जून 21, 2011

राकेश : जैसा मैंने तब जाना

बस शुरू करने से पहले इतना ही आग्रह कि न जाने उस सुबह किन दबावों किन विचारों के दरमियानी में ये सब लिखा गया था. आज हू-ब-हू उसे उतार रहा हूँ . किसी को भी जान पाना अपने आप में जटिल प्रक्रिया और हमारी समझ में क्रमबद्ध विकास होता रहता है.. तब और अब के बीच में क्या-क्या बदला किन-किन स्थापनाओं को दुबारा लिखने की ज़रूरत है उस पर फिर कभी ..

तुम्हारा नाम राकेश है . चतुर्वेदी परंपरा से मिला. 'लीक-लीक कपूत चलै' इसलिए तुमने सपूत होने की ठानी और उन सब प्रचलित प्रसारित रुढ़ हो चुके विचारों को सिरे से ख़ारिज कर अपना नया रास्ता चुना. क्यों चुना शायद उम्र का तकाजा - क्रांतिकारिता का अडवेंचर जैसा कुछ.!! हजारों खवाहिशें ऐसी ' के 'केके मेनन' की तरह..

पहले पढ़ना फिर उसकी व्यवहारिकता जांचना. तुम्हे पढ़ना..पढ़ना तुम्हारा पैशन जूनून लगता है. है भी. रात रात दो दो तीन तीन बजे तक नींद को बिस्तर से दूर रख पाने में तुम माहिर हो..पर जब मन करे..! मन माने 'मूडी' किस्म के. माने काम को बस टालते रह उन विकट परिस्थितियों का निर्माण होने दिया जाये जब दबाव बस विस्फोटित होने वाला हो. दबाव की संस्कृति में भयातुर हो काम करने की रवायत में एक और नाम जुड़ा..शायद यह साहित्य पढ़ने-संवेदनशील हो सकने -हो जाने का बाय-प्रोडक्ट हो ??..

सारे जब एक ही तरह के हैं तो हमें वैसा तो कभी होना मंज़ूर नहीं. उन जैसा हो गए तो विशिष्ट हो जाने में जो मज़ा है, भीड़ में दूर से पहचाने जाने का पुरस्कार है उससे वंचित होना पड़ेगा. हर बात पर बस ध्रुवीय दृष्टिकोण अपनाकर पक्ष विपक्ष में तर्क के तीर कमानों का प्रयोग तुम बखूबी करते हो..बस एक ही कमी है, कि तुम बोलने से पहले इतना सोचते नहीं- इसका कारण 
यह कि, क्योंकि हो सकता है तुमने उसपर पीछे बीते दिनों सालों में आंशिक विचार किया हो- या यह की तुम्हारी परिभाषाओं में कुछ गलत है ही नही- पर बोलने के बाद जब तुम्हारे शब्द हमारे कानों में जाते हैं तब तुम अपनी बनती बिगड़ती छवि को लेकर इतने चिंतातुर क्योँ हो उठते हो ??

तुम जैसा सार्वजानिक रूप से सबके सामने आओगे वैसे ही तो 'हायपॉथीसिस' बनेंगे किसी की इमेज को लेकर. किसके पास वक़्त है जो एक-एक को पास से जाने 'स्टीरियोटाइप' होने से बचा ले. तुम बेफिक्र लगते हो. पता नही यह स्वाभाविक प्रतिक्रिया में मिला है या तुम्हारी अर्जित संपत्ति है ?! यह बात भी कि जब तुम अपने  वाक् चातुर्य का प्रयोग वहाँ बाहर चाय की दूकान पर कर अपना तथाकथित अर्जित ज्ञान बांटते फिरते हो, तो पता नही क्यों लगता है कोई अपनी उर्जा को ऐसे कैसे व्यय कर सकता है..

यह ठीक है हमारा अपना जीवन दर्शन होता है पर उसमे समायोजन होते रहने चाहिए. परिस्थितियाँ तब भले जैसी भी रही हों उनका-तुम्हारा हरबार उन्ही 'स्टैटिक' स्थितियों में फंस जाना, पकड़े जाना खतरनाक है. तुम भी एक अच्छे किस्म के जीव हो शायद सब होते होंगे, पर तुम्हारा वह हिस्सा कभी-कभी ही सामने आ पाता है. चिंतित भी तुम होते हो पर ज़यादातर उसका समय निश्चित है. संवेदनशील हो. कुछ नया पढ़ने की ललक हमेशा बनी रहे. तुम क्रन्तिकारी वक्ता बन सकते हो पर अच्छे वक्ता नही. क्योंकि ये तुम्हारा स्वाभाव नही. तुम भी दुखी होते हो, तुम्हारा भी चेहरा जब लटक सपाट सा होकर एक ही शून्य की तरफ तकती दो आँखें कहीं खो सी जाती हैं तो लगता है कुछ उधेड़बुन अन्दर ही अन्दर असहज करती जा रही है.

कॉलेज के दिनों में तुम भले ही कैसे रहे हो आज भी अस्थिर स्थिरता चाहते हो पर अब यह संभव नहीं. तुम्हारी आँखें दूसरे की एक-एक बात 'माइन्यूटली' पढ़ती हैं. अब तो यह तुम्हारा रूचि संसार बन गया लगता है..मन पढ़ने में मज़ा आता है न..किसी की खोपड़ी में क्या खुराफात चल रही है, तुम उसे जानने की की कोशिश बड़े ही 'बायपासी'  तरीके से करते हो और सामने वाला खुलता चला जाता है..आज तक पता नहीं किस किस ने तुम्हे अपनी अनकही कहानियां सुनाई होंगी..

हर चीज़ को ध्वस्त करना फिर पुनर्निर्माण. अपने संदर्भ में कहाँ तक इसे देख पते हो पता नहीं.

हर चीज़ की नयी अपनी सी लगती परिभाषाएं गढ़ना. उसे कहना. कह कर फंस जाना..फिर कुछ नहीं.. तुम बाहर से दूसरों को अस्त व्यस्त व्यक्तित्व वाला लगने की कोशिश क्यों करते हो ?? चेहरे पर गुरु गंभीरता ओढ़ी हुई न लगकर स्वाभाविक लगने लगती है.

बस शायद तुम्हे अभी इतना ही जान पाया हूँ शायद. अभी इतना ही. वस्तुनिष्ठता बन पाई या नहीं कह नहीं सकता..यह भी हो सकता मैंने भी वही सब देखा-जाना-लिखा हो जो सबको सामने
दिखता हो..

19 मार्च 2010 ;
06:01 प्रात:

{ इधर तुम पर लिखा एक नया पन्ना:  राकेश: जो सपनों में कहीं खो गया है }

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