फ़रवरी 21, 2012

दिल्ली का सूरज पता नही इतनी दूर क्यों है..

दिल्ली और दिल्ली की अंगड़ाई. मौका ही कहाँ मिलता है अंगड़ाने का. इतनी भागमभाग हबड़दबड़ में अपने आस पास को महसूसने कोनो कतरों में झांकता ही कौन है..बस एक अजीब किसम की दौड़ में मरते खपते हम सब..यहाँ से बाहर जो बेफिकरानापन रहता भी है तो वो भी इधर आती पटरियों पर लौटते ही उड़ जाता है..

गाड़ियों की चीख पुकार में गायब होती जाती धड़कने सुनाई भी नहीं देती. भले बाहर भी न देती हों पर एक सच जैसा झूठापना तो रहता ही है कि अपने पास है.!! कुछ देर पेड़ों के पीछे आसमान में रंगों के साथ खेलते सूरज को देखना कितने कितने इत्मिनानों से भर देता है, उसे लिख पाना कम से कम मेरे लिए तो आसान नहीं लगता. उसके रक्तिम आभा में डूबते रंग किसी भी तरह से अपने पास बुलाते हैं..

उन बिजली के तारों पर बैठे गौरय्या के जोड़े को देख अपने कैमरे से खींच लेना उस किसी अतृप्त चेतस को उभार देती है जहाँ उस एकान्तिक क्षणों को फिर से जी लेने की कसक उठ हिलोरे खाने लगती है. उनका झुण्ड के झुण्ड में उड़ना बिना किसी सीमा को माने अपने भी डैनों को खोल लेने को कहते हैं..

घास पर बिछी बूंदों और उनमे झांकती किरणें किसी स्वाति नक्षत्र वाली बूंद का भ्रम देती है पर उसे छू भर लेने पर उसकी क्षणभंगुरता को भी तुरत प्रकट कर देती है. हाथ से छुई न भी जाये तो भी वह सुनहरी हीरे वाली बूंद उसी जगह अपने आखिरी पलों तक रहती है..

मौसम की उन ठंडी हवाओं का अपने चेहरे पर चलना इस कमरे में बंद पंखों की नकली हवा से कहीं ठंडक भरी स्पर्शना से छूती चली जाती है..पता नहीं इन्हें भौतिक अनुभवों की किस श्रेणी में सजाऊं या किसी और तरह की शब्दावली में ओढ़ाकर लिखूं..पर हर सुबह उजाला अपने रंगों को बारी-बारी बदल उन सारे चित्रों में कई-कई दफे रंग भरता है. उजियारे की अपनी श्रृंखला में किस क्षणिक अनुभूति को कैसे दूसरी तरफ लिख पहुचाऊं..पर वहां लेटे-लेटे उन इंटों के बीच कोनो से आती रौशनी में भूरा प्रकाश कैसे मिनट-दर-मिनट बदलना सपनीले सुनहरे रंग की तरफ चला चल आँखों को उसी तरह ढालता जाता है..

यहाँ इन चारों तरफ की इमारतों चारदीवारी में लेटने सोने की मज़बूरी कहें या किसी और चश्मे में फिटियाते देखने की कोशिश करें..पर यहाँ दूर तक देखें भी तो पहले सीढ़ी का जुगाड़ कर भी लिया तो पीछे आँखें रवीन्द्र रंगशाला की छतरियों तक ही जा पाती हैं..आँखें भले वन्दे मातरम रोड न देख पायें कानों को कभी कभार वहां से गुज़रती आवाजें ज़रूर सुनाई देती हैं..सूरज का आम के पेड़ से होते हुए पकडिया-सफेदे की ओट छिप जाना ही हमारे लिए दिल्ली का सूर्यास्त है. माउन्ट आबू का सनसेट पॉइंट यहाँ कहाँ बन पायेगा कह नहीं सकता पर बम्बई में अम्बानी का एंटीलिया ज़रूर ऐसा कुछ बन सकता है..

जारी..

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