अगस्त 13, 2011

यक-ब-यक शोर हुआ-इक नया मुल्क बना

'कितने पकिस्तान 'से..
 
ऐसे ही बैठे थे इधर भईया दाहिनी जानिब
उनके नज़दीक बड़ी आप शबाना को लिए
अपनी ससुराल के कुछ किस्से, लतीफे, बातें,
यूँ सुनाती थीं, हंस पड़ते थे सब
 

सामने अम्मा वहीँ खोले पिटारी अपनी
मुंह भरे पान से समधिन की इन्हीं बातों पर
झुन्झलातीं थीं, कभी तंज़ से कुछ कहती थीं
 

हमको घेरे हुए बैठीं थी नईमा, शहनाज़   
वक्फा-वफ्का से कभी दोनों में चश्मक होती
हस्बे मामूल संभाले हुए खानादारी
मंझली आपा कभी आतीं थीं कभी जाती थीं,
 

हमसे दूर अब्बा उसी कमरे के एक कोने में 
कागजात अपनी आराज़ी के लिए हुए बैठे थे
 

यक-ब-यक शोर हुआ-इक नया मुल्क बना  
और इक आन में महफ़िल हुई दरहम बरहम  
आँख जो खोली तो देखा क़ि ज़मी लाल है सब..
 

-अख्तरुल ईमान

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