दिसंबर 20, 2011

अनुभूति अभिव्यक्ति और जिंदा साओ

शनिवार 17/12/2011. सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन {सीआईई } दिल्ली विश्वविद्यालय.

फाउंडेशन वीक (स्थापना दिवस सप्ताह) में राजीव लोचन आ रहे थे. कानों ने पहली बार सुना. नोटिस बोर्ड पर परिचय था नैशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट (एनजीएमए) के निदेशक. बीए के ज़माने से जयपुर हॉउस के आगे से M-13 गुज़री..न जाने कितनी बार इण्डिया गेट किसी न किसी से मिलने घूमने पहुंचे, पर उस गली जा न सके..आज खुद कोई वहां से आ रहा था इसलिए रुका रहा और रबीन्द्रनाथ की कलाकृतियों और आधुनिकता पर सुन वहां से आने के बाद पहली अभिव्यक्ति..

अनुभूतियाँ जैसी अनुभव होती हैं उन्हें वैसे ही अभिव्यक्त कर पाना. इसके किये माध्यम क्या हो?  गीत-संगीत..रंग कूची.. भाषा..उसके कलारूप..?? भाषा जैसे-जैसे आगे बढती चलती है अपने पीछे कई जगहों पर खाली स्थान छोड़ते चलती है, जिसे समानुभूति विज्ञ अपने से भरता चलता चले. पर इतना आसान न उस अनुभव को लिख पाना है न पढ़ पाना.

जो जैसा है उसे वैसा ही प्रस्तुत कर देना किसी भी रूप में कला नहीं उसका पुनरुत्पादन कर देना भर है. मतलब जैसा मुझे लगा वैसा ही तुम्हे लगवा सकूं यह कला की प्रक्रिया का क्रियात्मक स्वरुप है. सतेन्द्र के चित्र में चिनार के जंगल एक ऊँचाई पर गुरद्वारे में बदल जाते हैं तो उसके सामानांतर वही चिनार के पेड़ गिरजाघर भी बनते हैं. बीच की जगह दो लोग, स्त्री-पुरुष खड़े हैं. उनके बीच कुछ था जिसे बार-बार रबर से मिटने की कोशिश की गयी थी पर उसकी छाप जा न सकी थी..वहां शायद कोरल जैसा कुछ था..

बच्चा मोना सरदार था. माँ स्वित्ज़रलैंड की थी. चित्र में मिटा हुआ कोरल राजीव पकड़ लेते हैं..उसके परिवार की स्थितियां कला के इस रूप में सामने आती हैं..उसने जो जो अनुभव किया उसे उतरा..वह अपनी माँ के साथ यहाँ से चला भी जाने वाला था, पर अंततः आत्महत्या ही उसे रास्ता लगती है इस जीवन से भाग जाने के लिए..उसके पास उस अपने महसूसे यथार्थ को व्यक्त करने की अपनी भाषा थी.
पर दृश्यों अनुभूतियों को हू-ब-हू उतारने वाले महान चित्रकार या भाषाकार नहीं होते उसे हम महसूस कर अपने हिस्से का सच बना उस यथार्थ को महसूसे, यही उनका कौशल उनकी निपुणता है. उन जीवित स्पंदनों श्वासों रोम छिद्रों से गुज़रती हवा हमें भी छू कर निकल जाये तभी उसका कोई अर्थ है.

अन्यथा फोटो खीचने वाला कैमरा करता क्या है. यदि ऐसा न होता तो हर फोटोग्राफर रघु राय हो जाता. हम अपनी समस्त इन्द्रियों से उसके जगत के आर पार हो पाने में खुद को सक्षम करें. हमारे सपने और वहां आती जाती छवियाँ क्या वैसी ही होती हैं जैसी वे इन आँखों से दिखती हैं? शायद नही. वह आभास देती हैं वह हमारे जमा खाते कि दुनिया है. उस जैसी अनुभूतियाँ और उस जैसा अनुभव हमें वहां होता है उसी तरह कब हम इस सबको महसूस कर पाएंगे.

मैं भी किसी जिन्दा साओ कि तस्वीर बनाना चाहता हूँ जिसके दिल कि धडकनों को उसके सांस लेते फेफड़े नसों में बहता खून देख पाऊं. वह हू-ब-हू नक़ल नही होगी, उसमे मेरे जीवन का कुछ हिस्सा भी होगा. मेरे हाथ सिर्फ रेखाएं नही खींच रहे होंगे, मैं अपने विस्तार की तरफ बढ़ रह होऊंगा..छाया की परछाई न पिली होगी न मेरा ध्यान उनकी दैहिक भंगिमाओं पर होगा. मैं वही सब खींचना चाहता हूँ जो मैंने महसूस किया..

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