अगस्त 06, 2011

बंड की आत्मकथा: फुटनोट

सुबह सर को जो मेल किया उसमे अपने पुराने औजारों को ही नत्थी कर बाणभट्ट के साथ भेज दिया.

पूरी आत्मकथा कहीं-न-कहीं पुरुषों के द्वारा सुझाई-बनायी समाजीकरण की प्रक्रिया  का नकार लगती है. उसमें अंतर्द्वंद ही नहीं, उससे उलझता, पेंडुलम की तरह नाचता वाचक, अपनी भूमिका को चुन नहीं पता. उससे कोई ऐसा पैटर्न नहीं चाहिए जिस पर पहले जाँच की जा चुकी हो.

सिमोन भी झूठ-मूठ याद आयीं और उनकी किताब की यह पंक्तियाँ भी के 'स्त्री जनम नहीं लेती उन्हें बनाया जाता है '.पीछे बीते साल इसके आगे किसी दरीचे खोलती अपन ने गढ़ी कि 'पुरुषों का भी जनम नहीं होता उन्हें भी बनाया जाता है.' और यह समझ इधर पुख्ता ही हुई है..

अपना 'बंड' इस बने बनाये जाले के बरक्स खुद को किसी खाचें साचें में फिट हो जाने के लिए सर्वथा  अनुचित अनुपुक्त पाता है. उसका 'वात्स्यायन वंश' के अनुरूप ढालना, टकसाली अनुभव से भाग निकलना. अपने आप में यथास्थितिवादी समाज के साथ भिड़ना है. श्रम विभाजन, लिंगीय विभाजन के तीसरे स्तर पर वर्गीय विभाजन के बनिस्पत वह मनमौजी पाने से जीता है. कोई कृति पूरी नहीं कर पाना ज़रूर सालता है, पर..

हजारी प्रसाद द्विवेदी बाणभट्ट के रूप में एक नए पुरुष, नए मानव को गढ़ने कि कोशिश करते हैं. तब जबकि 'स्त्री विमर्श ' का संस्थानिकीकरण हुआ ही नहीं था. इसे 'पुरुष विमर्श ' के नुक्ते के साथ उस मेल में जानबूझ कर नहीं जोड़ा रहने दिया आगे की किसी बात के लिए. और जब दोबारा इस उपन्यास को ख़तम करूँगा तो फिर अपनी टकसाल से बाण पर विस्तार से सन्दर्भ सहित बात करूँगा. 

24.07.2011; दिल्ली

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