उनसे भेंट हुई। बातों के दौरान उन्होंने कहा कि हम लोग फ़ौज में हैं। उन्होंने यह भी बताया कि जिन्होंने कश्मीर में हुई मोर्चेबंदी का सामना किया है वे देश की वर्तमान परिस्थिति से असंतुष्ट हैं और यह मानते हैं कि देश का नेतृत्व कायरों के हाथों में है। हम अभी तक अपना कोई संविधान नहीं बना पाये। चारों ओर अव्यवस्था और वंशवाद का चलन है। चुनाव की कोई संभावना नहीं, हम लोग कुछ करना चाहते हैं। मैंने पूछा कया करना चाहते हो? उनका जवाब था हम सरकार का तखता पलटना चाहते हैं और एक विपक्षी सरकार बनाना चाहते हैं। मैंने कहा यह तो ठीक है लेकिन उन्होंने मेरी राय भी मांगी। मैंने कहा यह तो सब फ़ौजी क़दम है। इसमें मैं कया राय दे सकता हूं। इस पर जनरल अकबर खान ने मुझे अपनी गोष्ठियों में आने और उनकी योजनाओं के बारे में जानकारी लेने की बात कही। मैं अपने दो गैरफ़ौज दोस्तों के साथ उनकी गोष्ठी में गया और उनकी योजनाओं से अवगत हुआ। उनकी योजना यह थी कि राष्ट्रपति भवन, रेडियो स्टेशन बगैरा पर कब्ज़ा कर लिया जाये और फिर राष्ट्रपति से यह घोषणा करवा दी जाये कि सरकार का तखता पलट दिया गया है और एक विपक्षी सरकार सत्ता में आ गयी है। छः महीने के भीतर चुनाव कराये जायेंगे और देश का संविधान निर्मित किया जायेगा। इसके अतिरिक्त अनगिनत सुधार किये जायेंगे। इस पर पांच छः घंटे तक बहस होती रही और अंततः यह तय हुआ कि अभी कुछ न किया जाये क्योंकि अभी देश किसी भी ऐसी स्थिति से नहीं जूझ रहा है कि जिसके आधार पर जनता को आंदोलित किया जाये। दूसरे, इस तरह की योजनाओं के क्रियान्वयन में खतरों का सामना करना पड़ता है।

 

उस समय पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान थे। किसी तरह इस योजना की खबर सरकार के कानों तक पहुंच गयी। मैं तो इस अवधि में उन सभी घटनाओं को भूल चुका था कि अचानक सुबह चार बजे मेरे घर को फ़ौजियों ने घेर लिया और मुझसे कहा गया कि मैं उनके साथ चलूं। मैंने कारण पूछा तो मुझे जवाब मिला कि मुझे गवर्नर जनरल के आदेश से गिरफ्तार किया जा रहा है। चार महीने तक मुझे कैद रखा गया और फिर मुझे मालूम हुआ कि मुझे क्यों क़ैद किया गया। संविधान सभा ने एक विशेष अधिनियम को पारित किया और उसे रावलपिंडी षड्‌यंत्र अधिनियम का नाम दिया गया। उस अधिनियम के तहत हम पर गुप्त मुकद्दमा चलाया गया। अंग्रेजों के ज़माने से ही षड्‌यंत्र संबंधी क़ानून बड़े खराब थे। आप कुछ कर नहीं सकते थे। अगर यह सिद्घ हो जाये कि दो व्यक्तियों ने मिलकर क़ानून तोडने की योजना बनायी है तो उसे षड्‌यंत्र का नाम दे दिया जाता था और अगर कोई तीसरा व्यक्ति इसकी गवाही दे दे तो फिर अपराध सिद्घ मान लिया जाता था। सरकार ने अधिनियम बनाकर बचाव करने की सभी संभावनाओं को समाप्त कर दिया था। बनाये जाने वाले अधिनियम के तहत तो केवल सज़ा ही मिल सकती थी, भागने का कोई रास्ता भी नहीं था। यह मुकद्दमा डेढ  साल तक चलता रहा और हममें से हर एक के लिए उसके पद के अनुसार भिन्नभिन्न दंड निश्चित किये गये। जनरल को दस साल, ब्रिगेडियर को सात साल, कर्नल को छः साल और हम सब असैनिकों को उससे कम यानी चार साल की क़ैद की सज़ा सुनायी गयी।

 

मेरी हिरासत का यही वह समय था जो रचनात्मक रूप से मेरे लिए बहुत उर्वर सिद्घ हुआ। मेरे पास लिखने पढ़ने के लिए वक्त ही वक्त था, फिर मुझमें शासकों के विरुद्घ बहुत आक्रोश और क्रोध था, क्योंकि मैं निर्दोष था।

 

इसी अवधि में मेरी शायरी के दो संग्रह, काल कोठरी के उस दौर में तैयार हो गये। एक तो हिरासत के दिनों में ही प्रकाशित हो गया था और दूसरा मेरी रिहाई के बाद प्रकाशित हुआ। जब आप को चार साल के क़रीब जेल में रखा गया हो और बंदी होने का दुख भी आपके हिस्से में आया हो, तो निश्चित रूप से बाहर की दुनिया में आपका मूल्य बढ  जाता है। जब मैं जेल से बाहर आया तो मुझे अनुभव हुआ कि मैं पहले की तुलना में अधिक प्रसिद्घ और लोकप्रिय हो गया हूं। मैं दोबारा पाकिस्तान टाइम्स से जुड  गया और मैंने अमन कमेटी तथा ट्रेड यूनियन से अपने संबंध फिर से स्थापित कर लिये। यह तीन चार साल का समय ऐसी ही गहमागहमी में गुज़र गया। पाकिस्तान में वामपंथी आंदोलनों पर पाबंदी लगा दी गयी। यही स्थिति तीन चार साल तक जारी थी कि देश में पहला मार्शल लॉ लागू हो गया और पहली सैनिक सरकार स्थापित हो गयी, जिसका अर्थ था कि किसी भी व्यक्ति को बिना किसी अपराध के गिरफ्तार किया जा सकता है। उस समय के मार्शल लॉ ने एक अत्याचार यह भी किया कि हर उस व्यक्ति को पकड़ना शुरू कर दिया गया जिसका नाम १९२० के बाद की पुलिस रिपोर्टों में दर्ज़ मिला था।

 

इस तरह जेल में हमें नब्बे साल और अस्सी साल के बूढे मिले, कुछ की तपेदिक तथा अन्य बीमारियों के कारण जेल में ही मृत्यु हो गयी। मैंने लाहौर किला में डेढ  महीने गुजारा और फिर चार पांच महीने के बाद मुझे रिहा कर दिया गया। मैंने फिर पाकिस्तान टाइम्स के दफ्तर की ओर रुख  किया और तब मैंने देखा कि उसका दफ्तर पुलिस के घेरे में था। मेरे पूछने पर पता चला कि पाकिस्तान टाइम्स पर फ़ौजी सरकार ने कब्ज़ा कर लिया है और इस तरह मेरी पत्रकारिता का अंत हो गया। मैं ऊहापोह में था कि कया करूं। उन दिनों एक अमीर वर्ग जो मेरी शायरी को पसंद करता था, मेरी चिंता से अवगत था। उन लोगों ने पूछा आप कया करना चाहते हैं? मैंने कहा मुझे नहीं मालूम तो किसी ने सुझाव दिया, क्यों न संस्ह्मति से संबंधित कोई गतिविधि आरंभ की जाये। मैंने कहा यह अच्छा विचार है और इस प्रकार हमने लाहौर में ‘आर्ट कौंसिल* की स्थापना की। कौंसिल एक पुराने और टूटेफूटे घर में थी जो आज के आलीशान भवन जैसा आकर्षक नहीं था। कौंसिल का आरंभ हुआ और उसके भवन में प्रदर्शनियों, नाटकों और आयोजनों का तांता लगा रहता था। तीन चार साल तक यह गतिविधि चलती रही और मैं इसी अवधि में बीमार पड  गया। पहली बार दिल का दौरा पड़ा। और इसी बीच मुझे लेनिन विश्व शांति पुरस्कार दिये जाने की घोषणा हुई। किसी ने मुझे फोन पर खबर सुनायी तो मुझे विश्वास नहीं हुआ, मैंने जवाब में कहा बकवास मत करो, मैं पहले ही बीमार हूं। मेरे साथ ऐसा मजाक न करो। उसने उत्तार में कहा, मैंने टेलीप्रिंटर पर यह खबर खुद देखी है, तुम्हारे साथ पुरस्कार पाने वालों में पिकासो और दूसरे भी हैं।

 

जब मैं स्वस्थ हो गया तो मुझे पुरस्कार ग्रहण करने और मास्को आने के लिए आमंत्रित किया गया। मैं मास्को के बाद लंदन चला गया और लंदन में दो वर्ष तक रहा। मैं लंदन से लाहौर आने के बजाय कराची लौट आया। कराची में मैं मिस्टर महमूद हारून के निवास स्थान पर ठहरा। उनकी बहन जो डाक्टर थीं और मेरी मित्र थीं, उन्होंने मुझे लिखा कि श्रीमाती हारून बीमार हैं और आपको देखना और मिलना चाहती हैं। मेरे आने पर श्रीमती हारून ने मुझे बताया कि उनका जोफ़लाही फाउंडेशन है उसके अधीन स्कूल, अस्पताल और अनाथालय चल रहा है। उनके लड के के पास फाउंडेशन चलाने के लिए समय नहीं है क्योंकि वह व्यापार तथा राजनीतिक गतिविधियों में व्यस्त रहे हैं। अच्छा होगा कि फाउंडेशन की व्यवस्था मैं संभाल लूं। मैंने फाउंडेशन के स्थान पर उसकी गतिविधियों का निरीक्षण किया तो देखा कि वह गंदी बस्ती का इलाक़ा था, जहां मछुआरे, ऊंट वाले, नशीली दवाओं का व्यापार करने वाले और आपराधिक गतिविधियों में लिप्त व्यक्ति रहा करते थे। मुझे यह इलाक़ा अच्छा लगा, और हमने इस क्षेत्र में अपनी गतिविधि तेज कर दी। स्कूल को कॉलेज में परिवर्तित कर दिया, एक तकनीकी संस्थान भी स्थापित किया और अनाथालय की भी व्यवस्था की। इस प्रकार कोई आठ साल तक मैं शैक्षणिक और प्रशासनिक गतिविधियों से जुड़ा रहा। इस बीच ६५ और ७१ के युद्घ भी हुए। इन दोनों युद्घों के दौरान मैं अत्यधिक मानसिक तनाव से प्रभावित रहा। उसका कारण यह था कि मुझसे बारबार देशभक्ति के गीत लिखने की फरमाइश की जा रही थी। मेरे इनकार पर यह जोर दिया जाता कि देशभक्तित और मात्रभूमि की मांग यही है कि मैं युद्घ के या देशभक्तित के गीत लिखूं। लेकिन मेरा तर्क यह था कि युद्घ अनगिनत व्यक्तियों के लिए मृत्यु का कारण बनेगा और दूसरे पाकिस्तान को इस युद्घ से कुछ नहीं मिलने वाला है। इसलिए मैं युद्घ के लिए कोई गीत नहीं लिखूंगा। लेकिन मैंने ६५ और ७१ के युद्घों के विषय में नज़में लिखीं, ६५ के युद्घ से संबंधित मेरी दो नज़में हैं।

 

बांग्लादेश युद्घ के ज़माने में मैंने तीनचार नज़में लिखीं। लेकिन उन नज़मों की रचना में युद्घ गीतों का आग्रह करने वालों को मुझसे और भी निराशा हुई। परिणामस्वरूप मुझे सिंध में भूमिगत हो जाना पड़ा। युद्घ समाप्त हुआ तो पाकिस्तान के दो टुकड़े हो चुके थे।

 

चुनाव के बाद फ़ौजी सरकार समाप्त हो गयी थी और भुट्‌टो के नेतृत्व में पीपुल्स पार्टी की सरकार स्थापित हो चुकी थी। उनसे मेरे अच्छे संबंध थे उस ज़माने में जब वह विदेश मंत्री थे और उस समय भी जब वह विपक्षी पार्टी के नेता थे। उन्होंने मुझे अपने साथ काम करने के लिए आमंत्रित किया। मैंने पूछा मेरा काम कया होगा, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि मैं पहले से ही सांस्ह्मतिक गतिविधियों में भागीदार रह चुका हूं। क्यों न उसी क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर कुछ काम करूं। मैंने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और नेशनल कौंसिल ऑफ  आर्ट्‌स (राष्ट्रीय कला परिषद्‌) की स्थापना की। इसके अतिरिकित मैंने ‘फोक आर्ट्‌स* जो अब ‘नेशनल इंस्टीट्‌यूट ऑफ  फोक हेरिटेज* है, की स्थापना की। मैं इन परिषदों की देखरेख में चार साल तक व्यस्त रहा कि सरकार फिर से बदल गयी। इस अवधि में मेरा गद्य और पद्य लिखने का क्रम लगातार जारी रहा। इसी अवधि में मेरी शायरी का अंग्रेज़ी, फ़्रांसीसी, रूसी तथा अन्य दूसरी भाषाओं में अनुवाद होता रहा। जिया उल हक के शासन काल में मेरे प्रभाव को नकार दिया गया। वैसे भी इस सरकार में संस्ह्मति का महत्व पहले जैसा नहीं रहा था, मैंने सोचा मुझे कुछ और करना चाहिए।

 

मैं एशियाई और अफ्रीकी साहित्यकार संगठन के लिए कुछ न कुछ करता ही रहता था। उनकी गोष्ठियों में भी भागीदारी होती रहती थी। उस संगठन का दफ्तर काहिरा में था जहां से उस संगठन की पत्रिका लोटस का प्रकाशन होता था।

 

कैंप डेविड समझौते के बाद अरब के लोगों का यह अनुरोध था कि उसका दफ्तर काहिरा से कहीं और स्थानांतरित कर दिया जाये। लोटस का मुख्य संपादक जो संगठन का सचिव भी था, उसकी साइप्रस में गोली मार कर हत्या कर दी गयी थी। अब लोटस का संपादन करने वाला कोई नहीं था। इस समय एफ्रोएशियाई साहित्यकार संगठन का दफ्तर कहीं नहीं था। इस पत्रिका के संपादन के लिए मुझे आमंत्रित किया गया और यह भी फैसला हुआ कि संगठन का दफ्तर बैरूत में स्थानांतरित कर दिया जाये। मैं अफ्रीकी एशियाई साहित्यकारों के संगठन और उसकी पत्रिका लोटस से चार साल तक जुड़ा रहा और फिर हमें इससे फुर्सत मिल गयी।

 

बैरूत पर आक्रमण के एक महीने बाद मैं किसी न किसी तरह वहां से निकलने में सफल हो गया और पाकिस्तान पहुंच गया। यहां आते ही मैं एक बार फिर बीमार हो गया।

 

अब जो यह एलिस के बारे में आप लोग पूछ रहे हैं तो मैं बताऊं। जब मैं कॉलेज में पढाने लगा था तो जैसा मैंने बताया, मेरे कुछ साथी ऑक्सफोर्ड से वापस लौटे तो वे मार्क्सवादी विचारधारा के समर्थक थे। उसी में एक साथी जो मार्क्सिस्ट था उसकी पत्नी जो अंग्रेज थी, वह भी मार्क्सिस्ट थी। एक दिन उसने मुझसे पूछा, तुम उदास और निराश क्यों रहते हो, फिर स्वयं ही बोली, तुम्हें इश्क  हो गया है कया? तुम बीमार लगते हो। उसने कुछ किताबें मुझे दीं और कहा कि उन्हें पढ़ूं उसने स्पष्ट किया, तुम्हारा दुख बहुत कुछ व्यक्तिगत ढंग का है। जरा पूरे हिंदुस्तान पर नज़र डालो, अनगिनत लोग भूख और बीमारी के शिकार हैं। तुम्हारा दुख तो उनकी तुलना में कुछ भी नहीं है। और तब प्रेम के विषय से मेरा धयान हट गया और मैंने व्यापक संदर्भों में सोचना आरंभ कर दिया। मेरी नज़म 'मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरी महबूब न मांग ' इसी बदलते हुए सोच का परिणाम थी। मेरे मित्र जिनकी पत्नी का उल्लेख मैंने किया वह एक अच्छे साहित्यकार थे और एक कॉलेज के प्रिंसिपल भी थे। उनके साथ शिक्षण के कार्य में व्यस्त हो गया। कोई तीन चार साल बाद मेरे मित्र की अंग्रेज. पत्नी की एक बहन उन लोगों से मिलने अमृतसर आयी, जहां मैं पढा रहा था। मेरी उस महिला से जब मुलाक़ात हुई तो हम मित्र बन गये लेकिन उन्हीं दिनों युद्घ छिड  गया और वह महिला अपने देश वापस न लौट सकी। मैं भी कैंब्रिज जाने वाला था मगर न जा सका और इस तरह हमारी मित्रता गहरी होती गयी और एक दिन हमने शादी कर ली। वह महिला एलिस थी।

 

जहां तक बैरूत में मेरे प्रवास का संबंध है तो मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मैं फिलिस्तीनियों का समर्थक था जिन्हें एक षड्‌यंत्र द्वारा अपने देश से निकाल दिया गया था। यह अजीब बात थी कि इज़राइली जिन्हें नाजियों के हाथों कठोर यातना झेलनी पडी थी, वे भी अब फिलिस्तीनियों को इसी प्रकार कष्ट देने के लिए उतारू थे, जबकि फिलिस्तीनियों ने इजराइलियों का कुछ नहीं बिगाडा था। लेकिन शायद इज़राइलियों के अत्याचारी व्यवहार के पीछे हिंसक मनोग्रंथि काम कर रही थी। शक्तिशाली का साथ तो सब देते ही हैं क्योंकि उसमें कोई हानि नहीं होती। कमज़ोर का साथ देने वाले कम होते हैं और उसमें केवल हानि ही हिस्से में आती है। मैंने बैरूत प्रवास के दिनों में कमज़ोर का साथ देने को अपना रचनात्मक धर्म स्वीकार किया था।

 

उर्दू से अनुवाद : मो. जफर इक़बाल 

 

[समाप्त]

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