फ़रवरी 05, 2012

मेरे हिस्से का सच

इस कहानी के सभी पात्र एवं घटनाएँ काल्पनिक हैं. उनका किसी घटना, नाम,स्थान या जीवित-मृत व्यक्ति से मिलना मात्र एक संयोग भर होगा.

कभी कभी लगता है लिखना उन सारे हारे हुए मोर्चों से बच निकलने की एक जद्दोजेहद है, जहाँ हर बार उन सारी घटनाओं में कुछ न कर पाने की बेबसी है. किसी कोने में दुबका हुआ अपना चेहरा साफ़ नहीं दिख पड़ता.

कल. शनिवार. फरवरी चार. करीब तीन बजे के बाद हमारी फिल्म शुरू हुई. ख़तम हुई होगी आध घंटे बाद. इसके बाद क्या लिखूं..तालियाँ खूब बजीं, हमारे सहपाठी कुछ ज़यादा नहीं बोल पाए. प्रोजेक्टर से सामने पर्दे पर पड़ती छवियों ने इतना वक़्त ही नहीं दिया कि वे पिछला गुजरता कुछ भी याद रख पायें. दृश्य इतनी तेज़ी से चल रहे थे की खुद भी यही लग रहा था वहां सोचने के लिए ठहराव जैसा कुछ था ही नहीं.

तुमने कहा हम हिप्पोक्रेट नहीं हैं जो सवाल पूछते हैं उन सबको हमने अपने यहाँ जगह दी. उन मैम को भी पिछली फिल्मों के मुकाबले यह जयादा पसंद आई. वे उनकी तरह नहीं जो आँखों में देख कुछ कूट में समझाते-बुझाते हैं..पता नहीं ये लिखा गर्वोक्ति है या कुछ और..

पर इतना ज़रूर मालुम है, के उस दुपहरी अगर तुम नहीं आती तो हमारी फिल्म वहां ख़तम नहीं होती, जहाँ हुई. फ़ौजा सिंह के साथ स्लमडॉग मिलेनियर का थीमैटिक बैकग्राउंड स्कोर. फिर हम सबके उस पूरी प्रक्रिया में मौजूद विडियो वाला आईडिया मूर्त रूप में आता  है. और पता नहीं क्यों बार-बार उस दिन की तरफ मुड़ जाता हूँ जब उसे दोषी ठहरा कर हमने वहां से जाने को मजबूर कर दिया था..ऐसा कम ही बार देखा जब इन जैसे पितृसत्तात्मक झगड़ों में कोई स्त्री/लड़की अपनी बात मजबूती से रखे. वो दुपहर कुछ-कुछ ऐसी ही थी..

और महाशय तुम जो कह रहे हो के उस दिन तकनीकी दक्षता नहीं बल्कि उसको धारण करने की क्षमता समूह में आपकी हैसियत तय कर रही थी, सही नहीं है और न ही ऐसा कुछ था कि हम कद्र सोच की नहीं बल्कि पूँजी की कर रहे थे; सो बेचारे सोचक के लिए वहाँ कोई स्थान ही नहीं रह गया था. ये ठीक है कि यह स्थिति लगातार कुछ दिनों से बनी थी जहाँ तुम किल्लाठोक बार-बार अपने को अनुपयोगी साबित करने में व्यस्त लग रहे थे. ऐसा बिलकुल नहीं था कि उसमें किसी पूंजी ने श्रम विभाजन किया था. उस विभेदन में हम सब अपनी भूमिकाओं को ढूंढने की कोशिश कर रहे थे. उस दिन जीत पूंजी की नहीं हमारी हार हुई थी..पता नहीं क्यों ये सारा स्पष्टीकरण एकालाप की तरह लग रहा है..

तबसे अपने आपको देखने की कोशिश कर रहा हूँ. उसी दिन यह तर्क भी जुटा लिया था कि दोनों तरफ अपने विस्तार को बनाये रखने की मज़बूरी जैसी किसी मनोदशा में मुझे तुम्हे यह बोलना पड़ा के थोड़ी बाधा तो हो रही है जबकि कुछ देर पहले तक मैम के साइन करवाने के लिए उस कागज़ को हाथ में लिए तुम्हारा दिमाग खा रहा था. हम सबकी बराबर की हिस्सेदारी थी फिर एक तुमने ही उस स्थिति को क्यों भुगता..बहुमत शायद इसी रूप में विधवंसक होता है..!! इस सबके पीछे अपनी कमजोरी को खड़ा पाता हूँ जिसने बोलने से पहले कुछ सोच पाने से मना कर दिया था और कमज़ोर पक्ष लिया..शायद पूरे समूह को एक साथ लेकर चलने चलाने की कोशिश में कहीं पिछड़ गया..उनके इतना हायपर हो जाना समझ से परे था..पर अब सब यहाँ लाकर..पता नहीं क्या..

जबकि उस समूह में सहभागिता के स्तर पर वो गुणात्मक अनुपात में कहीं पीछे था. पर फिर भी उसको कुछ नहीं बोला गया. कभी जीपीओ की समय तालिका मिलाते, कभी दूसरी पाली में आने की बात कहते. वाद्ययंत्र से निकलती ध्वनियाँ कुछ ज़यादा ही सुनाई देती हैं..हम अपनी तकनीकी दक्षता छिपाते रहे और इन पुरोधा ने घालमेल की दुहाई दे मारी..

वापस कल पर और तुम पर आऊं तो वहां सबके सामने उसके बारे में मेरा कहा कुछ ठीक नहीं लगा. थोडा एहसास उस वक़्त अगली फिल्म देखता अपने ही अन्दर उमड़ता घुमड़ता रहा..पता नहीं मेरे अपने मूल्य मेरे अन्दर टकरा रहे हैं, चक्कर काट रहे हैं. कुछ भी सीधा सपाट दिख भी नहीं पा रहा..

एक बात और भी समझ नहीं आई की उनके लिए 'हम' से ज़यादा ज़रूरी उनका 'मैं' है. 'मैंने' किया बोलते वक़्त लगता था कि मानो हमारी भूमिकाएं नगण्य थीं. पूरा समूह एक तरफ वे दूसरी तरफ. वो तो तुमने मेरे इतने विडियो देखने वाली बात उठा दी वर्ना वह भी दायें बाएं हो जाती..पर वापस कुर्सी पर धस कर लगा कुछ रह गया जो बोला जाना था. उस लास्ट मोमेंट एडिटिंग में तुम्हारी भूमिका..शायद यही वाली बात थी जो तुम्हे लगी होगी..तुमने नहीं भी कहा पर तुम्हारी सकुचाती आवाज़ और देहभाषा ने तो मुझ तक ऐसा कुछ पहुँचाया..

इन सारे सवालों जिरहों के बीच मैं खुद को कहीं एक जगह स्थित नहीं कर पा रहा. मुझसे सुलझे हुए तो तुम हो जो उस दिन के बाद भी हम सबसे उसी तरह मिल रहे हो..क्या तुम्हे अन्दर से नहीं लगा होगा जब मैंने तुम्हारे मज़ाक को कटघरे में खड़े होकर दूसरी तरफ से गवाही दी..तुम अगले दिन कुछ कह भी रही थी थी. तुमने रोक दिया था कि मुझे उस मामले में कुछ न कहे..

इन सब न ख़त्म होने वाले सवालों की फेहरिस्त को यही छोड़ते हैं..मेरे भी समझ में कुछ ज़यादा नहीं आया..

पर जब कोई अपनी माँ से कहे कि अच्छा हुआ के वह लड़का नहीं है वरना रोज़ पिट-पिटा कर लड़ झगड़ कर आती..!! तब इस वाली बात को समझने में किसी की क्लास कोई मदद नहीं करतीं. पीटर बर्जर-थामस लक्मैन का प्राथमिक समाजीकरण भी पानी मांगने लगता है. इससे जूझना अपने अन्दर की गहराई में जाने से ज़यादा उस स्थिति को समझने की कोशिश होनी चाहिए जब कोई अपनी माँ से ऐसी बात कह उस पुरुषसत्तात्मक समाज के सारे रक्त रंजित इतिहास को पल में निरर्थक साबित कर बौना बना दे. उसका यह कहना किसी बिना हथियारों उन पर जीवित देशों से अलग किसी ऐसे क्षण ऐसी दुनिया की तरफ प्रस्थान है जहाँ इस हिंसात्मक समाज से पलायन कर जाना पड़े तो तुरत इस सामजिक गतिकी से भाग लूँगा..

ये मेरे हिस्से का यूटोपिया है, इसे मेरे पास रहने दो..!!

(इस कथ्य के सारे 'तुम' मेरे इर्दगिर्द इतने निकट हैं कि उन्हें सबके सामने लाना मेरे लिए ज़रा मुश्किल है..इसलिए जिन्हें इसका उदगम नहीं पता,  वे कृपया अपने मस्तिष्क को आराम करने दें.)

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