अक्तूबर 13, 2011

छद्म बहुभाषिकता और नव साम्राज्यवादी पाठ

बहुभाषिकता. इसे भाषिक विविधता भी कह सकते हैं. विविधता समता लाती है या विषमता? कैसे एक भाषा वर्चस्वशाली होकर दूसरी भाषाओँ को पदानुक्रम सोपान में नीचे धकेलती है. एक देश विशेष में भाषा विशेष कैसे इस स्थिति में पहुँचती है, यह देखना दिलचस्प होगा. और दिलचस्प होगा स्थानान्तरण, उपनिवेशवाद, संचार की वैश्विक क्रांति, भूमंडलीकरण, स्थानीयकरण और सीमांत आक्रमण की भूमिकाओं को पढ़ना.

और यह पढ़ना किसी एक दृष्टि-कोण-चश्मे से संभव नहीं है. न ही भाषा कनॉट प्लेस के सरवन भवन जाकर मैसूर मसाला डोसा या रवा केसरी खाने जितनी सरल है. राजधानी( गुजराती डायनिंग) पीवीआर रिवोली के सामने से उठ कर सिंधिया हाउस के.एफ़.सी. के पड़ोस में जा सकता है; पर भाषा वहां बैठकर गुजराती थाली का आर्डर देना भर नहीं है. न ही शिवाजी स्टेडियम की तरफ मैक डी की छोटी-सी खिड़की से फ्रेंच फ्राइज़ और बर्गर के लिए थोड़ी देर सॉफ्टी खाते इंतज़ार करना है.

भाषा भी एक प्रकार से जीभ का स्वाद है पर यह इतनी सरल रेखा में नहीं चलती. न ही 'मोमोस' की तरह हम यक-ब-यक उसे अपना सकते हैं. पर हाँ जलेबी, कचौड़ी, सोमोसे के अपदस्थ होने को हम भाषा के सन्दर्भ में जोड़ सकते हैं.

अनेक अध्ययनों से पता चलता है की बहुभाषिकता का संज्ञानात्मक विकास, सामाजिक सहनशीलता, विकेन्द्रित चिंतन एवं शैक्षिक उपलब्धि से सकारात्मक सम्बन्ध होता है. पर हमारी बहुभाषिकता का आलम यह है कि संविधान की आठवी अनुसूची, बीस बाईस भाषों को आधिकारिक स्वीकृत देती है. हज़ार पांच सौ के नोटों पर कई कई भाषाएँ अंकित हैं. भूगोल और सिद्धांत कुछ भी कहें; परन्तु हमारे देश की 1652 भाषाओँ में से केवल 47 भाषाएँ ही स्कूल में बच्चों की समझ का माध्यम बन सकी हैं. मतलब भाषाई अल्पसंख्यकों का उनकी अपनी ही भाषा में प्राथमिक शिक्षा का अधिकार धरातल पर औंधे मुंह पड़ा है. हमारी बहुत-सी खामोश भाषाएँ, एक ऐसी पहल के इंतज़ार में हैं, जबकि उनके दोनों होंठ मिलें और भाषिक जनतंत्र का स्थान बन सके.

उन्नीस सौ नब्बे की नवउदारवादी मुक्त अर्थव्यवस्था के प्रत्यय के मूर्त रूप में आने के बाद से स्कूलों में अंग्रेजी की मांग का विस्फोट हुआ क्योंकि यह समझा जाने लगा की अंग्रेजी जैसी वैश्विक भाषा से अच्छे अवसर मिल सकते हैं और यह हुआ इस भाषा के साम्राज्यवादी- उपनिवेशवादी स्रोत को भुला उसे अप्रासंगिक घोषित करके.

जबकि हम भूल नहीं सकते जब विभिन्न राष्ट्र स्वतंत्रता और समानता की शर्तों पर न मिल कर उत्पीड़क और उत्पीड़ित के रूप में मिलते हैं, तब उत्पीड़क राष्ट्र अपनी भाषा का इस्तेमाल उत्पीड़ित राष्ट्र में अपनी घेरेबंदी को और मजबूत करने के लिए करता है. अर्थात सैद्धांतिक रूप से बहुभाषिकता में उस राष्ट्र की अपनी आदिम नृजातीय समूहों की भाषाएँ हाशिये पर चली जाती हैं. उनका अस्तित्व सिर्फ उस राष्ट्र को मुद्रित रूप में तो बहुभाषिक देश तो घोषित करता है परन्तु व्यवहारिक पटल पर हम उन्हें यूनेस्को की खतरे की स्थिति वाली भाषों की मानचित्रावली में मरणासन्न अवस्था में देख पाने को विवश होते हैं.

यहाँ एक बात जो महत्वपूर्ण लग रही है उसे छोड़ा नहीं जा सकता के, भाषा सम्बन्धी द्वैधता उपनिवेशवादी के लिए ऐसा सांस्कृतिक संकट उत्पन्न कर देती है जिससे उसे कभी मुक्ति नहीं मिलती : दो भाषाओँ पर अधिकार का केवल यह अर्थ नहीं की उसके पास दो उपकरण हैं, बल्कि यह भी की व्यक्ति दो मानसिक और सांस्कृतिक परिवेशों में भागीदारी रखता है. यहाँ दो विश्व, जिनके प्रतीक और वाहन दो भाषाएँ हैं, सघर्ष में संलग्न होते हैं; ये दो विश्व क्रमशः साम्राज्यवादी और उपनिवेशवादी के हैं.

शिक्षा ही सांस्कृतिक साम्राज्वाद का दूसरा रूप है जिसने बहुसंख्यक लोगों को अपने जीवन में होने वाले बदलावों और प्रगति के स्वरुप को समझने और उन पर नियंत्रण करने में सहायता करने के बजाय चंद लोगों के हाथों में बहुसंख्यक लोगों के जीवन का नियंत्रण सौंपने का काम किया है.

इस बहुभाषिकता के पाठ में इधर एक विज्ञापन ज़रा हट कर इसे बतला रहा है जिसमे द इक्नॉमिस्ट अपने हवाले से चीन की एक खबर दिखता है, जिसमे वहां के वर्ग विशेष के बच्चों को हिंदी वर्णमाला सिखाई जा रही है. और अखबार हमारे लिए इसकी व्याख्या करते हुए कहता है कि अब चीन अपने ही देश से श्रम शक्ति को आयत कर भारत में स्थापित उद्योगों में लगायेगा.

इसकी आप अपनी व्याख्या करने को स्वतंत्र हैं, पर मैंने भी एक अर्थ यह निकला है की अब चाह कर भी एक भाषी राष्ट्र नहीं रह सकता. चूँकि खुले व्यपार ने कई-कई रास्तों को खोल उसमे अपने उद्योगों के लिए जोकी उनके अपने देश के भूगोल में नहीं हैं पर अपनी पूंजी अपने ही देश में रखना चाहता है. मतलब आपको चोर रास्ते से इस पूंजीवादी समय में दूसरी तीसरी भाषा को अपने अधिकार क्षेत्र में लाना ही होगा. और आप इसे नव साम्राज्यवाद का एक और अध्याय भी कह सकते हैं.

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