फ़रवरी 23, 2012

सैल्यूलायड के परदे से..

दिसंबर इकतीस करीब पौने ग्यारह.

साल की पहली फिल्म किताब की जद्दोजहद में अंसारी रोड की तफरी के बाद डिलाईट पर अरुण-राकेश के साथ नो वन किल्ड जेसिका देखी. फ्लाईट में रानी का डायलौग तो सबको याद रहा पर यह नहीं की एनडीटीवी की बरखा दत्त का नाम कारगिल की बहादुरी के बाद उन टूजी वाले टेपों में आवाज़ समेत आ चुका था. जिससे बौखलाए देश का नमक बनाने वालों को अपनी निजता का हनन होता नज़र आया..खैर, अभी इस सोमवार डान द्वितीय, थ्री डी में देखी पहली फिल्म अचानक ही बन गयी. चश्मे के पच्चीस रूपये. न फिल्म में दम था न वहां ऐसे सीन थे कि कानों पर ऐनक टाँगे रहें..डर्टी पिक्चर का मौका ही नहीं लगा.

बीच की ज़यादा याद नहीं रह गयी हैं..सात खून माफ़ विशाल भारद्वाज की, ये साली ज़िन्दगी अरुणोदय की आयशा, सोनम-शाहिद की मौसम. तिग्मांशु की साहेब बीवी और गैंगस्टर भोपाल, साँची आने के बाद, सुभाष नगर रेल्वे फाटक की टिकट कटवा चुकने पर भी भारत
टॉकिज पर कूद कर देखी. मतलब उस थोड़ी सी दरमियानी में त्वरित सोच कर उतर पड़े. यहाँ महिलाओं के लिए अलग से टिकट खिड़की दिखी. फ़ोर्स अल्पना पर लगी थी पर उधर नहीं गए. आरक्षण अन्ना आन्दोलन के एक दिन पहले पहली आज़ादी के दिन पंद्रह अगस्त को उदगीत के साथ भीगते भागते पहुच कर देखी फिर जेपी पार्क राजघाट पता नहीं क्यों रपटाये चले गए. शायद मंडली इतने दिनों बाद जुटी थी इसलिए..हम जा तो फ़िरोज़शाह कोटला रहे थे किले की उंचाई पर अशोक स्तम्भ के पास बैठते फिल्म की बोरियत कुछ कम करते पर..

धोबी घाट अकेले देखनी पड़ी. कहीं मल्टीप्लेक्स को छोड़ लगी नहीं थी, फिर ध्यान गया प्रगति मैदान शाकुंतलम की तरफ. वहां कहानियाँ सुनाई दीं निशांत-भूमिका-अंकुर  के वक़्त की. स्टाफ में इस फिल्म को लेकर जितनी भी बातें थीं उनका लब्बोलुआब यही था कि फिल्म या तो लोगों को खूब अच्छी लगी है या बहुत ही बेकार. और उनमें से एक महाशय का बेटा जो फ़िल्में कम ही देखता है वह पहली श्रेणी में है. राकेश को पूरी फिल्म में आमिर के माथे पर चढ़ी त्योरियां ठीक नहीं लगी.

डैली बैली हरिद्वार भागने वाले
दिन चार जुलाई को अभिषेक में देखी और उसके बाद बकौल अरुण उसका पर्दा-साउंड सिस्टम लाजवाब हो पर उसका सौंदर्य व गंध शास्त्र मोती की तरह ही जान पड़ा. और फिर कभी कोई फिल्म वहां न देखने की कसम टाइप थ्री डी में रा-वन देखने के वक़्त टूटने वाली थी बच गयी. स्टेनली का डब्बा तारे ज़मीं पर से कहीं सहज लगी. बाद में पता चला कि इसको  कैनन ईओएस 7डी पर डेढ़ साल हर शनिवार होने वाली वर्कशॉप के दौरान फिल्माया गया था.अमोल गुप्ते का हिंदी टीचर का रोल किसी बने बनाये चौखटे में फिट किया लगता है, इसके बावजूद. पर मैंने वहीँ कॉन्फ्रेंस हाल में उस आध्यापक को उसके वर्ग और व्यंजनों के चरित्र के साथ जोड़ कर कुछ-कुछ देखने की कोशिश कर रहा था. फिर भी उसे इस तरह जाना नहीं चाहिए था. और अकरम का रोज़ रात बचा खाना फ्रिज में रखना उन दोनों के साझा भविष्य की अनिवार्यता को चोर दरवाज़े से सामने लाता है.

अगर मर्डर-टू इमरान हाश्मी के चंगुल में न फंसी होती और भिन्डी बाज़ार का फत्ते प्रशांत नारायण पूरी फिल्म में व्याप्त रहता तो सौ की तरह यहाँ हमें कोई थ्रिलर देख पाते. इसी फिल्म के इंटरवल में डोबरियाल की नॉट अ
लव स्टोरी का ट्रेलर देख रिलीज़ डेट का इंतज़ार भी किया पर मौका नहीं बन पाया. टल गयी. चिल्लर पार्टी-सिंघम दोनों किश्तों में टीवी पर थोड़ी थोड़ी देखी पर पहली वाली का कुते वाला साथ ज़यादा संवेदनशील मसला था. प्यार का पंचनामा इतनी बड़ी फिल्म हो जाएगी उम्मीद नही की थी. पालिका से सीडी कबकी ला चुका हूँ पर देखी नही है.

अनुराग की पांच सेंसर बोर्ड ने ए सर्टिफिकेट के साथ भी रिलीज़ करने से मना कर दिया पर उसी ढर्रे पर बनी अनुराग घराने की शैतान परदे तक ठीक ठाक पहुच गयी. उसका हवा हवाई और खोया खोया चाँद दोनों गाने नए सफल प्रयोग ठहरे.

रॉकस्टार रणबीर के स्टारडम की पहली फिल्म कुछ-कुछ अपने टाइप की लगी. कविता की तरह फैली ज़िन्दगी के हर रंग से खेलती. कोई सामजिक परिभाषा उसको व्यवस्थित नही कर सकती, वहां वह जैसा चाहेगा, जिएगा. अन्दर तक बेचैनी अपने को पाने की शिद्दत से कोशिश. दिल न टूट जाने की पशोपेश. इम्तियाज़ की नायिका जहाँ लव आज कल में शादी के बाद वो सात दिन का मिथक तोडती है, तो यहाँ दोबारा नायक उस कथा को ध्वस्त करता, राजश्री की 'अंखियों के झरोखे से' आगे की कहानी कहता है. अगर इनके अलावा भी देखें तो मेरा मन इसे चार छेह मर्तबा देखने का और था..

विशाल भारद्वाज की सात खून माफ़ इसी तरह की पहली फिल्म थी जो स्त्रैण प्रेम की गुणात्मक व्याख्या ज़रा श्याम बेनेगल की भूमिका की तरह करने की कोशिश करती खुद से झूझती रहती है. पूरी फिल्म उसी तरह की तकनीक अपना कर अपने काल खंड को कहती है. कभी टीवी पर बाबरी मस्जिद के विध्वंस का सीधा प्रसारण(?) दिखाती है तो कभी चलती ट्रेन में आँखें फोड़ते अखबार पढने की कोशिश..दोनों जगह नैतिकता सामाजिक दबावों से तय नही होती न किसी निर्णय में कोई मूल्यनुमा वजन दिल पर नही पड़ता.

इस पर एक लम्बी चौड़ी पोस्ट साहिब बीबी गैंगस्टर की तरह नही लिख पाया जो कि वही से शुरू थी जहाँ अबरार अल्वी अपनी साहिब बीबी गुलाम ख़तम करते हैं. सामंती मूल्य कभी पूरी तरह चुके ही नही, वे उस पूंजीवादी व्यवस्था में सांस लेते यहाँ-वहां दोबारा दिख पड़ते हैं. रुतबा, उन्हें बन्दुक की गोली खरीदने के लिए कर्जा दिलवा देता है. रौब गांठते राजनीतिक दुरभिसंधियों के काल में शोषक अपने शोषितों को किसी भी तरह ठील देने की फिराक में नही है.


बस हुआ इतना भर है कि स्त्री अब अपनी देह के पुरुष मर्यादित संस्करण से निकल कर उसका उपयोग कर सत्ता पर काबिज़ होने की पहली कोशिश में कामयाब सी लगती है. गुलाम या तो गूंगे हैं या उसकी शारीरिक इच्छाओं की पूर्तिदाता के रूप में मौजूद हैं. यह निर्णय खुद स्त्री के हैं या पुरुष सत्ता ने उसको अमानवीयकरण की प्रक्रिया से गुज़ार कर अपनी दैहिक इच्छाओं का उल्लू सीधा किया है. छवियाँ इश्किया से लेकर मकबूल होते होते अंकुर तक जा पहुँचती है जहाँ शबाना गर्भवती तो अपने मालिक से होती है पर फिल्म का अंत वहां होता है जहाँ वो अपने पति की तरफ भागती चली जा रही है. इस बिम्ब का इस दृश्य का अपना विशिष्ट अर्थ है जिस पर फौरी तौर पर कुछ और नही कहना चाहता..हाँ बस ये के इश्किया से साथ मृत्युदंड भी साथ चली आई थी..

उधर सिब्बल जिन सोशल नेटवर्किंग साइटों पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए ऊलजलूल सी बातें कर रहे हैं उन्ही में से एक फेसबुक के सहारे ओनिर ने अपनी फिल्म आई एम के लिए पैसे जुटाए. इस माध्यम को कम आंकना भारी पड़ सकता है. तहरीर चौक से लेकर पूरा अरब इसी जमुनी क्रांति के बीजों की खाद पानी यहीं से लेता रहा है. यू ट्यूब पर अपलोड किसी युवक की हत्या का वीडियो आज सिर्फ हत्या या सिर्फ एक विडियो नै कई कई सैकड़ों बिम्बों का गुंजलक है. जिसे पढना है पढ़ ले..

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आवाज़ें..

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...