दिसंबर 15, 2011

उसी किसी दरवाजे पर..

थकान किसकी है ??

दिन भर भाग दौड़ की, न सोने की, न पढने की, न सोच पाने की, न जल्दी घर आ पाने की या इन सबको थोडा थोडा मिलकर सबकी ?

बीते कई दिनों को जोड़ यही सब चल रहा है. माथे पर उलटे हाथ की हथेली रखकर यह लिखते हुए, ज़यादा चलने के बाद पैर में दर्द जैसा एहसास है.

अपने आप को दोहराना और बार बार उन्ही के बीच फंस जाना. एक पैटर्न देखें तो रह रह कर उन्ही कोनों में अपने को पाता हूँ जहाँ से दिख पड़ने का कोई डर नहीं रहता. सोचने के लिए उत्प्रेरक जैसा कुछ काटने को होता है.

कभी-कभी ऐसा नहीं होता जब हमें अपना दिमाग भूसे से भरा लगने लगता है. लगता है मानो हवा में उड़ना तो चाहता हूँ, पर नीचे कुछ है, जो वापस बुला लेता है. कुछ सोच पाने जैसा आस पास हो ही नहीं जैसे. लगता है किसी ऐसे प्लेटफॉर्म पर जा पंहुचा हूँ जहाँ से दो चार महीने पहले कोई सवारी गाड़ी गुज़री थी. नाक की तरह दिमाग भी बंद हो गया हो जैसे. मुह से सांस ली जा सकती है है पर दिमाग के पास ऐसा कोई विकल्प नहीं दिखता.

बीते दिनों को सिरे से पकड़ कर सुलझाऊं तो कहीं कोई ऐसा दिन नहीं मिलता जब घर पर शाम देखी हो. शाम की घड़ियाँ अपने आप में ऐसे क्षण हैं कि दूर से पकड़े नही आते. उन्हें छूने पास जाना ही होगा. उस वक़्त का रंग और डूबता सूरज आसमान पर गीले रंग हैं जिस पर उंगलियाँ फेरने का मन करता है..

और इन सब दरमियानों में कोई किसी के कानों में चुपके से कुछ बोल जाये और उसे बार बार दोहराने का का मन करे. बार बार उन्ही सबको देख भर लेने की खवाहिश अपने आप में किसी सपनीली सी दुनिया के मुहाने पे ला छोड़ती है..उसी किसी दरवाजे पर दस्तक दी है मैंने..

(फोटो  brushstrokesbykc.blogspot.com से)

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