अक्तूबर 16, 2011

और कहानी ख़तम..

शाम पन्ने पलटते वक़्त दस अप्रैल दो हज़ार का लिखा मिला. चार दिन पहले की दोपहर नागतीहल्ली चंद्रशेखर की कन्नड़ कहानी का हिंदी रूपांतरण दूरदर्शन पर दिखाया गया था. उसी कहानी को पूरा लिख मारा था. आज उसी का संशोधित संस्करण.

कहानी थी भारतीय स्वाभाविक बेरोजगार की. बेरोजगार है, तो मतलब पढ़ा लिखा होगा, इस पर संशय बना रहता है. एक दिन ऐसे ही भटकता भटकता एक सब्जी वाले के यहाँ नौकरी मांगने पंहुचा. उस सब्जी वाले ने नौकरी तो नही, पर अपने ही घर पर, एक किराये का कमरा दे दिया कि यहाँ रह नौकरी ढूंढ़ सकता है. कमरा किराये का था. मतलब आय होने पर किराये का भुगतान.

अब उस घर के सदस्यों की संख्या कुल मिलकर तीन हो जाती है. थोड़ी-थोड़ी अनिल कपूर की 'वो सात दिन' की याद ज़रूर आती है पर यहाँ का नायक सब्जी वाले की बेटी से छिप-छिप'बिना बल्ब वाले कमरे ' में मिलता रहता है. कभी कबार दोनों,  नायिका के पैसे से फिल्म भी देख आते. नायिका न तो जेआरएफ़ होल्डर थी, कि दिल्ली विश्वविद्यालय से उसकी एम.फिल. चल रही होगी और न वो मैसूर विश्वविद्यालय से कुछ कर रही थी, जिसके चलते 'उसके पास पैसे हरदम रहते ही होंगे ', मान लिया जाये; फिर भी वह उसके सारे खर्च को वहन करना चाहती थी; और काफी हद तक करती भी थी.

कहानी क्या इतनी सपाट होती है कि बस चलती रहे. नहीं ऐसा होता नहीं है. एक शाम नायक को उसके कभी बनाये गए गुरूजी मिल जाते हैं और शादी के चक्कर में ज़िन्दगी बर्बाद न करने की हिदायात देकर चलते बनते हैं. बिन रीढ़ का नायक उसी रात गुरु आज्ञा पालन करते हुए सब्जी वाले के यहाँ से उसकी लड़की को छोड़ भाग खड़ा होता है. ये बात अलग है कि उसके वही परमज्ञानी गुरूजी जिंदगी के किसी मोड़ पर अपने भरे पूरे परिवार के साथ इस नायक से सपत्निक टकरा जाते हैं. उसे संस्कारित आत्मग्लानि जैसा कुछ होता है और उम्र के इस पड़ाव अपनी उसी नायिका को यादकर फिर किसी ताक़ में लग जाना चाहता है.

लगता है कथाकार उसे दूसरा मौका देना ही चाहते हैं. अचानक इतने बरसों के बाद उसके पास नायिका का ख़त पहुँचता है. मजमून इतना कि वह उसे जल्दी वापस आने को कहती है और लिखती है उसी 'बिना बल्ब वाले' कमरे में मिलेंगे. हमारे नायकों को और क्या चाहिए स्वयं को तुष्ट करने के अवसर. वह तत्काल पहुँचता है. वहाँ नायिका अपने हिस्से की कहानी एल्बम के ज़रिये बतलाती चलती है कि कैसे उसके जाने के कुछ महीने के बाद ही उसकी शादी एक संपन्न परिवार में करा दी जाती है. पर काल का पहिया कुछ ऐसा घूमा कि कोर्ट कचहरी के चक्करों में परिवार वाले ऐसा फंसे कि कंगाल होकर रह गए.

अब इस तीसरे बच्चे के जन्मने में केवल चार-छह दिन शेष रह गए थे कि उसके ससुराल वालो नें खर्च करने में असमर्थता जाता कर यहाँ मायके भेज दिया है. 'और तुम तो पिता जी के जाने के बाद घर की हालत तो देख ही रहे हो'. इन सब ब्योरों के बीच नायिका वह डायरी भी ले आती है, जिसमे नायक के कहने पर ही उसने सारे व्यय सारे खर्च सारे लेनदेन को लिख रखा था. उस समय तक चार हज़ार छह सौ रूपये का हिसाब बनता था. नायिका कहती है तुम ऊपर का छोड़ दो तो बाकी चार हज़ार तो दे ही दो..और कहानी ख़तम हो जाती है.!!

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