अक्तूबर 26, 2011

सांस्कृतिक कूटपद और दीपावली का विखंडित विचार

बचपन में जिस दिन का सबसे ज़यादा इंतज़ार रहता था आज दिवाली सिर्फ एक दिन बन कर क्यों रह गयी, समझ नहीं आता. उसके बीतने के साथ उन सारे तंतुओं का अन्दर तक झंकृत न कर पाना अजीब सा एहसास है जिसके लिए अभी कोई शब्द आसपास नहीं मिल पा रहा. आज की रात खिड़की बंद कर धुंए और आवाज़ से बचने की ज़द्दोजहद में बीतने लगी है और अगली सुबह पटाखों के कूड़े के बीच से गुजरते पैरों के साथ.

अगर संस्कृति अपना पुनरुत्पादन करती है समाज के स्थायित्व के लिए वह सबसे ज़रूरी जैविक कारक है तो ऐसा क्या हुआ के मैं इस तरह आज कमरे में बैठा लिख रहा हूँ. क्यों नहीं किसी अमीर से बाज़ार की ऊँची दूकान में अपने हिस्से की खरीदारी कर रहा. इस मौसम में तो पूंजी का प्रवाह अपनी आवारगी की हद तक जाता है. बेचारा सर्वहारा भी इधर पूंजीपत्नी की स्तुति  करने में एड़ी-चोटी का जोर लगा डालता है.

वापस ऊपर लिखे पर चलते हैं कि अगर संस्कृति अपना पुनरुत्पादन करती है और समाज के स्थायित्व के लिए वह सबसे ज़रूरी जैविक कारक है , तो वह उसके लिए संघर्ष भी अपने तरीके से करती है. उसे अपने सारे सांस्कृतिक चिन्ह-प्रतीक-बिम्ब-रूपक कूटपदों में बदलने पड़ते हैं. यह दुतरफे सम्प्रेषण की भांति काम करता है; कोडिंग डीकोडिंग. संस्कार-रीतिरिवाज़-परम्पराएँ-त्यौहार ऐसे ही सबसे सशक्त सांस्कृतिक कूटपद हैं, जिन्हें विखंडित कर आसानी से उस सांस्कृतिक क्षेत्र में घुसपैठ की जा सकती है. पर इन कूटपदों के विखंडन की प्रक्रिया इतनी सरल रेखा में नही चलती.

प्राथमिक समाजीकरण हमारे अन्दर परिवार नामक एजेंसी के माध्यम से इन कूटपदों को भरता है, उसके अर्थों के साथ. और इन्ही प्रतीकों को जब पूंजीवादी माध्यम इज़ारेदार कंपनियों के लिए हमारी तरफ संप्रेषित करता है, तो हमें उनसे जुड़ जाना स्वाभाविक क्रिया लगती है जबकि वह योजनाबद्ध तरीके से आपको अपनी झोली में लपक लेते हैं. भरी हुई जेब के साथ. मतलब, 'जब आप, कोई 'शुभ ' 'काम ' करने 'जा 'रहे हों, तो 'दही' का स्थानापन्न, किसी विदेशी कंपनी की 'चॉकलेट 'को हो जानी चाहिए '. यहाँ एक एक शब्द पर ज़रा थोड़ी देर रुक कर गौर करिए और उन्हें सुनने की कोशिश करिए कौन से सांस्कृतिक पद कान में पड़ें..

अब थोडा ऐंगल बदलते हैं और खुद उस संस्कृति के भीतर चलते हैं. यहाँ मिठाई ऐसा ही एक और डीएनए है. दिवाली के समय में ही सबसे ज़यादा मिलावटखोरी की ख़बरें छाई रहती हैं. इसे सवाल की तरह भी पूछा जा सकता है, कि जो माध्यम इसकी मार्केटिंग नहीं करते वे इस जातीय स्वाद की मार्केट वैल्यू पर पलीता किसी छिपे एजेंडे के तेहत तो नहीं करते. जबकि सोपनीय क्रम यहाँ भी है कलेवा-हल्दीराम-नत्थू राम की मिठाइयाँ अपनी शुद्धतम अवस्था में पूरे साल बनी रही हैं.

पर जो बात छूटी जा रही है वो यह है, के, मिलावट को सिर्फ मांग पूर्ति की अर्थशास्त्रीय दृष्टि से देखना एकांगी होगा जबकि वहां संस्कृति अपने अस्तित्व की लड़ाई भी लड़ रही होती है. उसे हमेशा नुक्कड़ की दूकान पर बने रहना होगा. वह अपने को दोहराती रहना चाहती है. वर्ना जैसे चाय के साथ पार्लेजी बिस्कुट अपनी अनिवार्य उपस्थिति के साथ मौजद रहता है पोहा भी ज़लेबी की जगह किसी को ढूंढ़ लायेगा ..इसे दूसरी तरह देखें तो पश्चिम बंगाल में आज तक रसोगुल्ला, सन्देश, पीठा, फिरनी वहां की मिठाई की दुकानों पर पाए जाते हैं.

सिर्फ इतना ही नहीं हर साल जितने भी बच्चे पटाखे बनाते हुए विस्फोटों में मारे जाते हैं वे भी अपना योगदान इसी पुनुरुत्पादन में देते हैं. यह वाला चित्र थोडा हिंसक किस्म का लग सकता है, पर उसके संशोधित संस्करण जहाँ दीपावली का मतलब आतिशबाजी करना है वहां इस भूमिका से बचा नहीं जा सकता है. और आप भी उनमे हैं तो ख़रीदे हुए पटाखों में दो-चार बच्चों की ज़िन्दगी भी जोड़ लीजिये. पता नही हम इस कीमत पर खुद तो रोशनी कि तरफ जा रहे है पर उस उजाले की चकाचौंध में कुछ भी देख पाने में असमर्थ हैं.

यहाँ सवाल मेरे खुद के लिए है कि बचपने की उन यादों के गहरे धंसे होने के बाद भी आज मेरे सामने इस दिन को ऐसे बिताने के सिवा कोई और विकल्प सामने नहीं दिख रहा. यह भी नहीं समझ पाता की ये दिन और दिनों से किन सन्दर्भों में अलग है. उन मिथकीय उपाख्यानों की परिधि में इसे न कल देखते थे न आज. महर्षि दयानंद के निर्वाण दिवस पर रामलीला मैदान जाना कब का पीछे छूट गया. एक वार्षिक सफाई अभियान शुरू होता था वो इधर कई सालों से सफेदी न होने के कारण नेपथ्य में चला गया है..आज सिर्फ किताबों के शेल्फ को व्यवस्थित कर काम तमाम. ले देकर चीनी बल्बों की लड़ियों के साथ, दिए जला, रात छत पर दूसरों की आतिशबाजी देखना बचा है..

{यह पोस्ट 'जनसत्ता' में 'सांस्कृतिक कूटपद' शीर्षक के साथ दो नवम्बर को प्रकाशित हुई जिसे आप इस लिंक पर भी पढ़ सकते हैं} 

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