अगस्त 17, 2011

भाषा का मिसफिट रेफरेंस

नीचे जो आप '' और '' दो पात्रों के माध्यम से संवादों में विकसित, भाषा के सवाल पढ़ने जा रहे हैं, ये नाम मैंने इन्हें दिए हैं. उस पुर्जे पर कोई ऐसा संकेत नहीं था .वहां ऊपर वाली सवालनुमा बातें नीली कलम से और नीचे जवाबनुमा काली से लिखी हुई थीं. यह मुड़ा- तुड़ा कागज़ ,बरसात में भीग चुकने के बाद भी, हिंदी में लिखे होने के कारण मेरी आँखों को खटका. उठा कर देखा-पढ़ा तो लगा किसी अ-हिंदी भाषी बैठक में किन्ही दो मित्रों के बीच भाषा जैसे जटिल विषय पर कोई अनौपचारिक बात इस टुकड़े पर बिना बोले लिख कर हो रही होगी. पता नहीं इसे वहां ऐसे क्यों फेंक दिया शायद पहचाने जाने के संकट से बचने के लिए ऐसा किया होगा..चाहे जो हो अब ये यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ . बात शुरू होती है सौंदर्यशास्त्र से..

 
.इनका सौंदर्यशास्त्र थोड़ा अधिनायकवादी है.
.और सारे सौंदर्यवादी अधिनायकवादी हैं, हमारे आस-पास.

.क्या यह इनमे भाषा के माध्यम से आया है?
.न!! बाद में इस पर बात करेंगे, लम्बा विषय है.

.या समाज, परिवेश, संस्कृति का योगदान अहम है?! क्या भाषा इनमे कहीं छिपी सी नहीं है? मेरा मतलब गौण किस्म से..
.मेरे पास इसके उदहारण हैं.


.मेरे पास भाषा तो है, पर उसका अस्तित्व संदिग्ध सा माना जा रहा है!
.किस बेटे ने कहा? मेरे रहते!!

.इस संस्थान के इस कमरे में सारे विद्वत जनों की भाषा मैं समझ रहा हूँ, पर यह मेरी क्यों नहीं है ??
.तुमने मेरी ऊपर की बात को ठीक से नहीं समझा, एक बार गाली देकर देखो सब समझ जायेंगे.

.अस्तित्व की संदिग्धता और वह भी भाषा की, इसलिए है क्योंकि यह संस्थान खुद को तो नंबर एक कहता है, पर दूसरा बैल हिंदी वाला कब होगा? मेरे कहने का मतलब जिसमे मैं सोचता समझता बोलता ढांचे बनता हूँ, मुझे वह स्वंत्रता टकरा कर ही क्यों मिलती है? गड्ड-मड्ड सा है पर समझ लो.
.वह तो गुलामी का प्रभाव है भाई इसीलिए तो अपन लड़ रहे हैं.

.मुझे लगता है सिर्फ गुलामी नहीं उसके पीछे हैजेमनी  वर्चस्व की भावना भी काम कर रहे हैं, आप उस भाषा को माध्यम बना कर अपने को स्थापित करना चाह रहे हैं जो कम लोग समझ पते हैं बोल पाते हैं, यही आपका विशिष्टता बोध है.
.वर्चस्व तो है ही इस वर्चस्व के कारण भी तो गुलामी ही है.

.मेरा या कहूँ हमारा ऐसा पक्ष-विचार रखना, कहीं न कहीं हमें इस पैटर्न में मिसफिट तो बनता ही है, हम अपने प्रति हेयता बोध से ग्रसित होकर, दूसरी भाषा में कूदना चाहते हैं. हमारा भाषिक दुराग्रह हमें कहाँ का रख छोड़ेगा??
.सही कह रहे हो. पर यह हमारी हीनता से ज़यादा हमारी मजबूती है.

.यह मजबूती कमजोरी जैसी क्यों लग रही है, हम स्वयं को कहाँ पायें..??
.गुलामी इसी रूप में हमें भी प्रभावित कर ही रही होती है. यह स्वाभाविक सी लगती प्रक्रिया नहीं, थोपी गयी है.

 ***
यहीं ये संवाद रुक जाता है. मैं उन दोनों से मिला नहीं हूँ पर इतना ज़रूर कहूँगा,उनके पास अपनी भाषा को लेकर जो समझ है उसके प्रति जो बातें हैं कहीं न कहीं हमारे सन्दर्भों में फिट होती हैं मतलब हम मिसफिटों के रेफरेंस में..

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