नवंबर 12, 2011

एक उदास होती गर्म सी दोपहर

मैंने तुम्हे बोला. तुमने सुना. फिर सबने सुना. फिर मैं न बोला. न तुम बोली. न मैं मिला. न तुम ही मिली. शायद उस 'देख भर लेने का भाव ' दोनों तरफ हो कि..!! पर परसों के बाद यह भी नहीं हो पायेगा. तुम कहाँ, मैं कहाँ?? उन बेज़ार दुपहरी तिपहरी में आगे के सपनों को बुनने की कोशिश में नींद के हवाले सब कुछ कर उन बोझिल से हो गयी घड़ियों को काट देने की फिराक में होंगे..

पेपर तो बस 'बाय द वे '  होते जा रहे हैं उनके लिए वहां कमरे में जा उल्टा टांग देने की पद्धति. अपने उस अस्तित्व को न देख पाना ज़यादा पीड़ादायक है. सपने देखना भले वो दिवास्वपन जैसी अबूझ शब्दावली में हों पर उनका होना ही बहुत है. हरारत से भर देता है. शायद उसके आगे हम सब खुली आँखों से ही देखते हैं और चाहते हैं वैसा ही कोई होता जो हमारे साथ होता कुछ उसका कुछ हमारा चित्र उभरता उसमे कुछ भी व्यक्तिक न होकर हम दोनों का होता.

क्या कुछ ऐसा चाह लिया था जो पूरा नहीं हो सकता था. कर्म के बाद फल की गीतामयी व्याख्या सर्वहारा को चूतियाटाइप्ड कर मूर्ख सी बनती जान पड़ती हैं..समझ नहीं आया न क्या लिखना चाह रहा हूँ. कल मैं भी नहीं समझ पाया था की क्यों उस वाचाल मंडली को छोड़ यकायक आई मेट्रो की तरफ चल पड़ा. बिना आखिरी दिन की अभिवादन परंपरा को निर्वाहित किये.

शायद पता भी है..की थोड़ी देर में..नहीं लिखना चाहता..

उस दिन के बाद अगला दिन कैसा होगा, सोच नहीं पा रहा हूँ. सारी संभवानाएं धूमिल हो चुकी होंगी, बस छद्म पंक्तियाँ लिख अपने आप में घुटता सा कोई और रूप आएगा या इसी लिखने से भी पलायन कर कोई और रास्ता खोज निकालूँगा..अकेले..!

यह अकेले हो जाना इसलिए भी कुछ खटकता सा मालूम पड़ता है..कोई स्पष्टीकरण नहीं..क्या सब कुछ लिखने के लिए बाध्य हूँ??

कल थोडा छदामी सा दार्शनिक सा भाव हावी हुआ जो पलायन के चरम तक नहीं पहुच पाया की जब सबको पता ही है अंततः किस परिणति को यह शारीर प्राप्त होगा तो सामजिक भय लोक लाज झिझक उस जीवन को सुगमता से बाधित गड्डमड्ड  रास्ते की और ले जाते हैं तो उसे छोड़ना ही ठीक होगा..गाहे बगाहे इस कुचक्र में फंस खुद को ऐसे मरते देखना भी जीवन से पलायन है. उस जीते हुए जियो और काबिल बनाये रखो..

उस दिन तुम्हारे पास जाने का कोई कारण खोजे नहीं मिल रहा फिर भी लगता है ऊपर का नुक्ता जोंक की तरह चिपक सा गया है. सूरज का सातवाँ घोड़ा और उसके तन्ना की परिणिति  को कोई प्राप्त न हो यही सोचे जा रहा हूँ..पता नहीं अभी बी उन स्पंदनों में तन्ना की त्रासदी को महसूस कर रहा हूँ..जमुना का जमुना हो जाना..माणिक मुल्ला का सत्ती के पीछे चले जाना, कभी लौट कर ना आने के लिए. सब्कुक संजीव जी की शब्दावली में हमको अटका सा देता है, त्रिशंकु वाली स्थिति ..कुछ फँसे से..उटपटांग से भाव..संवेदित संवेदनाएं.

इस सबके होने का एक मात्र कारण उस कुछ हो जाने' के बाद कुछ ना हो पाना' है. और जिसकी अंतिम कॉलेजी सम्भावना परसों है..कुछ कर पाउँगा..शायद हाँ..पर पता नहीं क्या..देखते हैं..

मैं तो फ़राज़ की तरह ये भी नहीं कह सकता..
रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ 
आ फिर से मुझे छोड़ जाने के लिए आ

कुछ तो मेरे पिन्दार-ए-मोहब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए आ

अब तक दिल-ए-ख़ुशफ़हम को तुझ से हैं उम्मीदें
ये आखिरी शमएँ भी बुझाने के लिए आ.          

2 टिप्‍पणियां:

  1. वे सब कहीं न कहीं अपने अंदर इन एहसासों को महसूस करते हुए थोड़े और नज़दीक आ जाते हैं।

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    1. इतनी पुरानी पोस्ट पर किसी पहुँच जाना, बहुत अजीब सा अनुभव है। पता नहीं कैसा?

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