अक्तूबर 01, 2011

चलायमान छवियों की विखंडित अर्थछवियाँ : दो सन्दर्भ

फिल्म पता नही. जहाँ से मैं देखना शुरू करता हूँ वहां सीन एक टैक्सी वाले से शुरू होता है. जो अपनी मोटर साइकिल पर लोगों को उनके गंतव्य स्थलों पर छोड़ता है. माने इसके एवज़ में उसकी रोज़ी रोटी चलती है. और कई फ्रेम उसकी इसी गतिविधि और परिवार दिखा चुके थे.

एक दिन एक व्यक्ति को छोड़ना है. वह चलने से पहले उसके पास कम समय का हवाला भी दे चुका है. उस व्यक्ति के पास समय बहुत कम है यह उसकी आँखे भी बताती है जो बार-बार पीछे बैठे घड़ी को देखती जाती हैं. टैक्सी वाला उस अधीर व्यक्ति को समय से पूर्व पंहुचा देता है और वह महाशय इतनी ज़ल्दी में थे की बकाया लेने की भी फुर्सत नही थी. वह दुगना पैसा उस टैक्सी वाले के जिम्मे सौप कर चला जाता है.

अब उसकी पिछली सीट पर कोई नही है. खाली मोटर साइकिल भगाए जा रहा था की अचानक ब्रेक मार कर कुछ पीछे आता है. सड़क किनारे एक देशज फल लगाये खड़ा है. रेहड़ीनुमा मोटर साइकिल पर. थोड़े मोल भाव के बाद, पहले एक किलो, फिर दो किलो के दो थैले टांग, चल देता है. बीच में हम दर्शकों को दिखती है साथ साथ चलती नदी. भागती सड़क. घूमते पहिये. पिछड़ते पेड़. तरह तरह की आकृतियाँ बनाते बादल. और अचानक उन दो थैलों में से एक में से रह-रह फल गिरते जाते हैं. कुछ लुढ़कते-पुढकते सड़क से होते नदी में जाते, कुछ वहीँ डोलते रहते. लगता है थैली फट गयी थी. और हमारा चालाक इससे बेखबर है.

पर ऐसा होता नही है. उस दोगुने पासे मिलने के बाद से बाद वह सहज नही रह पाता. उसकी पशोपेश चेहरे पर साफ़ झलक जाती है. उसका, दुगुने रुपये को, ऐसे स्वीकारना, अपने आप में कई बातों को बिना कहे कह जाता है. उसका असमंजस, ऐसे प्रतिफलित होता है.

फिल्म दो. नाम इसका भी पता नही. दृश्य पहाड़ी नुमा. बोझ ढोती ट्रौली. बेताहाशा थके मजबूर मज़दूर. देख कर लगता है किन्ही व्यापारियों ने हाल फिलहाल ही उस जगह को ख़रीदा है या अपने कब्ज़े में लिया है. दोहन शुरू हो चुका है. इसी दरमियान उन शासकों- शोषकों की एक टोली अपने मौद्रिक लाभ को देखती भालती उस जगह का मुआयना करने जीप जैसी किसी गाड़ी पर आते हैं.

उसी थकी हारी ट्रौली पर एक अधेड़ उम्र का-सा सर पर पट्टी बंधे टूटे दांतों के साथ कमर में कमरबंद. बैठा है. मतलब उसकी तरफ से काम नही किया जा रहा है और न ही पोशाक से वे उन श्रमिकों सा दिख रहा है. उलटे मजदूरों की आँखे उसे आश्चर्य से देख रहीं हैं. शायद यह कि जिस सत्ता से वे कांपते हैं उसके सामने ऐसा प्रतिरोध. इस पर उन औपनिवेशिक शासकों का गुस्सा बढ़ता जाता है. और बातचीत में गहमा-गहेमी भी.

ट्राली वाला अपने को सोना चांदी चुराने वाला चोर कहे जाने पर जवाब देता है..'मैं तो सिर्फ सोना चांदी चुराता हूँ, तुम तो लोगों की ज़िंदगियाँ चुरा लेते हो ..' इसी दरमियान कमरबंद से बंदूक निकाल या शायद कुल्हाड़ी जैसा कोई हथियार होता है- उससे उनपर हमला करना चाहता है पर पहुँचने से पहले ही बंदूक की गोली उसे मार डालती है.

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