अगस्त 07, 2011

कुछ देर के लिए ही सही..

उस दिन जब उधर से तुम्हारी मिस कॉल आई तो पता नहीं कहाँ से ध्यान आ गए अखबारों में छपने वाले 'मुझसे दोस्ती करोगे ' टाईप विज्ञापन. पैसा खर्च करके लोग कुछ देर की गुफ्तगू का लालच देते पास बुलाते- कानों को करीब से सुनाते. ऐसा  होना तो नहीं चाहिए था पर आज तक की गयी जवाबी डायल में यही कहीं फंसा पेंच सा लगा. क्यों  हमेशा बैलेंस की तंगी उधर के तुम्हारे जमा खतों में ही पाया जाती है ?? 

क्यों नहीं तुम कभी..और हम दोनों..

तुम्हारी तरफ से तो मैसेज भी आते थे तब ये कैसे मेरे दिमाग में आई.. सिर्फ आई नहीं यहाँ लिख भी दी, आगे कभी इत्मीनान से सोचने के लिए..शायद बार-बार रिचार्ज के लिए इतनी जल्दी कोई संस्कारी परिवार रूपये नहीं देता होगा.. 

यहाँ लिख मैंने अपने अन्दर की तोड़फोड़ से अपने को कुछ हद तक बचा लिया, कुछ देर के लिए ही सही..शायद..

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