अगस्त 14, 2011

उल्लू की पहचान और हमारी आज़ादी का द्वन्द

जब हम छोटे थे तो हम छत पे जा कर पतंगों को उड़ते हुए देखते थे. उड़ना कभी सीखा ही नहीं. बस दूर आसमान में पंछियों के साथ घूमते रहते थे. बादलों में बनने वाली आकृतियों को बिन कागज़ बनाते-सोचते और एक दूसरों को भी वही दिखने की कोशिश करने लगते. चरखरी से ढील देते कच्चे-पक्के मांजे की पहचान करते पतंगों को पता नहीं कैसे कैसे नाम देते रहते थे, दिमाग पर जोर डाल भी रहा हूँ तो भेडियल के अलावा किसी का नाम तक याद नहीं आ रहा. सुनील की दूकान से उसी समय मुलाकात हुई थी. पता नहीं पहली बार कब हमने इन पतंगों को पंद्रह अगस्त के साथ जोड़ कर देखा. शायद तब जब स्कूलों की दीवारों पर तीन रंग वाले कनकौओं को चिपका हुआ पाया.

आज तक मुझे समझ नहीं आया की अगर स्कूल ऐसा कोई प्रयास नहीं करता तो क्या हम अपने उन दिनों में लाल किले को भी इस दिन से जोड़ पाते. देशभक्ति जो अमूर्त सा मूल्य है, हममे घुसपैठ कर पाता. इसमें अगर घर में बैठे टीवी को भी जोड़ लूँ तो कुल मिलकर उन दिनों दूरदर्शन के अलावा कोई और प्रसारक नहीं था. मिले सुर मेरा तुम्हारा से लेकर बजे सरगम हर तरफ से गूंजे बन कर देश राग तक बार-बार कानों में जाते और चाहिएं क्या लगता होगा..शायद ये कि इस भारत नामक संज्ञा में केवल हम जैसे विशेषण नहीं रहते और भी लोग हैं जिनके साथ हमें रहना है. बुनियाद-तमस के समय हम कुछ ज़यादा ही छोटे रहे होंगे तभी उसकी कोई भी याद नहीं. पर हमलोग और नुक्कड़ की छवियाँ आज भी कहीं किसी कोने से बाहर निकलने की कोशिश करती हैं पर धुंधली सी..

मतलब मुझे आज भी समझ नहीं आता की अपने पन की भावना अपने आप आती क्यों नहीं. परिवार-देश माता पिता नामक संस्थाओं से हम खुद जुड़ क्यों नहीं पाते हैं इतनी सारी एजेंसियां उनके प्रति समर्पण त्याग प्रेम निःस्वार्थ भाव को इमामदस्ते में कूट-कूट कर हमें बाल जीवन घुट्टी की तरह क्यों पिलाते हैं. शायद बार-बार इन्हें दोहराना इनके अस्तित्व के लिए अनिवार्य हो.

तभी हर साल पंद्रह अगस्त-छब्बीस जनवरी पर सत्ता अपने अस्तित्व के लिए इतने जोर शोर से देशभक्ति का तड़का मार आलिशान कार्यक्रम आयोजित करती है. भले उनके पीछे के मूल्य चुक गए हों, आदर्शों को दीमक खायी जा रही हो, यूटोपिया स्विज़ बैंक के किसी सीक्रेट खाते में बंद कर दिए गए हों. पर ऐसा कैसे हो सकता है की इस दिन प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से झूठा ही सही इस देश को संबोधित करना चाहते हैं. वादे किये जायेंगे, योजनाओ की रुपरेखा खिंची जाएगी ताकि उस जनता को लगता रहे उसके अस्तित्व के लिए भी कुछ न कुछ किया जा रहा है. सिर्फ इस साल नहीं हर साल उसकी रक्षा के लिए तोपों-मिसाइलों-राडारों से उसे जिंदा रखने की भरपूर कोशिश की जा रही है. भले अनाज की काला बाजारी और भ्रष्टाचार से उसकी मौत हो जाये पर किसी शत्रु राष्ट्र के हाथों उसकी ह्त्या नहीं होने दी जाएगी. और इस देश को बचने के उपक्रम में यदि साकार किसानो गरीबों बेरोजगारों के लिए कुछ नहीं कर पा रही है तो इस कृत्य के लिए उसे क्षम्य तो किया ही जा सकता है.

विजय तेंदुलकर के घासीराम कोतवाल में सिर्फ एक घासीराम था पर यहाँ सारा बल एक पतनशील और विलासप्रिय समाज पर है जो घासीरामों को जन्म देता है और उसकी हत्या भी करता है,और साथ ही तानाशाही को एक-दूसरे रूप में सहने के लिए तैयार भी है अगर उसके उलटे-पुलटे मूल्यों को खरोच न लगें.हर बार हमें बताया जाता है टू स्टेप बैक्वर्ड्स एंड देन वन ग्रेट लीप फॉरवर्ड. अंग्रेजी वाले खुद समझ लेंगे, हिंदी वालों को समझाते हैं दो कदम पीछे और फिर लम्बी छलांग आगे. पर ये छलांग लगाने का सुअवसर कब आएगा किसी को पता नहीं. शायद कभी न आये.

यह हमारे देश का नहीं हर उस सत्ता का जैविक संकट है जो ऐसी व्यूह रचना करती है जहाँ उसके अस्तित्व पर कोई संकट न आन पड़े. संविधान उनका निजी ताना बना है जिसमे कभी कभी ये संशोधन कर अपनी आयु को दीर्घ बनती रहती है.हमें बस पांच साल में सिर्फ एक बार के मेले में आमंत्रित किया जाता है. अब इसे थीसिस-एंटी थीसिस का वितंडावाद कहा जाये या द्वंदात्मकता का चरम..

अब अगर मैं ऐसा सोच रहा हूँ देशभक्ति भी एक सेफ्टी वोल्व की तरह सीधे सत्ता को बचाती ही है और उसका उपयोग वे इस रूप में बड़ी कुशलता के साथ कर रहे हैं तो क्या गलत है. और अर्थों की छवियों में कुछ ऐसा गड्ड-मड्ड कर दिया गया है जिसे कोई भाषा वैज्ञानिक भी नहीं सकता. देशभक्ति और सरकार को पर्याय मान लिया गया है, आरोपित मूल्य के साथ नहीं है उसे सत्ता के खिलाफ मान कर आसानी से कुचला जा रहा है. बाकी जनसंख्या इतनी भ्रमित है की वे हर शाख पर बैठे उल्लू को भी नहीं पहचान पा रही.
 

{यह पोस्ट जनसत्ता में, 'आज़ादी का द्वन्द' शीर्षक के साथ आई थी | तारीख पांच सितम्बर | वहां पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें 

{दो हज़ार तेरह, दो साल बाद। उसी के आस पास घूमते हुए। }

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