फ़रवरी 29, 2012

ये जो शहर है लखनऊ

हफ्ता भर पहले तक हमारा लखनऊ चारबाग के इर्दगिर्द सिमटा हुआ एक ऐसा शहर था जिसे कभी मौका लगने पर घूमलेने की तमन्ना न मालूम कब से अन्दर थी.

जितना ये उन बड़ी-बड़ी चौड़ी होती जा रही सड़कों चौकों, उन पर रपटती गाड़ियों के बीच चमचमाती रौशनियों की परछाई में ऊँची होती जा रही इमारतों में अपने नए संस्करण बना रहा था, उतना हमने इसके पुराने रंगों-आब में देखा ही नही था. उमराव फैज़ाबाद से लखनऊ ही आती है, तो प्रेमचंद के शतरंज के खिलाड़ी भी अपनी ठुमरी, रूमी दरवाज़े से गुज़रते चिकन वाले कुरते पहने, पान भरे मुँहों के साथ यहीं के थे. जितना बस की खिड़की से ये हमें दिखता नही था उससे कहीं ज़यादा छिपा रह जाता था हर बार. इसकी गोमती भी सिकुड़ कर दिल्ली की जमना बनने की तरफ जाती जा रही थी.

जब जब बहराइच से हमारी बस इस शहर में चिनहट की तरफ से दाखिल होती पोलिटेक्निक चौराहा सवारियों को उतार यह बता देता था कि अब हम दाखिल हो रहे हैं. और इसकी ताकीद भी कि अब हम इस बनते शहर की तरफ भी बढ़ रहे हैं..

मायावती के आने से ये कितना बदला या उस दरमियानी में उदारीकरण की छाया वहां कुछकुछ इस तरह पड़ी जिसने एक सभ्यता के विमर्श को इस तरह से गढ़ा कि गोमती के किनारे बहुमंज़ली इमारतों की कई-कई जमातें यक-ब-यक उग आयीं. बड़े-बड़े होर्डिंग जेब में रखे बटुए को खाली करने से लेकर अखबारों के हिस्से में जा पड़ीं. कोई ऐसा बड़ा ब्रांड नही था जो वहां नही आना चाहता हो. वहीँ कहीं किसी छत पर दमकते, बाल धुलाते-मकान दिलाते-कपडे पहनाते-गहनों की शुद्धता से लेकर सोना गिरवी रख सपने दिखाते उन देखती चुंधियाती आँखों को इस समय ने सहारागंज भी दिया. और ऑटो टेम्पो वालों के लिए वहां चलता जीना ही देखने लायक एकलौती चीज़ है. उस शाहनज़फ़ के इमामबाड़े की तरह जाता ही कौन है.. 

मॉल अपने आप में सिर्फ दुकानों का जमावड़ा भर नही है. संस्कृति को समरूपी बनने का बहुत पैना औज़ार है. बाहर पढ़ने नौकरी करने गए वापसी में थोड़े-थोड़े उन शहरों को भी साथ लेते आये. और साथ लाये अपने नए बने स्वाद, कूचा रहमान से सिलवाई कमीज नही साथ थी पीटर इंग्लैंड की शर्ट. पैंट मफ्ती की तो थी ही पजामे भी कैपरी में बदल गए. अब कौन इतवार हजरतगंज जाकर पांच सात तरह के पानी वाले बतासे खाए. लालबाग़ नावेल्टी का पर्दा और उसका साउंड सिस्टम आईनोक्स रिवरसाइड मॉल के चौथे माले के सामने कहाँ टिकने वाले हैं..और शुरू हुई वो सारी प्रक्रियाएं जिसने इस शहर को पिछड़ा नही रहने दिया, इसने खुद को बदलना शुरू किया..

भले यह कटरों को अपदस्थ नही कर पाया है पर एक द्वंद्व तो चलता ही रहता है. कैसरबाग़ नजीराबाद वाला इलाका कहीं से भी इसमें पिछड़ता नही दिखता. भले जूतियाँ कानपुर कोल्हापुर से नही आ रही हैं पर उसने अपने को बदला है. गांधी के नाम पर आज के युवा को चप्पल खरीदने में कोई गुरेज़ नही, बस उसका स्टायलिश होना ज़रूरी है. दाम जेब पर भारी पड़े तो नही देखता कि चमड़ा उंट का है या किसी और का..

चिकन के कुरते पायजामों के साथ सिर्फ तीन सौ पिचहत्तर से शुरू नाज़ीराबाद में मिल रहे हैं पर दुकानदार किसी सालाना जलसे का इंतज़ार करते मक्खियाँ मार रहे हैं. अमीनाबाद के गड़बड़झाला बाज़ार में उन्नाव के इत्र की महक नही परफ्यूम की नाक दिमाग पर चढ़ती कोई तेज़ गंध है. औरतें-लडकियां किसी फिल्म में दिख गयी बाली गहने लेने भर-भर के वहाँ पहुँच रही हैं. और सामने की आँखें ब्लाउज के अस्तरों के पीछे से झांकते अन्तः वस्त्रों के देसी विदेसी नाम पढ़ने में मसरूफ हैं.

वहाँ के दूल्हाघर दिल्ली गाँधी नगर की दुकानों की तरह उन परम्परागत शादियों को निपटाने का बीड़ा उठाये हुए हैं. ये बात अलग है कि मौर को सर की टोपी कितने कहते हैं..मनिहार चूड़ियाँ नही बेच रहे, उनकी कोई जगह ही नही है. चूड़ा खरीद ही कौन रहा है..हाँ सलवारों के लिए लटकन लेने भले दर्जी वहाँ के चक्कर काट जाते होंगे. अवध सिर्फ होटलों चिकनकारी की दुकानों की चार दीवारिओं तक सिमट रह गया है. और बचे है पुरानी ठसक वाले निशांतगंज-चारबाग-चौक-नाका हिंडोला-नाज़ीराबाद-अमीनाबाद-कैसरबाग-कैंट..पर ये जितने पुराने हैं उतने ही नए भी, इनके बनने बिगड़ने की सारी प्रक्रियां गोमती नदी के पार बसी रिहाइश, उनकी बुनावट, हिज्जों, स्मारकों के साथ-साथ चल रही हैं..

अभी पढ़ते हुए इधर इसकी एक और व्याख्या मिली..

इस पूंजीवाद ने जिस तरह मास कल्चर और मास सोसाइटी को जन्म दिया है, वह बुनियादी तौर पर व्यक्ति की स्वतंत्रता, निजता और व्यैक्तिकता का सबसे बड़ा शत्रु है. आज के दौर में, जो कुछ भी पर्सनल है, कम से कम संस्कृति में उसकी जगह नही है. मास मीडिया वही है जो सारे मनुष्यों को दर्शक-श्रोता मान कर उनमे एक जैसी रूचि और आस्वाद की आदत डाल रहा है. क्या आपको नही लगता कि ऐसे समय में अपने नितांत एकांतिक और निपट अकेले अनुभव को व्यक्त करना इस पूंजीवादी समूहवाद का सार्थक प्रतिकार है. (पृष्ठ १७, और अंत में प्रार्थना ; उदय प्रकाश)

और यह समरूपता हजरतगंज लालबाग़ की उन सारी काले रंग पर नाम वाली होर्डिंगों में अपने इसी अर्थ को तो व्यंजित कर रही हैं..

[जारी..]

पीछे के पन्ने: हज़रतगंज के बहाने दस का नोट और नन्हे हाथशहर के शहर बने रहने की स्त्री व्याख्याउन सबके नाम जिन्होंने ये शहर बनाया

2 टिप्‍पणियां:

  1. अपना है- जन्‍मदिन और वर्षगांठ.

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  2. मान्यवर, 'अपना है' समझ में आया. पर किसका जन्मदिन और वर्षगांठ है, ज़रा सन्दर्भ से बाहर है..समझावें..!!

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