अगस्त 16, 2011

एक पुरुष का स्त्री विमर्श

लगता है मेरी मुलाकात सबसे छोटे-छोटे एपिसोडों-कड़ियों में ही होती है. थोड़े वक़्त के लिए किसी का आ जाना. ठहेरना. बोलना. बताना. 'बताना ' को 'बतियाना ' लिख रहा था, पर इतनी आत्मीयता होते-होते कोई दूसरा ही पार्ट शुरू हो जाता है. इस प्रमेय उर्फ़ थियोरम को एक उदहारण से समझाया जाता तो इतनी समस्या मेरे पाठक को न होती. इसलिए एक नया पैरा.

मैं हर मुलाकात में वही पिछला वाला शख्स नहीं रहता न ही जिस शख्शियत से मिलता उसे वही ही रहना देता. 'हूँ ' के साथ वाक्य समाप्त कर सकता था पर..दूसरे पर हमारा इतना प्रवाह प्रभाव तो होता ही है की उस मुताबिक अपने को बदल लिया जाये. खासकर तब जबकि मामला अपने से 'इतर' 'लिंग' वालों का हो. यह स्वाभाविक न होते हुए भी स्वाभाविक ही है. हम आपस में जुड़ने के लिए ऐसा करते ही हैं. कुछ अड़ियल भी होते हैं, उनकी निर्मिती पर फिर कभी..

मतलब साफ़ है इन छोटे छोटे दरमियानों में खुद को इस रूप में देखना कि दूसरी-तीसरी आँखें कैसे देखती हैं?? अपना पार्ट अदा करते करते हम दूसरे में अपना अंश खोजते हैं. कहाँ-कहाँ मैं हूँ. उनकी आँखों में. होंठों पर. पैर की चटकती उंगली के पास या कहीं और.. पेट में भी हो सकता हूँ. पर इसे गर्भ कहना और ऐसी किसी भी
चेष्ठा को कर सकने का साहस- का द्वय अभी तक संभव नहीं हो पाया है.

हम सबके तो नहीं पर मेरे एकान्तिक रति वाले पाठों में उनकी अनुपस्थिति का एक सन्दर्भ-एक रुक्का ये भी बतलाता है की मेरे जैसे प्राणी उनसे देह, देह की सुचिता, नैतिकता पर बात तो कर सकता है; पर कहीं न कहीं दैहिक संपर्क के बिम्ब उस छवि को मटियामेट न कर दें- मटियामेट को पढ़ें धूलधूसरित - उसका आभामंडल समानुपातिक रूप से क्रमशः बढ़ते चंद्रमा की कलाओं की तरह बढ़ता रहे, घटे नही !!.
इसलिए ऐसी कोई कोशिश नही करता.

ध्यान से विखंडित करने पर एक और बात भी पता चलती है कि हम नैतिकता, शुचिता, पवित्रता जैसे सांस्कृतिक मूल्यों की बात करते ही शाब्दिक रूप से जटिल पदबंधों में अपनी बात कह, उस संकट से दूर हो जाना चाहते हैं. जो हमारे अवचेतन का अनिवार्य हिस्सा होता 
होगा/होता  है.

कभी ऐसा किया भी गया तो सबसे पहले मुझे खुद ही अपनी प्रतिमा को भंजित करना होगा. पुराने मित्रों के सहारे नही नए मित्रों से. दो देहों के लिए एक अदद पलंग जितने कमरे का स्पेस तो माँगना ही होगा. जिसमे कुछ हद तक अपने पहले के चेहरे के बचे रहने की गुन्जायिश भी है. पर एक नुक्ता यह भी है कि इस दैहिक निवेदन को किस रूप में प्रतिपक्ष के सम्मुख रक्खा जायेगा.

लड़की अगर खुद ऐसे किसी प्रस्ताव को दायें-बाएं करके रख भी दे, जिसकी सम्भावना यहाँ के पहरेदारी परिवार समाज में अपने अधिकतम स्तर पर है, तब इस बंदापरवर का क्या रिएक्शन होगा अभी मालूम नही. शायद हिम्मत जो पहले ही कांख के पास छोटे से तिल की तरह है और उसके वहां होने से नज़र भी कम ही पड़ती है उस प्रस्ताव को किसी और सृजनात्मक दिशा में लगा दिया जाए. कम से कम..पता नही क्या..

पर इन सारी संभावनाओं प्रसम्भावनाओं, जो मेरे सामने फूल कर कुप्पा होती जा रही हैं इनकी हवा निकालने के लिए एक छोटी सी झाड़ू की सींक ही काफी है. मतलब आजतक कोई हमारे संग इतने एकान्तिक एकांत में ठहरी ही नही की इन पूर्व स्थापनाओं के उत्तरार्ध तक पहुंचा जा सके. न हमने ख़यालबाज़ी के अलावा किसी को अपने इतना पास पाया. कविता को छोड़ें तो वहां की पंक्तियों तक में इस निर्वस्त्र स्थिति का सामना नही किया.

इस सबको विखंडित करती एक बात जो लुप-लुप भेजे में टिमटिमा रही है कि शायद मैं उस पुरुष का प्रोटोटाईप तो नही जिसने स्त्री को एक मनुष्य के रूप में स्वीकार कर उसके अस्तित्व को बनाये रखने का संकल्प लिया है. वह पुरुष स्त्री के बीच इन रतिनुमा अवस्थाओं के अलावा भी मैत्री की संभावनाओं को टटोल रहा है. या तसलीमा की कविताई पड़ने के बाद का साईडीफेक्ट तो नही जिसने इतनी गालियाँ लानत मलामत के बाद औरत को उसके ढके-सजे-सवरें रूप के अलावा उसके पूरे अस्तित्व को स्वीकृति प्रदान कर दी हो और उसकी हृदयस्थली में स्थान पाने को लालायित हो उठा हो. मतलब इस सबकी परिणिति इस प्रोटोटाईप के रूप में हो रही हों, जिसने सामान अवसरों के साथ मानवीय हो सकने की सारी संभावनाएं सूत्रबद्ध हो रही हैं..

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