अगस्त 20, 2011

बरस्ते आरक्षण:कुछ सवाल कुछ जवाब

आरक्षण. यह किसी फिल्म का नाम था, या वर्तमान भारत की स्थिति थी,या उस पर की गयी कोई टिपण्णी, या इसके प्रदर्शित होने के बाद इस अवस्था पद  में किसी भी प्रकार की अवशम्भावी रुकावट से पहले आने वाली खेद प्रकटन सूचना ??

पता नहीं हम लोग इतने डरे हुए क्यों रहते हैं. हमें अपना अस्तित्व बार-बार क्यों सुनिश्चित करना पड़ता है, के सामने वाला कहीं न कहीं कुछ तो ऐसा कर रहा है जो ठीक नहीं है. पर यह सच है, डर हमारा स्थायी भाव बन गया है. कभी कभी मैं खुद इससे पीड़ित रहता हूँ. अस्तित्वमूलक समय का यह भी एक पाठ है, पर इन रीडिंग्स पर अभी नही..

इससे एक बार फिर सत्यापित हो गया कि हम बोल के लब आज़ाद हैं तेरे  का बोलराग  ज़रूर अलापते हैं, पर हम सब अपने मूल चरित्र में फ़ासीवादी होते हैं. विद्वत जन इसे सरलीकरण कह खारिज करना चाह रहे होंगे; पर क्या यह किसी से छुपा है जिस स्वतंत्रता के लिए हम चीखते चिल्लाते हैं, वही दूसरों को फूटी आँख देने को राज़ी नही.

फिल्म तो अपने आप में ऐसा माध्यम है जिस पर पहले से ही प्री-सेंसरशिप लगी हुई है. मतलब अभिव्यक्ति का वह संस्करण जो काट-छांट कर बाहर आता है. गुलाबी आईना आज तक किसी प्रमाण पत्र की रह देख रही है. सोनाली बोस की अमु 'ए' सर्टिफिकेट के भंवर में फंस कर रह गयी. आखिर में उसे सीधे डीवीडी पर रिलीज़ किया गया. पांच आज तक थियटरों में पहुँच नही पाई, पर कई वेबसाइटों पर उसके पायरेटेड संस्करण उपलब्ध हैं. अभी पीछे खबर आई थी के इसी सेंसर बोर्ड ने अनुराग कश्यप की फिल्म 'दैट गर्ल इन येल्लो बूट्स' देखने के बाद उन्हें किसी मनोचिकित्सक से संपर्क कर अपना इलाज करवाने की हिदायत तक दे डाली.

आरक्षण उपरोक्त वर्ग की फिल्म तो कतई नहीं है. इतना भर ज़रूर है की इसने एक विवादित विमर्श- आप इसे  अवस्था परिघटना त्रासदी से लेकर अपनी सुविधानुसार कुछ भी कहने को स्वतंत्र हैं- को लेकर अपनी बात कही है. यह न किसी के पक्ष में है न किसी के विपक्ष में. यह निर्देशक की बौद्धिक चालाकी ही कही जाएगी जब उसने कोई पक्ष न लेकर सिर्फ यथार्थ जैसे दिखने वाले सचनुमा कुछ को दर्शकों के सामने परोसा.

अब क्या जो दिख रहा है उसे ही एकमात्र सत्य मान लिया जाये या आगे पीछे के ताने बाने तो उधेड़ चादर को देख लिया जाये. शायद मैं अपने को दूसरे वाले के जयादा करीब पाता हूँ. तो शुरू करते हैं एक-एक करके. कुछ छुट जाये तो आप याद दिला दीजियेगा..

आरक्षण मूलतः ऐसे समय की फिल्म है जब हम कथ्य तो यथार्थ से लेते हैं पर शिल्प के स्तर पर उसका साथ छोड़ देते हैं. ऐसी ही कोई बात जनसत्ता के रविवारी में कभी पढ़ी थी. शायद यह उनकी अर्जित संपत्ति हो. रचनाशीलता के नाम पर एक नुक्ता यह भी. ये साली ज़िन्दगी से लेकर 'दैली बैली' तक सभी इसी फ्रेम को चुनते हैं. 'कमीने' भी कहीं न कहीं इसी रोग से ग्रसित थी. लगता है उनकी संरचना में कुछ रह गया. ट्रीटमेंट को कुछ अलग एंगेल से होना चाहिए. सब बाउंसर जा रहा है क्या..

मेरे कहने का मतलब यह है कि ऐसा क्यों होता है कि 'कमीने' का कोई और अंत नहीं हो सका. पूरी फिल्म ग्रे शेड्स में चलती हैं. पर ख़तम कहाँ होती है, थोड़े अच्छे की थोड़े बुरे पर जीत टाईप. अभिषेक चौबे क्यों एक बार फिर 'मृत्युदंड' के ढर्रे पे जा कर 'इशिकिया' को परा-स्त्रैण परिणिति की तरफ ले जाते हैं. गालियों बंदूकों के सहारे किसी फिल्म के संवादों को बोल्ड भी माना जाये और नयी मेढ़ कुरेदती नयी जमीं तलाशती भी. क्योंकर सुधीर मिश्र की 'साली ज़िन्दगी' में किरदार अपने खौफपने से दूर अति-मानवीय लगते हैं. इस हाईपर रियल्टी के चक्कर में फंस क्या प्रमाणित करना चाह रहे हैं. एक बारगी 'मुंबई एक्सप्रेस' के विजय राज और कमल हसन को पचाया जा सकता है. आप सिर्फ कुछ टुकड़े अपनी सलाहियत के लिए लेते हैं और कुछ को छोड़ देते हैं. 

यह कैसा फलसफा है, महंगी ट्यूशन के तुर्रे पर मुफ़्त ट्यूशन. मतलब आप जिस शिक्षा व्यवस्था की पैदाइश हैं, वहां चाहे सवर्ण हो या दलित आपको इन मास्टरों के चंगुल से कोई नहीं बचा सकता. अगर आप में से कोई यह कहना चाह रहा है की तबेले में पढ़ने वालों को सवर्णों के समकक्ष लाने के लिए मुफ्त ट्यूशन दी जा रही है; तो उन साहेबान से मेरा सवाल या यही होगा कि फिर सवर्ण काहे इनकी शरण में जाते हैं. क्या उन्हें इस प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाने का भय अभी से सता रहा है जबकि दौड़ में वे इन शैक्षिक कुपोषित वर्गों से कहीं आगे हैं.

फिल्म कहीं भी भाषा का सवाल नहीं उठाती. मेरी समझ से भाषा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जिन विषयों की पढ़ाई करके किसी को अगर आईआईटी या उसके जैसे किसी संस्थान में दाखिला पाना है तो उसके विषय का माध्यम अंग्रेजी होना अनिवार्य है. तो क्या हम यह समझे कि विज्ञान और गणित की भाषा अंग्रेजी होने से उनकी पकड़, विषय के रूप में अंग्रेजी भाषा में भी सामान रूप से वे पारंगत होते जा रहे थे.

शिक्षाशास्त्रियों और भाषाशास्त्रियों की दृष्टि में इन दोनों में पर्याप्त अंतर है. हम अपनी मातृभाषा में ही मौलिक रूप से सोच पाने में सक्षम होते हैं और हमारी विचार प्रक्रिया सहज रूप से इसे में संचालित होती है. माने, जो प्रिंसिपल, भारतीय अध्यापक सेवा जैसे विकल्प सुझाता है और इस शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने के सपने देख रहा है उसका यह कैसा दृष्टिदोष है कि माध्यम का सवाल उससे छूट गया. 

यह जहाँ ख़तम होती है वहां से और साफ़-साफ़ दिखाई देने लगता है, के भले सत्ता आपके पास है पर वहां भी पदानुक्रम की महत्वपूर्ण  भूमिका है याद करें शकुंतला ताई की भूमिका और यह भी कि यह समय वह समय है जब शिक्षण संस्थाएं राजनेताओं के सीधे हस्तक्षेप और अधिकार क्षेत्र का हिस्सा है. जिसका एक मतलब यह भी है की आपकी पूंजी उनके काले धन के लिए सेफ्टी वोल्व के साथ उस काले धन का स्रोत भी बन चुक है..

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