फ़रवरी 07, 2012

जहाँ के हम मेहमान होंगे..

इतने दिनों की भागदौड़ रतजगों के बाद अबकी बारी है फिर से किसी नए रोजाना को तलाशने की. बिना उसके बेतरतीब आगे बढ़ा नहीं जा रहा. देह इतनी थकी-थकी बुझी-बुझी सी है कि उसकी प्रतिक्रिया अब अपने सोने के समय दखल दे रही है.

भूख सुबह की पाली में लगातार चावल को देख वैसी नहीं रहा गयी जैसा उसे रहना चाहिए था. दोपहर यहाँ इस कमरे से बाहर निकल कर नेगी जी की कैंटीन में इमली मिला सांबर और दो छोटी-छोटी इडली हो या बड़ा खाकर पेट के किसी कोने में भूख दबी अगले घंटों में किसी नयी चीज़ का इंतज़ार कर रही होती हैं. पर लेदे कर वही ढाक के तीन पात. चांदनी चौक दरीबे की कचौड़ी खाए जमाना हो गया. यहाँ वापस या तो दाल चावल होगा या खिचड़ी का कोई वर्ज़न. अगर यह भी नही हो पाया तो वापसी होते होते फोन घरघराने लगता है और दूसरी तरफ से लौटते हुए गोल मार्केट वैष्णो ढ़ाबे से दाल मखनी पीली दाल या कढ़ी और बैगन भरता लेकर साथ आने की सूचनात्मक आवाज़.

इस एक जैसी भोजनवली में हर इतवार सुबह सायकिल पर निकल आया पहाड़गंज ओम डेरी. आधा पनीर आधा दही बोलते एक सौ बीस रूपये देता वापसी छेह रुपये मिलते. पर पता नही उसका स्वाद भी उसी रोजाने की तरह बे स्वाद होता जा रहा है..घर की अपनी संरचना में रसोई में सबसे ज़यादा वक़्त बिताता है पर उस तरफ से कहीं न कहीं उसमें वरीयता सिर्फ पेट भर लेने की रह गयी है..

ऐसा नहीं है कि सिर्फ मैं ये सब सोच रह हूँ कभी न कभी हम सबके दिमाग के किसी कोने में ये ख्याल अपना दखल दे ही देता है और हम भूख का कुछ हिस्सा उस खाने से गायब स्वाद के लिए बचा कर पेट के किसी कोने में दबा कर रख लिया करते हैं..इस स्वाद पर एक पूरी अर्थवयवस्था टिकी है जो हर जगह एक सा खाना देने के लिए अपनी प्रतिबधता के एवज़ में हमारी जेब हल्की करती रहती है..कभी हम सब जन्मदिन का बहाना लेकर सरवन निकल पड़ते हैं, भाई कलेवा से कुछ साथ लेते आता है..माँ सब्जीमंडी वाले हलवाई से बड़े-बड़े समोसे लाने के लिए फोन कर पिता को याद भी दिलाती हैं की भूले नहीं..

भूख और उसमे भी स्वाद का अपना समाजशास्त्र है बाबा खड़क सिंह मार्ग हनुमान मंदिर के सामने पंगत में इंतज़ार करते लोग 'प्रसाद' के इंतज़ार में पतराते जाते हैं तो उधर सरवन या होटल अल्का में पूरा कुनबा अपने वांछित आर्डर का वेट कर रहा होता हो..हमारे घर की गतिकी में हम दूसरे वाले छोर पे पाए जाते हैं जहाँ चुनने में हमारा अधिकार चलता है पर वहीँ तक जहाँ हम डीलक्स थाली बंगला फूड्स में खाएं या पैक करा कर घर ले आयें. रोटी मैदे वाली नहीं आटे वाली, मिक्स वेज के बजाये शाही पनीर..

पर सुबह की पाली में पिता की रसोई में आवाजाही हो या माँ ने कुछ बनाया हो, उस खाद्य पदार्थ में जीभ दाँतों का और दांत जीभ का साथ कब देना रोक देते हैं इधर समझ नहीं पा रहा हूँ..मां के पैरों का दर्द न खड़े हो जाने की वजह से वहां औपचारिकता सी हो चुकी है कि कुछ तो खिला दिया जाये. साथ टिफिन में ऐसा कुछ हो जो प्रयोगों के स्तर पर नया दिखता हो. पर हमारी वाली जीभ पता नही क्यों साथ नही देती..पिता भी चुना मंडी सीताराम के छोले भठूरे लाने खाने के बाद चाय के लिए बोलते हैं तो साथ यह भी की तेलहा चीजें जयादा नही खानी चाहिए. छोटा भाई मन मारे पैडल मारता ले तो आता है पर अन्दर ही अन्दर कसमसाता रहता है.

अभी परसों दिल्ली से बाहर जा रहे हैं. देखते हैं इस स्थिति में कहाँ तक बदलाव आता है. वो सब माने या न माने, पर हम तो अपने को मेहमान मान कर चल चल रहे हैं. अब कोई दिल्ली से आये और सुबह नाश्ते से लेकर रात के खाने तक कुछ नया न हो तो बात बनेगी नही..कुछ तो ऐसा हो जो यहाँ की उत्तर आधुनिक रसोई की परिधि से बाहर हो.. 

(यह पोस्ट लिखी गयी है उस क्लास में जहाँ साढ़े नौ बजे के बजाये दस बजे पहुंचे ..याद है आलोक..!!) 

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