अक्तूबर 08, 2011

रोहतांग-केलोंग-बारलाचा ला से वापस

दो-तीन बैठकों में यह तय हो गया था कि किसे क्या काम करना है. टॉर्च, मेडिकल बॉक्स की हिदायतें. सबको ट्रिप के रोल कॉल नंबर दिए गए. कई कमेटियां बनीं. कोई ऐसा नहीं बचा जिसे कोई काम न मिला हो. एक तो ऐसे ही हफ्ते भर की लम्बाई चार दिन की कर दी थी पर जाना था तो गए. मेरे जिम्मे आया पूरे ट्रिप का लेखा-जोखा. मतलब 'रोहतांग-केलोंग-बारलाचा ला' से वापस आकर एक रिपोर्ट तैयार करना..

आठ अक्टूबर. शाम करीब साढ़े चार पौने पांच बजे के करीब. सत्ताईस सिटर डीलक्स बस एम.वी.सी.ओ.ई.[MVCOE] के गेट पर खड़ी हमारे व्यवस्थित होने का इंतज़ार कर रही थी. बैगों को लाल रिब्बन से बाँध दिया था और लगेज कमेटी के दो सदस्य एक-एक कर सामान को गिनते हुए डिग्गी में रखवाते जा रहे थे. हम लोग चार दिन की एक लम्बी सैर पर निकल रहे थे. हिमाचल प्रदेश..कितने दिनों से इस दिन का इंतज़ार कर रहे थे..वो दिन आज ही था..

हम कुल इकतीस थे. संजीव सर, ज्योति मैम, एक हमारी सीनियर. उनका नाम शायद अनु था. हमारी रसोई भी साथ थी और एक इनोवा कार भी, जिसमे तीन-तीन करके रोटेशन होने की बात थी. अंकुश अरुण के जिम्मे दो मयूर जग थे. मतलब पूरे सफ़र में पानी की व्यवस्था. भरे जग पीछे रखे जा चुके थे. सब अपनी-अपनी सीटों से चिपके बैठे थे. पीछे की सीटों का मोह इस बीच क्यों बढ़ा यह समझ पाता, इससे पहले ही किसी ने बजरंग बलि की जय का जयकारा लगाया और हमारी बस रेंगती हुई चल पड़ी.

एक बार जो बस चली है 'ऐनर्शिया की थियरी' आस-पास भी फटकने नहीं पाई. मजनू के टीले के बाद अन्ताक्षरी शुरू हुई पीछे की दो आगे की दो. एक बार डोर मिलने की देर थी की न मालूम अन्ताक्षरी ने जो उड़ान भरी वो नाचते-गाते दमशरा तक पहुँच कर कितनी बार दोहराई गयी. बस की खिडकियों के बाहर सड़क नापते-नापते रुके 'झिलमिल ढाबे' पर. खाना खाकर हम वापस बस में. रात जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थी, नींद सबकी आँखों से उतनी ही दूर थी. इंतज़ार था तो सिर्फ ज़ल्दी से ज़ल्दी मनाली पहुँचने का.

पर ऐसे थोड़े ही पहुँचने वाले थे? गोपाल जी को पीछे छुटना भी तो था! हुआ कुछ यूँ था कि हम सुबह का नाश्ता पंडोह डैम पर करने वाले थे पर पानी की अनुमति न मिलने के कारण बस डेढ़ दो किलोमीटर आगे के लिए चल पड़ी. गोपाल इन सबसे बेखबर टहलने में मसरूफ. पर पता नहीं किसकी छठी इन्द्री ने संकेत किया और बस रुकी. आगे कुछ नहीं हुआ ये कोई सोच भी कैसे सकता है?! आगे जहाँ रसोईये ब्रेड पकौड़े बना रहे थे, वहीं पहाड़ी पर कहीं किसी कीड़े ने दिव्या को काट लिया. दिव्या ने तो एंटीबायोटिक लगा निजाद पा ली पर संजीव जी के पर्यवेक्षण में प्रशस्ति के पूरे हाथ को ही सुरक्षा कवच से ढक दिया. इसके बाद जो बस चली, तो डेढ़ बजे मनाली पहुँच कर ही उसने दम लिया. पूरे रास्ते नदी सड़क के साथ चलती रही सिवाय पहले पड़ने वाली सुरंग के.

शाम पांच बजे-नौ अक्टूबर -खाना खाकर 'होटल शिवालिक' से हिडिम्बा मंदिर की ओर चल पड़े. चार-चार लोगों पर एक ऑटो. साढ़े चार सौ साल से भी पहले से लकड़ी का बना ढांचा आज भी चीड़ों से बात करता मालूम पड़ रहा था. और आदतन हम सबने ऑर्कुट फेसबुक के लिए 'पिक्स' भी बहुत उतारीं. वहाँ से पैदल लौटते हुए मॉलरोड को नापा और मन मुताबिक़ सामान खरीदने खाने में अपनी प्रखर मेधा का प्रयोग किया. लौटते-लौटते आठ बज गए. फिर रात का खाना और हमारा पहला गैट- टुगेदर कमरा नंबर चार एक एक में. रात करीब एक बजे अगली सुबह रोहतांग जाने के लिए सो गए.

एक रात बस में दूसरी होटल में तीसरी सुबह तारीख दस अक्टूबर . नाश्ते में आलू के पराठे और चाय. सवा नौ हम मनाली से चले तो ग्यारह बजे मढ़ी में थे. दोनों जगहों की खास बात शिलाजित केसर के फुटकर विक्रेताओं का अपने अपने कन्धों पर अपनी दूकान उठाये फिरना. अब यहाँ से जो सड़कों ने खुद को पुनर्परिभाषित करना शुरू किया तो पूरे रास्ते हमारा पीछा नहीं छोड़ा.

रोहतांग. रोहतांग की ठंडी हवाएं. ठंडी बर्फीली ठंडी हवाएं. इन झोंकों से प्रताड़ित हो हम कोकसर में इनोवा का इंतज़ार कर रहे हैं तो कहीं दूर-दूर तक उसका नामोनिशां नहीं. ऊपर बर्फ़बारी नीचे हवाएं. हम एक ढाबेनुमा जगह पर बैठे मैगी खाते-खाते हंसी के डोज़ भी ले रहे थे. चाय दूध के पाउडर की ही पूरे रस्ते मिलेगी ये भी पता चला. बजते-बजते पांच का घंटा बजा और विलक्षण बुद्धि-मति-प्रज्ञा का तीसरा नमूना हमारे खानसामों ने बस  की डिग्गी में पूड़ियाँ तलनी शुरू की.

यहाँ से चले तो गोंदला में होटल त्रिवेणी की गुत्थी सुलझाते-सुलझाते खुद ही उलझ गए. बड़ी कोशिशों पूजा प्रार्थना इबादत के बाद कहीं से कोई टावर टकराया और इनोवा से बातचीत के बाद हम पहले तांडी फिर केलांग(3348 मी.) के लिए चल पड़े. यहाँ होटल 'ताशी-द-लेक' के रूम में पहुँचते बिलकुल वही रिप्ले किया जैसे शिवालिक में किया था. माने कि कमरे में पहुँचते ही मोबाइलों के लिए सॉकेट ढूँढना फिर गीज़र का स्विच ऑन करना. तब जाकर पीठ सीधी करने के लिए थोडा आराम और लेते लेते ही पूरे दिन कि फोटुओं का विश्लेषण..

ग्यारह की सुबह इत्मीनान से उठे. बारालाचा ला, केलांग से तिहत्तर किलोमीटर दूर. हम साढ़े नौ बजे बस में बैठे और आधे घंटे बाद 'जिस्पा होटल आई बैक्स' के पीछे फैले विशाल पर्वत को निहारते मंत्रमुग्ध से उतर व्यास नदी के किनारे चल पड़े. फिर कब आना हो यही सोच सबके फ्लैश बटन क्लिक हो रहे थे. कारगिल ट्रांसिट कैम्प होते हुए बारलाचा ला पहुंचे. यहाँ तक आते-आते कईयों का दम फुल गया, तबियत जवाब देने लगी.

यहाँ फिर कुछ हुआ जो पहले हो चुका था, बस पात्र बदल गए थे. इस बार राकेश-राजेश वहीँ के होकर रह जाते अगर खिड़की के बाहर झांकती पर्वतमाला देखती आँखें दोनों को बस की तरफ भागते हुए न देख लेतीं..शुक्र है दोनों वापस आगये. यहाँ से जो चले तो साढ़े चार बजे दोपहर के खाने के लिए तम्बुनुमा ढाबे की शरण में पहुंचें. हवा के तो कहने ही क्या..??सबके चहरे लटके मुरझाये सड़कों से जूझते प्रताड़ित से कभी ऊपर कभी नीचे खातर पटर से नाराज़ से लग रहे थे. यहीं कहीं चावल खा पीकर केलांग साढ़े सात बजे पहुंचे.

चलिए अब शुरू करते हैं 'रैपिड फायर राउंड' आपको भी तो पता चले कैसे हमने तूफानी सफ़र पूरा किया!!..अगली सुबह, बारह/ दस/ दो हज़ार नौ/ सवा नौ बजे 'ताशी-द-लेक' से चेक आउट. सवा दस 'सिस्सू', झरने के पास. चार घंटे वहीँ. शाम सवा छेह पलछन, कोठी हवेली- दोपहर का खाना.

सवा सात मनाली, संजीव जी की भुतहा कहानियों का दौर और सात मिनट तक सुई पटक सन्नाटे का आग्रह. अगर हम मान लेते तो बस में हमारे अलावा और भी कई खोपड़ियां गिनती में आतीं. फिर शुरू हुआ हस्तरेखा विज्ञान. स्पेशल केस स्टडी मंजीत. रात आठ चालीस- 'रायसन नेचर नेस्ट ऐडवेंचर पार्क' के बाहर रुकी बस. विचार विमर्श की 'स्वर्गघाट' पर रात रुकें की नहीं. साढ़े बारह ढाबा 'साझा चूल्हा' हिमाचल परिवहन की बस में मोबाइल की सिरफुट्टवल कहानी का गोपाल द्वारा शान्तिपूर्ण अंत. रात ढाई बजे बिजली की तारों के चुम्बकीय क्षेत्र के कारण आती आवाजों का रहस्य को जान रात्री भोज.

नांगल सुबह छह उन्तीस. मतलब दिन बदला. तेरह की सुबह. पिंजौर, आठ पचपन. यहाँ से चंडीगढ़ बाईस किलोमीटर. साढ़े बारह, शिव डीलक्स ढाबा, 'पिपली' कुरुक्षेत्र. दिल्ली से एक सौ छियालीस किलोमीटर दूर..और इस तरह हमारी बस शाम साढ़े चार के करीब अपने कॉलेज के गेट पर थी. हम वापस आ गए थे, थके ज़रूर लग रहे थे पर आँखें मान ही नहीं रही थीं. हम वापस आये थे सैकड़ों पिक्स के साथ, कभी न भुलाई जा सकने वाली यादों के साथ..इनके साथ हमें  हमेशा रहना था..चलिए अभी बस इतना ही..यात्रा समाप्त..!!

दो साल बाद की तीन किश्तें: मनाली की पहली रातदिन अगला रोहतांग दर्रारात आख़िरी

2 टिप्‍पणियां:

  1. और अमित कैसे हो..??

    वो चार दिन तो बस तूफ़ानमेल थे. इतनी मुश्किल के बस. कभी कभी याद करते होश फ़ाक्ता हो जाते हैं. अभी भी कई बातें रह रह याद आती हैं..मनाली में पहला गेट टू गेदर, रोहतांग, होटल ताशी-द-लेक. उस शाम का कॉलेज कैसा अजीब सा आज भी अपनी तरफ खींचता है जब हम दिल्ली से चलने वाले थे..उसके पहले हुई मीटिंग..सब..कभी मौका लगा, मन हुआ तो लिखूंगा..तुम बताओ क्या सब हो रहा है इधर..

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