जनवरी 22, 2012

डायरी का एक पन्ना

इधर न लिख पाने के किसी एक कारण को ढूंढ़ नही पा रहा..कोई एक है भी नही..!! जब खाना खाते हुए थकान जबड़ों तक महसूस होने लगे तो समझना चाहिए कुछ मशीनरी में गड़बड़ है. और इस साल के बीस बाईस दिन बीत जाने के बाद यही भाव कुछ इस तरह हावी हो गया है कि खुद अपने से भी बातचीत बंद सी है.

बस में किसी खिड़की से बाहर झांकते मन भी नही करता कि उस चलते फिरते हाडतोड़ जीवन को न देख अपने रुके थमे से कोनो में आवजाही की जाए.. मेट्रो कुछ-कुछ मशीनी लोगों को ढोने का काम करती सी लगने लगी है, जहाँ गाडी की गति की दिशा में एक डब्बा स्त्रियों के लिए है और लड़कों की विशिष्ठ शब्दावली में वह किसी 'माल' गाड़ी' से कम नही..खैर, इस सुख को प्राप्त करने की भी कोई इच्छा नही करती. सुरंग से गुज़रते एमटीएनएल के गायब सिग्नल की तरह दिन पकड़ में नही आ रहे..हर सुबह घडी से रेस सी लगती है और मेरे जीतने का अनुपात कम होता जा रहा है. कोई खास कोशिश करने का मन इसलिए भी नही होता क्योकि कुछ भी कर लूँ वहां से इतनी ज़ल्दी नही लौट पाता की कुछ देर अपने लिए निकाल सकूँ..

जितने सामजिक लगने की कोशिश में बैठकें मुझे वहीं रोके रहती हैं उतने ही कई और काम टलते-टलते इक्कठे होते जातें है. उनका बोझ मेरी चाल को कुछ धीरे कर रेंगने पर मजबूर कर देता है..'सब काम होंगे' जैसे आदर्श नियतिवादी वाक्य बराबर दिमाग की दीवारों से टकराते जाते और घड़ी के कांटें चार छेह बार अपने चक्कर घूम चुके होते और इंतज़ार करते खाने के बर्तन भी ठन्डे पड़ जाते हैं..बाहर के मुकाबले घर की चारदिवारी में कम पाया जाना माँ के तानों में बराबर मौजूद है. लेट हुआ नही कि चांदनी चौक से लेकर अरुण के यहाँ रुक जाने, कचौड़ी गोलगप्पों की बातें तैरने लग जाती हैं..और किसी दिन जल्दी आ भी जाने पर मैं मिस्टर इण्डिया की तरह जैसे घर पर दिखाई ही नही देता हूँ.. फिर अगली रात आएगी और देर आने पर वही सब होगा..

बहुत कुछ लिखने की सोचता हूँ पर लिखूं कब..इमोशनल अत्याचार लगने वाली क्लासों में दायें बाएं कुछ लिख कर उस उस खालीपने को भर नही पा रहा..कभी कुछ देर बीतते जाते दिनों को देख ठहर पाना उस चुकते सरप्लस की तरह है जहाँ पूंजीपति अपनी सारी पूंजी जुआरी बाज़ार दलाल स्ट्रीट में लगा किसी अप्रत्याशित लाभ की कल्पना करने लगे..पता नही कैसा रूपक-मिथक है..शायद दिमाग के पैदल चलने लगने की यही कोई निशानी हो..

जिस स्थिति में इधर पहुच चुका हूँ वहां प्रतिबद्धता पतझड़ के पत्तों की तरह या तो झड़ चुकी है या इस हाडकांप ठण्ड में कहीं किसी कोने में रजाई ओढ़े पड़ी होगी और दिल्ली सरकार का पंद्रह रुपये वाला जनाहार भी उसे नही मिल पा रहा, वरना ऐसा होता ही नही कि कोई खुराफात न कुलबुलाती..इसे एक चश्मे से देखने पर जो परम सत्य ज्ञान प्राप्त हुआ वहां का दृश्य कुछ ऐसा है, जहाँ, यह समरूपता का काल चाहता भी यही है कि कुछ सोचा समझा न जाये, कोई दिमाग चलाये भी तो उसका शीघ्र बौद्धिक वीर्यपात हो जाए..मेरठ बागपत गाज़ियाबाद बदायूं की रेल की पटरियों के साथ-साथ चलती दीवारें तो इन समस्याओं के लिए जुमेरात आने का सुझाव दे किसी हाकिम लुकमान तक पंहुचा भी देती हैं पर दिल्ली की सूनी दीवारों पर ऐसा कोई नज़र नही आ रहा..

 उस दिन शीशे में देख कर अपने को ढूंढ़ रह था कि जो दिख रहा है उसमे से मैं कहाँ हूँ..क्या चेहरा भर मेरी पहचान है जो सामने दिख रहा है या उस देह को ढके कपडे मेरे होने को मेरा बनाते हैं..बड़ी देर तक आँखें खोजती रहीं पर उन कुछ मिनटों को अभी तक सुलझा नही सका हूँ..उस आदमकद आईने में थोबड़े के पीछे का कुछ भी नही देख पा रहा था..आँखें आँखों के आर पार देख पातीं उससे पहले ही दरवाज़े पर कोई आया और मैं खुद से बाहर आकर अपने को संभालने की जद्दोजेहद में लग गया..बड़ी देर तक लगता रहा कुछ वहीँ टॉयलेट में उस शीशे के सामने छूट गया..उसे उठाने वहां कई बार गया पर वो मिला नही.. 

बार बार लगता है किसी गवईं खड़ंजे पर अकेले दौड़े जा रहा हूँ..एक साथी भर भी नही है जो झूठ ही सही, पूछे तो, कैसे हो..?? जब ये सवाल भी खुद ही पूछना पड़े तो समझ लें कि संकट बिकट है, एकांत का चरम है और किसी मित्र की अति शीघ्र ज़रूरत है जो कि स्त्रीलिंग हो..और इस अंतिम वाक्य पर किसी स्त्रीविमर्श के पुरोधा को कलम चलाने के किसी भी अधिकार से अपदस्थ करता हूँ..

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