अक्तूबर 22, 2011

पट्टे की रूपक कथा का एक पाठ

इतने दिनों कागज़ पर कुछ न लिख पाने की छटपटाहट पता नहीं किन सवालों के चक्कर काटती रही. खुद इसका इतनी नीचे दब जाना और न उठाना, सब अजीब सा किये देता है. क्यों नहीं लिखा गया उसका कारण समय न मिल पाने के साथ उन जटिल होती जा रही औपचारिकताओं में भी छिपे हैं जहाँ खुद को लोग हमारा ग़ुलाम नहीं मान भाग जाते हैं. जबकि गुलामी की रकम लाखों में जाती है. सुबह से शाम की नौकरी बजाने जैसा अनुभव रात को सोते समय उसके बाद सपने में भी नहीं आता-नहीं आ पाता. कुछ सोचे समझे जाने लायक न रख पाना उसमे समरूपता के ढर्रे को ही पुख्ता करते हैं, जिस फैक्ट्री में 'फिट' बनाये जाते हैं 'मिसफिट' नहीं.

पट्टे के पहन लिए जाने के बाद के बदलावों में कटखनापन कम होकर पालतूपने में बदल जाने की रूपक कथा में कई-कई बिम्ब आगे पीछे दुम हिलाते रहते हैं. कुछ काटना भी चाहते हैं पर हम बिना दुम हिलाए अपनी औकात में ही सोचने समझने की काबिलियत को बचाए रखने के द्वंद्व से जूझते रह सकने की कोशिश में हैं.

साफ़ साफ़ न लिख पाना किसी भय के कारण छिपाया नहीं जा रहा बल्कि उसकी अमूर्तता में अंतर्क्रिया को समझने की कोशिश है जहाँ पैरों की थकान पीठ के रस्ते दिमाग तक पहुँच सुला देती है, सुबह उठकर फिर वही दिमागदार तीमारदारों की छाया में.

पूरी प्रक्रिया कबीलाई लड़ाई से बच पाने की जद्दोजहद है जहाँ छोटी छोटी अस्मिताओं के चंगुल से-में फंस जाना कहीं भी लक्ष्य नहीं रहा. कुछ देर का हो हल्ला उन्ही किन्हीं लाल दीवारों में कुछ वक़्त बाद दबा दी जाये, उससे अच्छा होगा, उन्हें उन्हीं के औजारों की भाषा में समझाया जाये. अपने पास उन नुकीले दाँतों हथियारों को मांजा पोंछा जाता रहे. अपने को सबल बना कर संस्था के संस्थानीकरण को धवस्त किया जाये. पहले काटने की योजना पर रेबीज़ के टीके के साथ समाप्त हो गयी थी. इसका प्रभाव कुछ ज़यादा रहने की उम्मीद है. कोशिश यही रहेगी की हमारे पास ताला चाभी दोनों हों.

भले समय लगे पर पैनापन ही इस तरह की किसी वैचारिक संघर्ष में निर्णायक होगा. सत्ता के साथ मद का प्रमाद उतारने के लिए विकल्पों के रूप में खुद को स्थापित कर पाना इतना आसान नहीं. कोई कुछ भी कहे सुना जायेगा पर किसी त्वरित टिपण्णी टीका से विचलित न होकर मानसिक प्रकलपों पर उन्हें ऐसा रचा जाये, बुनावट जितनी जटिल होगी उससे उतना ज़यादा उलझाया जा सकेगा. इसकी पहली रीडिंग पहला पाठ किसी वैचारिक युद्ध के घोषणा पत्र की आत्मशलाघा सा न किया जाये. यह जितना बाहरी है उतना ही आंतरिक भी.

{बस ऐसे ही किसी दिन का पीछे का पुराना पन्ना}

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आवाज़ें..

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...