फ़रवरी 09, 2012

तेरा इश्क है मेरी आरजू

इसे एक पुरुष की प्रेम कहानी के नुक्ते तले पढ़ें!!

दिमाग रुक सा गया है. कुछ समझ नहीं पा रहा कैसे कहाँ अपने को स्थित कर इस उलझन में धस गए गड्ढे से बाहर निकल सकूँ..कोई हाथ भी नहीं है जो इस तरफ बढ़े..ऐसा क्योंकर हुआ और मेरी भूमिका क्या रही, इन जैसे भारी भरकम सवालों से जूझना नहीं चाहता..ऐसा भी नहीं है जो कभी महसूस हुआ उसे कभी प्रकट नहीं किया, पर हाँ कभी उन्हें पता भी नहीं चल सका क्योंकि सामने सफ़ेद कागज़ होता था और नीली स्याही..उस जीवित हांड मांस के जीवित पिंड को कानो कान खबर भी नहीं पड़ती..

उन स्पंदनों को अकेले ही सुनता, किसी के साथ बांटा नहीं. कोई साझेदार नहीं. इसे इस समाज के अकेलेपन से लेकर उस एकांत की व्याख्याएं करने से पहले, मैं यह कह दूँ कि मेरे सामने हमेशा संकट उस अकथित सम्बन्ध की अपनी व्याप्ति में यह था कि मेरे कुछ कहने से ये मुलाकातें भी कहीं गायब न हो जाएं. लेकिन इस सबके बाद कभी ऐसा हुआ नहीं. 'हम दोनों' की बातों की कई-कई किश्तें लगातार चलती रहीं. फिल्मों ने कुछ इस तरफ से संस्कारित किया कि उसका नंबर जुटाने के लिए बहाने तो खूब बना लेता था, पर जब उधर से लायब्रेरी में उसने अपने जन्मदिन की बात कही, तो इधर से फोन की इतवारी छुट्टी मान चुपचाप बैठा रहा..अगली सुबह मेट्रो में देख भी लिया, पर पास जाने की हिम्मत नहीं पड़ी..हाँ अपनी फिलोसफी की किताबों पर कुछ-कुछ लिख कर उसे भेट ज़रूर कर गया था.

मुझे पता है आज यहाँ लिखने से कुछ बदलने नहीं जा रहा है. पर आज की ये छोटी छोटी बातें तब इतनी छोटी नहीं लगती थीं..पता नहीं मेरे जैसे प्रकार को क्या कहा जाता है..ऐसा नहीं है मैंने कोशिश नहीं की थी. उस आखिरी साल अपनी सारी ऊर्जाओं को समेट, सबकुछ कहने-बताने की तय्यारी में रातें  घड़ी की सुइयों को चक्कर लगाती देखती सुनती रहती थीं..सोचता भी किसी स्क्रिप्ट राईटर की तरह था के अगर उसे सीधे कहने में संकोच हो तो वो किसी निश्चित दिन किसी विशेष रंग का सलवार पहन कर आ जाये, मैं समझ जाऊंगा..चने के झाड ज़यादा ऊँचे नहीं होते इसलिए इतना भर ही देख पाया था..पर कुछ नहीं बोला..आखिरी दिन भी चला गया..डेढ़ साल बाद अपने को दुबारा जुटाया फोन मिलाया, उसके पिता का नंबर था. कभी दिया था उसने. घंटी तो बजी नहीं उलटे उधर से आवाज़ आई, 'दिस नंबर डज़ नॉट एग्जिस्ट..!!'

आज इस कहानी को डेढ़ साल पार किये तीन चार छेह महीने और बीत हो गए होंगे. नौ फरवरी आज उसकी पुण्यतिथि जैसा कुछ नहीं मना रहा हूँ..न ही कोई ऐसी बात कहने जा रहा हूँ कि एमए में पढने वाला कोई प्रेमी तत्काल अपने प्रेम से इस्तीफा दे दे..मेरे पचपन परसेंट नहीं बने तो क्या हुआ उसके ज़रूर हो जायेंगे, अब तो सेमेस्टर भी आ चुका है उसे कौन सा फिलासफी डिपार्टमेंट के चक्कर काटने हैं..न उन दोनों की अबोली आखिरी मुलाक़ात साहित्य अकादमी की लायब्रेरी से निकल मंडी हॉउस होते हुए तिलक ब्रिज से ईएमयू पकड़ने वाली है..

इतना हो जाने के बाद भी मेरे पास उसे बताने के लिए बहुत कुछ था पर उस रात की आखिरी मेट्रो आ चुकी थी.

फिर शुरू हुई अपनी क्लासें. बोलना यहाँ भी अनुपस्थित था पर कभी नहीं लगा की कुछ बोला जाना चाहिए. मेरी चलती डायरी में अपने बारे में लिखा पढ़ कर उस दुपहरी बस में तुमने पता नहीं मेरे बारे में क्या सोचा होगा..पर मैं तो अपनी सन पचास की कहानियों के नायक की भूमिकाओं को अपने पास देख पा रहा था. जब भी मैं तुम्हारी तरफ देखने की कोशिश करता तो लगता तुम्हारी आँखें पहले से ही मुझमें क्या पढ़ रही हैं. अभी उस सुबह बस स्टैंड पर सौ नंबर का इंतज़ार करते वे महाशय पूछ बैठे, के मैं दक्षिण भारत का तो रहने वाला नहीं..मैंने मना कर दिया..पर शायद तुम्हे नहीं कर पाया..

वो सुबह मुझे आज भी याद है जब हम दोनों रिक्शे पर बैठे थे, और अचानक मैंने कहा, मैं तुमसे वही कहना चाहता हूँ जो एक लड़का एक लड़की को कहना चाहता है. इस बोलने से पहले डर भी था एक दोस्त को खो देने का. मेरी समझ में इतनी कम एकान्तिक मुलाकातों के बावजूद मैं खुद उन अर्थों को नहीं ढोना चाहता था जिसका बोझ मुझे उठाना पड़ा. पता नहीं कैसा भावातिरेक था जिसने तुम्हे अपने लिखे को न फाड़ने को कहा था शायद कभी आगे जब हम दोनों साथ होते तब अपने को उनमे खोजता. उन्ही दिनों सोचा करता था जब मेट्रो फरीदाबाद तक हो जाएगी तुम्हारे साथ वहां तक जाया करूँगा. अभी तक नहीं पहुच पायी है.

एक रात खतरनाक किस्म का सपना देखा जिसे इससे पहले कभी नहीं लिखा था, पर सोचता था की ये सच हो जाये..उसमे वह सड़क किनारे रेड लाइट पर रूकती गाड़ियों के आगे-पीछे भागती रही थी. एक दिन मुझे दिखी और अधकचरे कपड़ों के साथ लेकर घर ले आया. माता पिता को सिर्फ इतना पता चल पाया के कॉलेज में साथ पढ़ते थे..उसके जीबी रोड से भाग लेने वाली बात दबा गया..

{यह पोस्ट जनसत्ता में चौदह फरवरी को आई..'कैसे कहें ', इसे यहाँ पढ़ें. }

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